मिट्टी के आंगन से अंतरराष्ट्रीय रिंग तक… उज्जैन की बॉक्सर दिव्या नागर गढ़ रहीं चैंपियन

From an earthen courtyard to the international ring Ujjain boxer Divya Nagar is forging a path to becoming a champion

यह कहानी सिर्फ एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की पहल नहीं, बल्कि गांव के बच्चों में छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने के सपने की कहानी है।

आंगनवाड़ी में बच्चों को योग, फिटनेस और बॉक्सिंग की ट्रेनिंग, ओलंपिक पदक का सपना

उज्जैन। एक तरफ आंगनवाड़ी का आंगन… दूसरी तरफ नन्हे-नन्हे कदमों में फुर्ती, आंखों में आत्मविश्वास और मुट्ठियों में जीत का जज्बा। जहां कभी बच्चों की दिनचर्या पोषण, खेल और शुरुआती शिक्षा तक सीमित थी, वहीं अब उसी आंगन में योग, प्राणायाम, बेसिक फिटनेस और बॉक्सिंग की शुरुआती ट्रेनिंग दी जा रही है। इस बदलाव की कहानी लिख रही हैं उज्जैन के इंगोरिया विकासखंड की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता दिव्या नागर

दिव्या नागर के लिए बॉक्सिंग केवल एक खेल नहीं है। रिंग में उन्होंने जिस अनुशासन, संघर्ष और आत्मविश्वास को महसूस किया, अब वही अनुभव वे गांव के बच्चों के जीवन में उतारने की कोशिश कर रही हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। कमी होती है तो सिर्फ सही दिशा, प्रशिक्षण और अवसर की। यही सोच दिव्या को आंगनवाड़ी के बच्चों के बीच लेकर आई। उन्होंने बच्चों को सिर्फ रोजमर्रा की गतिविधियों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें खेल और शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना शुरू किया।

सुबह होती है योग से शुरुआत

आंगनवाड़ी में सुबह का माहौल अब कुछ अलग नजर आता है। नन्हे बच्चे योगासन करते हैं, प्राणायाम करते हैं और अलग-अलग शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। शुरुआत में बच्चों के लिए ये गतिविधियां किसी खेल से कम नहीं थीं, लेकिन धीरे-धीरे यही उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गईं।

दिव्या बच्चों को खेल-खेल में योग और फिटनेस का महत्व समझाती हैं। उनका मानना है कि बचपन से ही बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रखने से उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी एकाग्रता और आत्मविश्वास का भी विकास होता है। वह बच्चों से कहती हैं कि खेल सिर्फ शरीर को मजबूत करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हार के डर को खत्म करने और लगातार प्रयास करते रहने की सीख भी देता है। यही वजह है कि बच्चों के लिए योग अब कोई कठिन अभ्यास नहीं, बल्कि मस्ती और सीख का हिस्सा बन चुका है।

बॉक्सर से बनीं बच्चों की प्रेरणास्रोत

दिव्या खुद बॉक्सिंग से जुड़ी रही हैं। रिंग में उतरने के लिए जिस मानसिक मजबूती और शारीरिक अनुशासन की जरूरत होती है, वह इसे करीब से समझती हैं। इसी अनुभव का इस्तेमाल वह बच्चों को प्रशिक्षित करने में कर रही हैं। हालांकि नन्हे बच्चों को अभी बॉक्सिंग की शुरुआती और उम्र के अनुरूप गतिविधियां ही कराई जाती हैं, लेकिन इन अभ्यासों के जरिए उनमें फुर्ती, संतुलन, अनुशासन और आत्मविश्वास विकसित करने की कोशिश की जा रही है।

जब छोटे-छोटे बच्चे दिव्या के साथ पंचिंग की प्रैक्टिस करते हैं, तो उनके चेहरों पर उत्साह साफ नजर आता है। किसी के लिए यह खेल है, किसी के लिए नया अनुभव और किसी के लिए शायद भविष्य के बड़े सपने की पहली सीढ़ी। दिव्या के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है—बच्चों को यह विश्वास दिलाना कि वे भी कुछ बड़ा कर सकते हैं।

बदली गांव की सोच

दिव्या की पहल का असर सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं रहा। शुरुआत में गांव के कई लोगों के लिए आंगनवाड़ी का मतलब पोषण आहार, टीकाकरण और बच्चों की प्राथमिक देखभाल तक ही था। लेकिन जब उन्होंने अपने बच्चों को नियमित रूप से योग करते, व्यायाम करते और खेल गतिविधियों में भाग लेते देखा तो उनकी सोच भी बदलने लगी। अब अभिभावकों को महसूस होने लगा है कि बच्चों के सर्वांगीण विकास में खेल की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शारीरिक गतिविधियों से बच्चों में अनुशासन और आत्मविश्वास बढ़ता है और वे टीम भावना तथा प्रतिस्पर्धा की भावना को भी समझते हैं।

दिव्या ने आंगनवाड़ी को बच्चों के लिए ऐसा स्थान बनाने की कोशिश की है, जहां उन्हें पोषण और प्रारंभिक शिक्षा के साथ-साथ अपने भीतर की प्रतिभा को पहचानने का अवसर भी मिले।

गांव से निकलेंगे चैंपियन

दिव्या का सपना इस पहल से कहीं बड़ा है।

वह चाहती हैं कि आज आंगनवाड़ी के आंगन में योग और फिटनेस करने वाला कोई बच्चा कल खेल के बड़े मंच पर नजर आए। वह दिन आए जब गांव का कोई बच्चा जिला, संभाग और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं को पार करते हुए राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। और सपना यहीं खत्म नहीं होता। दिव्या की नजर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है। वह चाहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे भी देश का प्रतिनिधित्व करें और दुनिया के सामने अपनी प्रतिभा साबित करें। उनकी कल्पना में वह तस्वीर साफ है, जब गांव का कोई बच्चा राष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लेकर खड़ा हो और भविष्य में ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर भारत के लिए पदक जीते।

सुविधाएं कम, हौसला बड़ा

ग्रामीण इलाकों में खेल प्रतिभाओं को अक्सर संसाधनों और सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ता है। बड़े शहरों में जहां खिलाड़ियों को बेहतर मैदान, प्रशिक्षक और आधुनिक सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो सकती हैं, वहीं गांवों के बच्चों को कई बार शुरुआती अवसर भी नहीं मिल पाता। दिव्या इसी अंतर को कम करने की कोशिश कर रही हैं। उनका संदेश साफ है—प्रतिभा को पहचानने के लिए बड़े स्टेडियम की जरूरत नहीं, एक संवेदनशील नजर और उसे अवसर देने का जज्बा चाहिए। आंगनवाड़ी का छोटा सा परिसर फिलहाल बच्चों की शुरुआती ट्रेनिंग का मैदान है। लेकिन दिव्या की सोच इस छोटे से आंगन की सीमाओं से कहीं आगे जाती है।

एक आंगनवाड़ी, कई सपने

दिव्या नागर की कहानी इस बात का उदाहरण है कि बदलाव हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं आता। कई बार एक व्यक्ति की प्रतिबद्धता ही पूरे माहौल को बदलने के लिए काफी होती है। एक ओर वह बच्चों की देखभाल करने वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, तो दूसरी ओर बॉक्सिंग रिंग का अनुभव रखने वाली खिलाड़ी। इन दोनों भूमिकाओं को उन्होंने इस तरह जोड़ा है कि बच्चों को ममता के साथ अनुशासन और खेल के साथ आत्मविश्वास मिल रहा है।

आज इन बच्चों की मुट्ठियां भले ही छोटी हैं, लेकिन उनके सपने बड़े हैं। किसी के कदम अभी योगासन सीख रहे हैं, किसी के हाथ पंचिंग की शुरुआती मुद्रा में हैं। मगर इन्हीं छोटे कदमों और छोटी मुट्ठियों में भविष्य के बड़े खिलाड़ियों की कहानी छिपी हो सकती है। उज्जैन के इस छोटे से गांव में दिव्या नागर ने एक ऐसा सपना बोया है, जिसकी मंजिल सिर्फ खेल मैदान नहीं बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच है। क्योंकि चैंपियन बनने की शुरुआत हमेशा बड़े स्टेडियम से नहीं होती… कई बार वह मिट्टी के एक छोटे से आंगन में, किसी एक शिक्षक या प्रशिक्षक के भरोसे से शुरू होती है।

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