देश में नकदी व्यवस्था को और मजबूत तथा आधुनिक बनाने की दिशा में भारतीय रिजर्व बैंक एक बार फिर बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। आरबीआई अब पॉलीमर यानी प्लास्टिक आधारित करेंसी नोटों को लेकर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि यह योजना अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन यदि इसे मंजूरी मिलती है तो आने वाले वर्षों में भारतीयों के हाथों में कागज की जगह प्लास्टिक आधारित नोट दिखाई दे सकते हैं। इससे पहले भी ऐसा प्रयास किया गया था, लेकिन तकनीकी चुनौतियों के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी थी।
भारतीय रिजर्व बैंक नई पीढ़ी की करेंसी व्यवस्था पर कर रहा है मंथन
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिए हैं कि केंद्रीय बैंक देश में पॉलीमर नोटों को लागू करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है। बैंक का मानना है कि बदलते समय के साथ करेंसी को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और आधुनिक बनाना जरूरी है। फिलहाल इस प्रस्ताव पर शुरुआती स्तर पर चर्चा चल रही है और विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन किया जा रहा है। यदि योजना आगे बढ़ती है तो यह भारतीय मुद्रा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
साल 2012 में पांच शहरों में किया गया था प्लास्टिक नोटों का परीक्षण
भारत में पॉलीमर नोटों का विचार बिल्कुल नया नहीं है। फरवरी 2012 में देश के पांच शहरों—कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला—में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का परीक्षण किया गया था। उस समय उद्देश्य यह था कि नोटों की मजबूती और उपयोगिता को परखा जा सके। हालांकि एटीएम मशीनों और अन्य बैंकिंग उपकरणों के साथ तकनीकी दिक्कतें सामने आईं, जिसके कारण इस प्रयोग को आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इसके बाद यह योजना लंबे समय तक ठंडे बस्ते में चली गई।
कागज नहीं बल्कि विशेष प्लास्टिक सामग्री से तैयार होते हैं पॉलीमर नोट
पॉलीमर करेंसी पारंपरिक कागजी नोटों से पूरी तरह अलग होती है। इन्हें विशेष प्रकार की प्लास्टिक सामग्री Bi-axially Oriented Polypropylene (BOPP) से तैयार किया जाता है। यह सामग्री हल्की, लचीली और मजबूत होती है। हालांकि इन्हें प्लास्टिक नोट कहा जाता है, लेकिन ये किसी कार्ड की तरह कठोर नहीं होते। इन्हें सामान्य नोटों की तरह मोड़ा और जेब में रखा जा सकता है। यही वजह है कि कई देशों ने इन्हें अपनाया है।
टिकाऊपन और सुरक्षा के कारण दुनिया के कई देशों की पहली पसंद बने पॉलीमर नोट
विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलीमर नोट कागजी नोटों की तुलना में अधिक समय तक चलते हैं। इन पर नमी, धूल और गंदगी का असर कम पड़ता है, जिससे नोट जल्दी खराब नहीं होते। लंबी उम्र होने के कारण बार-बार नए नोट छापने की आवश्यकता भी कम हो जाती है। इसके अलावा इनमें आधुनिक सुरक्षा फीचर्स जोड़ना आसान होता है, जिससे नकली नोटों पर भी काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।
ऑस्ट्रेलिया से शुरू हुआ सफर, कई देशों में पहले से चल रही है यह करेंसी
प्लास्टिक आधारित मुद्रा का उपयोग सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने शुरू किया था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और रोमानिया जैसे देशों ने भी पॉलीमर नोटों को अपनाया। इन देशों में यह व्यवस्था सफल मानी गई है। अब यदि भारत भी इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह देश की मुद्रा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा और नकदी प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।





