केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत मिलने वाली एलपीजी सब्सिडी को लेकर बड़ा फैसला लिया है। अब योजना के लाभार्थियों को एक साल में 9 की जगह केवल 4 सब्सिडी वाले गैस सिलेंडर मिलेंगे। इस बदलाव के बाद करोड़ों परिवारों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। सरकार का कहना है कि इससे योजना को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा, जबकि विपक्ष और कई विशेषज्ञ इसे बढ़ते वित्तीय दबाव से जोड़कर देख रहे हैं।
उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए नियमों में किया गया बड़ा परिवर्तन
साल 2016 में शुरू हुई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत शुरुआत में लाभार्थियों को 12 सब्सिडी वाले सिलेंडर उपलब्ध कराए जाते थे। बाद में यह संख्या घटाकर 9 कर दी गई थी और अब इसे घटाकर 4 कर दिया गया है। इस फैसले ने योजना के भविष्य और सरकार की कल्याणकारी नीतियों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
सरकारी खर्च कम करने और संसाधनों के बेहतर उपयोग की तैयारी
सरकार वर्तमान में एलपीजी सब्सिडी पर हर साल लगभग 11 से 12 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इसके अलावा तेल विपणन कंपनियों को नुकसान की भरपाई के लिए करीब 30 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त समर्थन दिया जा रहा है। इस तरह कुल सहायता राशि 41 हजार करोड़ रुपये के आसपास पहुंच रही है। ऐसे में खर्च को नियंत्रित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई सरकार की चिंता
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल का बदलाव होता है तो भारत के आयात बिल पर 1 से 1.5 लाख करोड़ रुपये तक का असर पड़ सकता है।
योजना के दुरुपयोग को रोकने की भी बताई जा रही वजह
सरकारी सूत्रों का मानना है कि कुछ मामलों में सब्सिडी वाले सिलेंडरों का व्यावसायिक उपयोग और गलत तरीके से डायवर्जन देखने को मिला था। नई व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे मामलों पर रोक लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि योजना का लाभ वास्तव में पात्र परिवारों तक पहुंचे।
कल्याणकारी योजनाओं और राजकोषीय संतुलन के बीच सरकार की नई चुनौती
देश में खाद्य, उर्वरक और ईंधन से जुड़ी विभिन्न सब्सिडी योजनाओं पर सरकार का सालाना खर्च लगभग 4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। ऐसे में बढ़ती वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और ऊर्जा लागत के बीच सरकार कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखते हुए वित्तीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। उज्ज्वला योजना में किया गया यह बदलाव उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।