- पेपर लीक से फिर उठे सवाल
- री-एग्जाम ने बढ़ाया मानसिक दबाव
- छात्रों का सिस्टम से उठता भरोसा
- माता-पिता भी चिंता में डूबे
- सुधार नहीं हुआ तो बढ़ेगा संकट
नई दिल्ली। देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल नीट (NEET) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द हुई, लाखों छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी और अब भी व्यवस्था पर भरोसा बहाल नहीं हो सका है। इसी बीच सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली पर विवाद और महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के पेपर लीक के बाद रद्द होने से शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
21 जून को आयोजित नीट री-एग्जाम में 20 लाख से अधिक छात्रों ने दोबारा परीक्षा दी। परीक्षा के दौरान बिहार में कथित तौर पर सॉल्वर गिरोह पकड़े जाने की खबर सामने आई, जबकि अधिकांश परीक्षा केंद्रों पर कड़ी निगरानी के बीच परीक्षा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई। इसके बावजूद छात्रों के मन में यह सवाल बना हुआ है कि क्या अब उनकी मेहनत का सही मूल्यांकन हो सकेगा।
इससे पहले 3 मई को हुई नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक की घटनाओं के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। इसका सबसे अधिक असर उन लाखों छात्रों पर पड़ा, जिन्होंने महीनों और वर्षों की तैयारी के बाद परीक्षा दी थी। री-एग्जाम की घोषणा ने उनके मानसिक तनाव को और बढ़ा दिया। कई छात्रों ने स्वीकार किया कि पहली परीक्षा के बाद दोबारा उसी स्तर की तैयारी करना बेहद कठिन था।
नीट अभ्यर्थियों का कहना है कि लगातार बदलती परिस्थितियों ने उनका आत्मविश्वास कमजोर किया है। कुछ छात्रों ने बताया कि उन्होंने रोज़ 12 से 14 घंटे पढ़ाई की, लेकिन परीक्षा रद्द होने की खबर ने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया। कई अभ्यर्थियों ने यह भी कहा कि डॉक्टर बनने का सपना ही उन्हें दोबारा परीक्षा देने की हिम्मत देता रहा।
उधर, सीबीएसई की 12वीं बोर्ड परीक्षा में लागू ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर भी असंतोष बना हुआ है। कई छात्र संशोधित अंकों का इंतजार कर रहे हैं। वहीं महाराष्ट्र में 28 जून को प्रस्तावित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) भी कथित पेपर लीक के बाद रद्द कर दी गई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि परीक्षा सुरक्षा की चुनौती केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और री-एग्जाम जैसी घटनाएं केवल परीक्षा प्रणाली ही नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं। इसका सबसे बड़ा असर उन छात्रों पर पड़ता है, जो वर्षों तक कठिन परिश्रम कर अपने करियर का सपना देखते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाएं छात्रों और अभिभावकों का भरोसा फिर से जीत पाएंगी? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मजबूत तकनीकी और कानूनी व्यवस्था बनाई जाएगी? क्योंकि किसी भी परीक्षा की सबसे बड़ी पूंजी उसका निष्पक्ष और विश्वसनीय होना है। यदि यही भरोसा कमजोर पड़ गया, तो उसका असर केवल एक परीक्षा पर नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ेगा।





