ममता की छांव, उम्मीद की रोशनी: एक महिला, कई जिंदगियों की नई शुरुआत

sensitive initiative from Mandsaur

ममता की छांव, उम्मीद की रोशनी: एक महिला, कई जिंदगियों की नई शुरुआत

मध्य प्रदेश के मंदसौर से निकली एक संवेदनशील पहल आज उन महिलाओं के जीवन में उजाला भर रही है, जिन्हें समाज अक्सर ‘विक्षिप्त’ कहकर नजरअंदाज कर देता है। इन भूली-बिसरी जिंदगियों को पहचान, सम्मान और परिवार लौटाने का काम कर रही हैं श्रीमती अनामिका जैन—जो अब कई बेसहारा महिलाओं के लिए उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी हैं।

एक सोच से शुरू हुआ सेवा का सफर

करीब 17–18 साल पहले अपने पिता के साथ समाजसेवा की राह पर चलीं अनामिका जैन ने जब निराश्रित और मानसिक रूप से अस्वस्थ महिलाओं की हालत देखी, तो मन द्रवित हो उठा। MSW की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने तय कर लिया कि वे समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग के लिए काम करेंगी। शुरुआत में वे इन महिलाओं को इंदौर और उज्जैन के आश्रमों तक पहुंचाती रहीं, लेकिन जगह की कमी और व्यवस्थाओं की सीमाओं ने उन्हें एक बड़ा कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।

अपना घर” बना सहारा

वर्ष 2018 में रेवास देवड़ा रोड स्थित शासकीय भवन में उन्होंने “अनामिका जनकल्याण सेवा समिति विक्षिप्त आश्रय गृह” की स्थापना की। यह सिर्फ एक आश्रय नहीं, बल्कि उन महिलाओं के लिए “घर” है—जहां उन्हें दवा के साथ-साथ प्यार, अपनापन और सम्मान मिलता है। यहां त्यौहार सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि खुशी और अपनत्व का एहसास होते हैं—जहां हर महिला खुद को अकेला नहीं, परिवार का हिस्सा महसूस करती है।

तकनीक और संवेदना का अनोखा संगम

अनामिका जैन का काम केवल देखभाल तक सीमित नहीं है।

अब तक 54 महिलाएं अपने परिवार से मिल चुकी हैं—यह आंकड़ा नहीं, बल्कि 54 कहानियों का पुनर्जन्म है।

सेवा को मिला सम्मान

उनकी इस अनूठी पहल को राज्य स्तर पर भी सराहा गया। महिला उत्पीड़न रोकने, बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता और पुनर्वास कार्यों के लिए उन्हें रानी अवंती बाई राज्य स्तरीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस सफर में उनके पति का सहयोग भी उनकी ताकत बना रहा।

भविष्य का सपना: आत्मनिर्भरता की राह

अनामिका जैन का लक्ष्य सिर्फ आश्रय देना नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है।

वे एक ऐसे बड़े पुनर्वास केंद्र का सपना देख रही हैं, जहां हर महिला को शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन मिल सके।

एक संदेश, जो दिल को छू जाए

अगर हम एक-दूसरे का हाथ थाम लें, तो कोई भी समाज असहाय नहीं रहेगा। ये कहानी सिर्फ सेवा की नहीं… बल्कि उस जज्बे की है, जो टूट चुकी जिंदगियों को फिर से जोड़ देता है। श्रीमती अनामिका जैन ने साबित कर दिया है— ममता अगर संकल्प बन जाए… तो हर अंधेरे में रोशनी जरूर मिलती है।

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