देश में योग-मेडिटेशन करने वाले 54 करोड़ से ज्यादा..जानें 10 साल में कितने प्रतिशत हुई वृद्धि

yoga and meditation

“देश में योग-मेडिटेशन करने वाले 54 करोड़ से ज्यादा, 10 साल में 80% बढ़े” – ये सिर्फ एक हेल्थ स्टोरी नहीं है, ये भारत में एक बहुत बड़े सांस्कृतिक और आर्थिक शिफ्ट का सबूत है।

1. आंकड़ा क्या कह रहा है? 54 करोड़ का मतलब समझिए

बीते 10 साल में वैकल्पिक हीलिंग का ग्राफ सीधा 80% ऊपर गया है। NSSO और आयुष मंत्रालय के अनुमान के अनुसार आज भारत में योग-ध्यान से जुड़ा हर व्यक्ति अगर एक्टिव प्रैक्टिशनर मान लें तो ये आबादी अमेरिका की कुल आबादी से भी ज्यादा है।
इसका दूसरा पहलू ये है कि होलिस्टिक हीलिंग अब सिर्फ बाबाओं या आश्रमों तक सीमित नहीं है। खबर में जिन शब्दों का जिक्र है – साउंड हीलिंग, माइंडफुलनेस, विपश्यना, पास्ट लाइफ रिग्रेशन थेरेपी, मून बाथिंग, फॉरेस्ट बाथिंग – ये सभी इंस्टाग्राम-जेनरेशन की शब्दावली है। मतलब योग अब धोती-कुर्ता से निकलकर एथलीजर और रील्स में आ गया है।

2. ये बूम अचानक क्यों आया? 3 बड़े कारण

A. एलोपैथी से थकान और मानसिक स्वास्थ्य का संकट:

कोविड के बाद भारत में एंग्जायटी, बर्नआउट और नींद न आने की समस्या 3 गुना बढ़ी है। AIIMS की एक स्टडी के अनुसार 18-35 साल के 60% युवा कहते हैं कि दवा उन्हें तुरंत आराम तो देती है, पर जड़ से ठीक नहीं करती। युवा अब गोली नहीं, प्रोसेस चाहता है। साउंड हीलिंग में 432 Hz फ्रीक्वेंसी या फॉरेस्ट बाथिंग में पेड़ों के बीच चलना उन्हें एक ऐसा कंट्रोल देता है जो डॉक्टर के पर्चे में नहीं है।

B. पश्चिमी मुहर और देसी जड़:

विडंबना देखिए, माइंडफुलनेस और योग को जब हार्वर्ड और गूगल ने ‘प्रोडक्टिविटी टूल’ बताया, तब भारत के युवाओं ने इसे गंभीरता से लिया। अमेरिका में वेलनेस इंडस्ट्री 4.4 ट्रिलियन डॉलर की है। भारत में वही चीज ‘सनातन’ और ‘आयुर्वेद’ के नाम पर वापस आई तो उसे आधुनिकता और संस्कृति दोनों का सपोर्ट मिल गया।

C. कम लागत, हाई-मार्जिन बिजनेस मॉडल:

एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, एक सर्टिफाइड साउंड हीलर एक सेशन का 2000 से 5000 रुपये लेता है। एक फॉरेस्ट बाथिंग वॉक का टिकट 1500 रुपये है। इसके लिए न MBBS चाहिए, न बड़ा अस्पताल। 15 दिन का सर्टिफिकेट कोर्स करके लोग कोच बन रहे हैं। इसलिए सप्लाई भी तेजी से बढ़ रही है।

3. खतरा कहाँ है?
एक जरूरी चेतावनी भी है जिसे पढ़ना जरूरी है। रेगुलेशन का शून्य: पास्ट लाइफ रिग्रेशन और मून वाटर चार्जिंग जैसी थेरेपी के लिए भारत में कोई सरकारी लाइसेंसिंग बॉडी नहीं है। कोई भी 3 दिन की ऑनलाइन क्लास करके ‘हीलर’ बन सकता है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि गंभीर डिप्रेशन या बाइपोलर डिसऑर्डर वाले मरीज अगर सिर्फ मून बाथिंग पर निर्भर हो गए तो जान का खतरा हो सकता है।
सांस्कृतिक appropriation: हम योग को सिर्फ स्ट्रेचिंग और मेडिटेशन को सिर्फ आंख बंद करना बना रहे हैं। उसके पीछे का यम, नियम, आहार, अनुशासन गायब है। नतीजा – 10 दिन में 80% लोग छोड़ भी देते हैं।

4. भविष्य: इससे पैसा और करियर कैसे बनेगा?
ये ट्रेंड रुकने वाला नहीं है। इसके 3 बड़े करियर रास्ते बन रहे हैं:
1. क्लिनिकल इंटीग्रेशन: बड़े अस्पताल अब Integrative Medicine डिपार्टमेंट खोल रहे हैं। AIIMS ऋषिकेश और NIMHANS बेंगलुरु में एलोपैथी के साथ योग थेरेपी दी जा रही है। यहाँ सर्टिफाइड योग थेरापिस्ट की मांग बढ़ेगी।
2. वेलनेस टूरिज्म: केरल, ऋषिकेश और अरुणाचल में फॉरेस्ट बाथिंग और साउंड हीलिंग रिट्रीट का किराया एक रात का 20,000 रुपये तक है। विदेशी पर्यटक इसके लिए आ रहे हैं। यह कृषि-उद्यम की तरह ही एक नया ग्रामीण उद्यम बन सकता है।
3. डिजिटल वेलनेस: 54 करोड़ लोगों का डेटा एक बहुत बड़ा मार्केट है। मेडिटेशन ऐप, स्लीप साउंड ऐप, ऑनलाइन माइंडफुलनेस कोचिंग – यह सब अगले 5 साल में 10,000 करोड़ का बाजार बनने वाला है।

कहा जा सकता है कि भारत में स्वास्थ्य की परिभाषा बदल रही है। पहले स्वास्थ्य का मतलब था ‘बीमारी का न होना’, अब इसका मतलब है ‘मन, शरीर और ऊर्जा का बैलेंस’। 10 साल में 80% की वृद्धि यह दिखाती है कि युवा अब मंदिर और मेडिकल स्टोर के बीच एक तीसरी जगह ढूंढ रहा है – जहाँ उसे जज न किया जाए, जहाँ उसे सुना जाए, और जहाँ इलाज केमिकल से नहीं, अनुभव से हो। जो इस तीसरी जगह को सही, वैज्ञानिक और ईमानदार तरीके से बना देगा, वही इस नई वेलनेस क्रांति का लीडर होगा।

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