शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया में परमाणु हथियारों की संख्या लगातार कम होती दिखाई दी थी। ऐसा माना जा रहा था कि मानवता धीरे-धीरे परमाणु युद्ध के खतरे से दूर जा रही है। लेकिन स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट ने इस धारणा को चुनौती दी है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कुल परमाणु हथियारों की संख्या में मामूली कमी जरूर आई है, लेकिन उनका खतरा पहले से अधिक बढ़ गया है। रिपोर्ट बताती है कि अब कई देश अपने परमाणु हथियारों को केवल गोदामों में रखने के बजाय उन्हें मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और अन्य लॉन्चिंग सिस्टम पर तैनात कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि ये हथियार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से इस्तेमाल किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यही स्थिति वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
SIPRI के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में दुनिया के पास लगभग 12,187 परमाणु वारहेड हैं। इनमें से करीब 9,745 वारहेड सैन्य भंडार में मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत सक्रिय किए जा सकते हैं। परमाणु हथियारों की दौड़ में अब भी अमेरिका और रूस सबसे आगे हैं। दोनों देशों के पास मिलाकर दुनिया के लगभग 83 प्रतिशत परमाणु हथियार मौजूद हैं। अमेरिका और रूस के पास पांच-पांच हजार से अधिक परमाणु वारहेड हैं। इनके बाद चीन का स्थान आता है, जिसके पास लगभग 620 परमाणु वारहेड बताए गए हैं। भारत के पास करीब 190, पाकिस्तान के पास 170, फ्रांस के पास 290, ब्रिटेन के पास 225, उत्तर कोरिया के पास 60 और इजरायल के पास लगभग 90 परमाणु हथियार होने का अनुमान है। हालांकि इजरायल आधिकारिक रूप से परमाणु हथियार रखने की पुष्टि नहीं करता।
आधुनिकीकरण की होड़ ने बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि अब केवल हथियारों की संख्या ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि उनकी क्षमता और तकनीकी उन्नयन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। अमेरिका और रूस अपने परमाणु शस्त्रागार को आधुनिक बनाने में अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं। वहीं चीन तेजी से अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है। भारत और पाकिस्तान भी अपनी मिसाइल क्षमताओं को मजबूत करने में जुटे हैं। उत्तर कोरिया लगातार नए परीक्षण कर रहा है और इजरायल की क्षमताओं को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक परमाणु हथियार अधिक सटीक, अधिक तेज और अधिक घातक होते जा रहे हैं। इससे किसी भी संघर्ष की स्थिति में विनाशकारी परिणामों की आशंका बढ़ जाती है।
कमजोर पड़ते हथियार नियंत्रण समझौते
परमाणु खतरे के बढ़ने की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण समझौतों का कमजोर होना भी है। पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण समझौते या तो समाप्त हो चुके हैं या उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन तनाव, मध्य पूर्व की अस्थिरता और एशिया में बढ़ते सामरिक संघर्षों ने वैश्विक भरोसे को कमजोर किया है। ऐसे माहौल में देश अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए हथियारों के भंडार और सैन्य क्षमताओं को बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि हथियार नियंत्रण और निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया कमजोर होती रही तो भविष्य में परमाणु हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है।
भारत और दुनिया के लिए क्या हैं मायने?
भारत के लिए यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश दो परमाणु संपन्न पड़ोसी देशों—चीन और पाकिस्तान—के बीच स्थित है। चीन की तेजी से बढ़ती परमाणु क्षमता और पाकिस्तान के सैन्य कार्यक्रम पर भारत लगातार नजर रखता है। वैश्विक स्तर पर भी यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां परमाणु हथियार केवल सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि संभावित खतरे का बड़ा स्रोत बन सकते हैं। यदि कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़े और अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ा, तो किसी क्षेत्रीय संघर्ष के वैश्विक संकट में बदलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। SIPRI की ताजा रिपोर्ट यह संकेत देती है कि दुनिया परमाणु हथियारों के मामले में एक नए और जटिल दौर में प्रवेश कर चुकी है। कुल संख्या में कमी के बावजूद हथियारों का आधुनिकीकरण, उनकी सक्रिय तैनाती और देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु युद्ध की आशंका को दूर रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और हथियार नियंत्रण समझौतों को मजबूत करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।