राम बनाम शिव की सियासत!….रेवंत के बयान से गरमाई राजनीति, पुराने बयानों की भी खुली फाइल

राम बनाम शिव की सियासत!….रेवंत के बयान से गरमाई राजनीति, पुराने बयानों की भी खुली फाइल

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का भगवान राम और भगवान शिव को लेकर दिया गया बयान अब एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया है। दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में रेवंत रेड्डी ने उत्तर-दक्षिण और आर्य-द्रविड़ पहचान की चर्चा करते हुए कहा कि शिव गरीबों के भगवान हैं और राम अमीरों के भगवान, साथ ही बीजेपी पर भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी सवाल किया कि बीजेपी नेता ‘जय श्रीराम’ बोलते हैं, लेकिन ‘हर हर महादेव’ क्यों नहीं बोलते।

1. भगवानों के नाम पर राजनीतिक लाइन

रेवंत रेड्डी के बयान में सिर्फ राम और शिव की तुलना नहीं है, बल्कि इसके साथ उत्तर बनाम दक्षिण और आर्य बनाम द्रविड़ का राजनीतिक संदर्भ भी जुड़ा है। यही वजह है कि बयान धार्मिक चर्चा से निकलकर सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया।

रेड्डी ने बीजेपी पर राम को राजनीतिक प्रतीक बनाने का आरोप लगाया। बीजेपी की ओर से केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार ने पलटवार करते हुए कहा कि राम और शिव को राजनीतिक रूप से अलग-अलग खांचों में रखने की कोशिश की जा रही है। यह आरोप बीजेपी का राजनीतिक पक्ष है, जिसे रेवंत रेड्डी की ओर से लगाए गए आरोपों से अलग देखा जाना चाहिए।

2. क्या यह पहली बार है? नहीं

रेवंत रेड्डी के बयानों को लेकर इससे पहले भी धार्मिक प्रतीकों पर राजनीतिक विवाद सामने आ चुका है।दिसंबर 2025 में एक कांग्रेस कार्यक्रम में उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं की संख्या और अलग-अलग लोगों की धार्मिक मान्यताओं पर टिप्पणी की थी। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने अविवाहित लोगों के संदर्भ में हनुमान और अलग-अलग सामाजिक प्रथाओं से जुड़े देवताओं का उदाहरण दिया था। इस बयान के बाद बीजेपी और बीआरएस ने उनसे माफी की मांग की थी।

इसके अलावा 2024 में रेवंत रेड्डी ने बीजेपी पर धार्मिक प्रतीकों के जरिए वोट मांगने का आरोप लगाते हुए कहा था कि भगवान मंदिर में होने चाहिए और आस्था दिल में। इस बयान को लेकर भी बीजेपी की ओर से प्रतिक्रिया आई थी।

यानी मौजूदा राम-शिव विवाद को अकेले बयान के रूप में देखने के बजाय इसे रेवंत रेड्डी के धर्म और राजनीति पर पहले दिए गए बयानों की श्रृंखला के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

3. बिहार DNA वाला बयान भी चर्चा में

रेवंत रेड्डी का एक पुराना राजनीतिक विवाद बिहार के DNA से जुड़े बयान को लेकर भी रहा है। दिसंबर 2023 में बिहार और तेलंगाना की राजनीति के संदर्भ में उनके बयान पर विवाद हुआ था। उस समय भी उनके बयान को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली थी।

इसलिए रेवंत रेड्डी के राजनीतिक सफर में विवादित बयानों का संदर्भ नया नहीं है। हालांकि हर बयान का संदर्भ और राजनीतिक मुद्दा अलग है, इसलिए उन्हें एक ही अर्थ में जोड़ना उचित नहीं होगा।

4. बीजेपी का पलटवार भी सियासी संदेश

बीजेपी ने मौजूदा बयान को लेकर रेवंत रेड्डी पर हिंदू देवी-देवताओं को राजनीतिक खांचों में बांटने का आरोप लगाया है। बंदी संजय कुमार ने काशी विश्वनाथ, वेमुलावाड़ा और भद्राचलम जैसे धार्मिक स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिव और राम की उपासना को उत्तर-दक्षिण की सीमा में नहीं बांटा जा सकता।

बीजेपी की प्रतिक्रिया का राजनीतिक संदेश साफ है—राम और शिव दोनों की व्यापक धार्मिक स्वीकार्यता को सामने रखकर रेवंत के आर्य-द्रविड़ और अमीर-गरीब वाले तर्क को चुनौती देना।

5. पुराने विवादों से जुड़ता नया विवाद

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है। जब भी कोई बड़ा राजनीतिक नेता धार्मिक प्रतीकों को जाति, वर्ग, क्षेत्र या पार्टी की राजनीति से जोड़कर बयान देता है, तो बहस तत्काल मूल राजनीतिक मुद्दे से हटकर धार्मिक पहचान पर पहुंच जाती है।

रेवंत रेड्डी का मौजूदा बयान भी इसी वजह से चर्चा में है। एक तरफ उनका तर्क है कि बीजेपी ने भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक बना लिया है। दूसरी तरफ बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस मुख्यमंत्री के स्तर से राम और शिव को अलग-अलग राजनीतिक खांचों में रख रही है। दोनों पक्षों के ये दावे राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें उसी रूप में देखा जाना चाहिए।

6. असली सवाल—राजनीति में भगवानों की एंट्री

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल अपने वैचारिक संघर्ष में धार्मिक प्रतीकों को केंद्र में लाते रहेंगे? ‘जय श्रीराम’ और ‘हर हर महादेव’ जैसे धार्मिक उद्घोष भारत में व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ रखते हैं। इन्हें सीधे किसी एक राजनीतिक दल या आर्थिक वर्ग से जोड़ने का प्रयास स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विवाद पैदा करता है।

रेवंत रेड्डी के बयान ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है—क्या चुनावी राजनीति में राम, शिव, हनुमान जैसे धार्मिक प्रतीकों की व्याख्या राजनीतिक विचारधारा के हिसाब से होनी चाहिए, या आस्था को राजनीतिक मुकाबले से अलग रखा जाना चाहिए? और यही वजह है कि ‘राम अमीरों के, शिव गरीबों के’ वाला बयान सिर्फ एक बयान नहीं रह गया है। यह अब धर्म, क्षेत्रीय पहचान और चुनावी राजनीति के टकराव की नई बहस बन चुका है।

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