54 एकड़ में जैविक खेती, 13 राज्यों में पहुंच रहे उत्पाद
खरगोन में बलराम कृषि महोत्सव में किसानों ने बताई खेती से बदलती जिंदगी की कहानी
मध्यप्रदेश में खेती अब सिर्फ पेट पालने का जरिया नहीं रह गई है। बदलती तकनीक, नई फसलों, प्राकृतिक खेती और बाजार की बढ़ती मांग ने प्रदेश के किसानों के सामने कमाई के नए रास्ते खोल दिए हैं। इसकी एक तस्वीर खरगोन में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव में देखने को मिली, जहां किसानों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से संवाद करते हुए बताया कि कैसे खेती की नई तकनीक और सरकार की नीतियों ने उनकी आमदनी ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों के सपनों को भी उड़ान दी है।
इसी आयोजन में दो किसानों की कहानी खास तौर पर सामने आई। एक किसान ने 54 एकड़ में पूरी तरह जैविक खेती को अपनाकर अपने उत्पादों को 13 राज्यों तक पहुंचाया, तो दूसरे किसान ने सफेद मूसली की खेती से इतनी आमदनी अर्जित की कि अपने बेटे को अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए भेज सके। ये कहानियां उस बदलाव की तस्वीर पेश करती हैं, जहां किसान पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर बाजार, तकनीक और वैकल्पिक फसलों को अपना रहा है।
54 एकड़ का खेत बना जैविक खेती की प्रयोगशाला
खरगोन के किसान अविनाश दांगी कई वर्षों से जैविक खेती कर रहे हैं। उनके पास करीब 54 एकड़ जमीन है और वे पूरे खेत में जैविक तरीके से खेती करते हैं। खेत पर करीब 40 गौवंश हैं और परिवार के आठ सदस्य खेती के काम में जुटे हुए हैं। दांगी ने खेती को केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने खेत को एक ऐसी व्यवस्था में बदलने की कोशिश की, जहां पशुपालन और खेती एक-दूसरे के पूरक बनें। जैविक खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल उनकी खेती की खासियत है। उनके खेत से निकलने वाले जैविक उत्पाद अब केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। दांगी के मुताबिक उनके उत्पाद देश के 13 राज्यों में सप्लाई किए जा रहे हैं। मसाला फसलों में वे हल्दी, धनिया और मिर्च जैसी फसलों की खेती करते हैं। इन फसलों की बाजार में मांग और बेहतर गुणवत्ता ने उनके लिए खेती को अधिक लाभकारी बनाने का रास्ता तैयार किया है।
खेती से सिर्फ कमाई नहीं, नई सोच भी
अविनाश दांगी का कहना है कि किसान अगर खेती में तकनीक और वैज्ञानिक सोच को शामिल करे तो कृषि को ज्यादा लाभकारी बनाया जा सकता है। उनका अनुभव बताता है कि जैविक खेती के लिए शुरुआती दौर में मेहनत और जानकारी की जरूरत होती है, लेकिन एक बार किसान इसकी प्रक्रिया समझ ले तो बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग उसके लिए बड़ा अवसर बन सकती है। दांगी सरकार की कृषि योजनाओं और सहायता को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को उन संसाधनों के हिसाब से प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जिनका वे इस्तेमाल करते हैं। वे बताते हैं कि रासायनिक उर्वरकों पर सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है, जबकि जैविक किसान इनका उपयोग नहीं करते। ऐसे में प्राकृतिक और जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए भी समान रूप से प्रोत्साहन की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।
सफेद मूसली ने बदली किसान की कहानी
अब कहानी उस किसान की, जिसकी फसल ने खेत से निकलकर सीधे अमेरिका तक उसके परिवार के सपनों को पहुंचाया। अनिल वर्मा सफेद मूसली की खेती करते हैं। उनके मुताबिक राज्य सरकार की खेती से जुड़ी नीतियों और सहयोग ने उनका उत्साह बढ़ाया। इसी खेती से होने वाली आय ने उन्हें अपने बेटे प्रीतेश को अमेरिका भेजने का अवसर दिया। प्रीतेश अमेरिका के ओहियो विश्वविद्यालय में कंप्यूटर साइंस और एआई में मास्टर्स कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वहीं पढ़ाने का काम भी करने लगे हैं। यानी एक तरफ पिता खेत में सफेद मूसली की फसल तैयार कर रहे हैं, दूसरी तरफ बेटा अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई और शिक्षण से जुड़ा है।
यह कहानी सिर्फ एक किसान परिवार की आर्थिक सफलता नहीं है। यह उस बदलाव का उदाहरण भी है जिसमें खेती से होने वाली आय परिवार के बच्चों की उच्च शिक्षा और करियर के लिए मजबूत आधार बन रही है।
5 से 7 लाख तक मुनाफे का दावा
अनिल वर्मा बताते हैं कि सफेद मूसली के अलावा वे पपीता, प्याज और सोयाबीन की खेती भी करते हैं। उनके पास दो कुएं और एक ट्यूबवेल है, जिससे सिंचाई की व्यवस्था बनी हुई है। वे बताते हैं कि अच्छी गुणवत्ता वाली सफेद मूसली की बाजार में अच्छी मांग है। उनके क्षेत्र में करीब 1500 एकड़ में सफेद मूसली की खेती हो रही है और लगभग एक हजार किसान इससे जुड़े हुए हैं।
अनिल के अनुसार सफेद मूसली की खेती से सालाना करीब 5 से 7 लाख रुपये तक का मुनाफा हो सकता है। हालांकि वास्तविक लाभ लागत, उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार भाव के अनुसार बदल सकता है, लेकिन उनके अनुभव में यह फसल किसानों के लिए लाभ का महत्वपूर्ण विकल्प बन रही है।
मशीन ने घटाई मजदूरी, बढ़ी रफ्तार
सफेद मूसली की खेती में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इसकी प्रोसेसिंग रही है। पहले मूसली के छिलके हाथ से निकालने पड़ते थे। इसमें काफी मजदूरों की जरूरत होती थी और समय भी ज्यादा लगता था। अब मशीन ने यह काम आसान कर दिया है। अनिल वर्मा के मुताबिक छिलके निकालने की मशीन पर केंद्र सरकार की ओर से 35 प्रतिशत सब्सिडी मिली। इसके बाद क्षेत्र के करीब 50 से 60 किसानों ने ऐसी मशीनें खरीद ली हैं। यानी यहां कहानी सिर्फ नई फसल अपनाने की नहीं है। किसान अब खेती के साथ मशीन, प्रोसेसिंग और लागत प्रबंधन पर भी ध्यान दे रहा है। यही बदलाव कृषि को पारंपरिक उत्पादन से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक खेती की दिशा में ले जाता है।
जैविक खेती में मध्यप्रदेश की बड़ी हिस्सेदारी
बलराम कृषि महोत्सव में सामने आई इन कहानियों को प्रदेश में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने की व्यापक तस्वीर से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सरकारी जानकारी के अनुसार देश में हो रही जैविक खेती में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत से अधिक है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत प्रदेश में 1513 क्लस्टर बनाए गए हैं और करीब 1 लाख 89 हजार किसानों को इससे जोड़ा गया है।
प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों के लिए देशी गोपालन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 900 रुपये प्रतिमाह अनुदान का प्रावधान भी बताया गया है। यहां सरकार का फोकस केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि खेती की लागत कम करने, प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल और किसानों को वैकल्पिक कृषि मॉडल से जोड़ने पर भी है।
बलराम कृषि महोत्सव में किसानों की आवाज
खरगोन में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों से ऑनलाइन संवाद किया। किसानों ने अपने अनुभव साझा किए और कृषि क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा की। मुख्यमंत्री ने किसानों की उपलब्धियों की सराहना की। किसानों ने भी मुख्यमंत्री के सहज और संवादात्मक अंदाज की प्रशंसा की। दरअसल, बलराम कृषि महोत्सव का महत्व केवल सरकारी योजनाओं के प्रचार तक सीमित नहीं है। ऐसे आयोजन उन किसानों की कहानियों को सामने लाते हैं, जिन्होंने खेती में प्रयोग करके अपनी आर्थिक स्थिति बदलने की कोशिश की है।
खेत अब सपनों की पहली सीढ़ी
अविनाश दांगी के खेत में जैविक हल्दी, धनिया और मिर्च देश के 13 राज्यों तक पहुंच रही है। अनिल वर्मा की सफेद मूसली ने उनके बेटे को अमेरिका में एआई की पढ़ाई तक पहुंचाने में मदद की। दोनों कहानियों में रास्ता अलग है, लेकिन संदेश एक ही—किसान अगर फसल का चुनाव बाजार की जरूरत के हिसाब से करे, तकनीक अपनाए और खेती को व्यवसाय की तरह समझे तो खेत आर्थिक बदलाव का बड़ा माध्यम बन सकता है। मध्यप्रदेश के कृषक कल्याण वर्ष 2026 में सामने आई ये कहानियां इसलिए खास हैं क्योंकि इनमें आंकड़ों से ज्यादा एक तस्वीर दिखाई देती है—एक तरफ खेत में मिट्टी से जुड़ा किसान और दूसरी तरफ उसी खेत की कमाई से दुनिया के बड़े शिक्षण संस्थानों तक पहुंचती अगली पीढ़ी।
यानी अब किसान की मंजिल सिर्फ अच्छी फसल नहीं…
अच्छी फसल से अच्छी आमदनी, आमदनी से बच्चों की बेहतर शिक्षा और शिक्षा से परिवार के भविष्य की नई उड़ान भी है।