पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील ने देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ईंधन की बचत करने, अनावश्यक सोना खरीदने से बचने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और स्थानीय उत्पादों के उपयोग को उपयोग को पहली प्राथमिकता दिये जाने की बात पीएम ने कही है।
प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद विपक्षी दलों ने सरकार पर हमला तेज कर दिया। कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने इसे सरकार की आर्थिक नाकामी बताते हुए कहा कि जनता को त्याग और बचत की सलाह देना विफल शासन का संकेत है। वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने भी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि आम जनता पहले से महंगाई का बोझ झेल रही है और अब सरकार जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल रही है।
केन्द्र की मोदी सरकार इसे आर्थिक अनुशासन ही नहीं राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश भी करार दे रही है। वहीं दूसरी ओर हर बार की तरह इस बार भी विपक्ष पीएम मोदी की इस अपील को सरकार की विफलता के तौर पर पेश करते हुए अपने नंबर बढ़ाने की कवायद में जुटा है। ऊर्जा बचत, सोना खरीदने में संयम और लोकल उत्पादों को बढ़ावा देने की सलाह पर छिड़ी राजनीतिक बहस सरकार ने इसे राष्ट्रीय जिम्मेदारी बताया, विपक्ष ने आर्थिक विफलता करार दिया
दरअसल, दुनिया इस समय गंभीर भू-राजनीतिक तनाव के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पहले ही वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित थी। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट ने ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है।
भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। भारत करीब 40 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी विदेशों से खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से अपील की है कि वे पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करें, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाएं और गैर-जरूरी खर्चों में संयम बरतें। उन्होंने विशेष रूप से सोने की अनावश्यक खरीद से बचने की बात कही, क्योंकि भारत हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। सरकार का मानना है कि यदि लोग स्वेच्छा से कुछ आर्थिक अनुशासन अपनाते हैं, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया जा सकता है। तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात भारत के व्यापार घाटे को लगातार बढ़ाते हैं। ऐसे में गैर-जरूरी आयात कम करने से आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।सरकार का तर्क है कि यह अपील किसी भय या संकट की घोषणा नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी का हिस्सा है। उनका कहना है कि दुनिया के कई देशों में ऊर्जा संकट के दौरान नागरिकों से इसी तरह सहयोग की अपेक्षा की गई थी। जापान, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में लोगों ने बिजली और ईंधन की बचत को राष्ट्रहित का हिस्सा माना था।
सरकार यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि देश में फिलहाल पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का पर्याप्त भंडार मौजूद है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार किसी भी राज्य से ईंधन की कमी की सूचना नहीं मिली है। तेल रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं और तेल विपणन कंपनियां वैश्विक कीमतें बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियों के समय सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जहां सरकार पर संकट से निपटने की जिम्मेदारी होती है, वहीं विपक्ष से रचनात्मक सुझाव और संतुलित आलोचना की अपेक्षा की जाती है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में हर मुद्दा राजनीतिक टकराव का विषय बनता जा रहा है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी की अपील को लेकर राजनीतिक मतभेद भले जारी हों, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक स्थिरता जैसे मुद्दे आने वाले समय में देश की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहने वाले हैं।