ग्लोबल साउथ का नया आधार: क्या ब्रिक्स में चीन का विशाल बाजार और तकनीक बनेंगे विकास के
नए इंजन?
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को जब ब्रिक्स देशों के नेता 18वें शिखर सम्मेलन के लिए जुटेंगे, तो
उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि पिछले 20 वर्षों में यह समूह कितना बड़ा हो गया है।
असली सवाल यह होगा कि क्या ब्रिक्स अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत को व्यापार, विकास वित्त, भुगतान
व्यवस्था और वैश्विक फैसलों में वास्तविक प्रभाव में बदल सकता है।
ब्रिक्स का विस्तार हो चुका है। दुनिया की बड़ी आबादी अब इसके दायरे में आती है और समूह के पास
अपना बहुपक्षीय विकास बैंक भी है। लेकिन किसी भी आर्थिक समूह की असली ताकत उसके आकार से
नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह जमीन पर कितने नए विकल्प पैदा कर सकता है।
चीन ब्रिक्स की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वह दुनिया का प्रमुख विनिर्माण केंद्र है और वैश्विक
व्यापार, स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सौर उपकरण, मशीनरी और बुनियादी ढांचे में उसकी
मजबूत मौजूदगी है। इसलिए ब्रिक्स की अगली बड़ी छलांग काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी
कि चीन अपनी आर्थिक ताकत को दूसरे विकासशील देशों के लिए बाजार, पूंजी, तकनीक और उत्पादन
के अवसरों में कितना बदल पाता है।
समय भी खास है। भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और 2027 में इसकी कमान चीन के
पास होगी। यानी एशिया की दो बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के हाथ में लगातार दो वर्षों तक इस
समूह का एजेंडा रहेगा।
दोनों देशों के बीच मतभेद वास्तविक हैं। लेकिन वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों की
भूमिका बढ़ाना, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार करना और ग्लोबल साउथ के लिए ज्यादा आर्थिक
विकल्प तैयार करना ऐसे मुद्दे हैं, जो दोनों को एक ही मेज पर भी लाते हैं।
भारत ने अपनी अध्यक्षता को “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास” के चार स्तंभों पर
रखा है। सितंबर का शिखर सम्मेलन इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चरण होगा।
आंकड़ों में ब्रिक्स का बढ़ता वजन
वाशिंगटन स्थित काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस ने 2026 के प्रमुख वैश्विक सम्मेलनों पर अपने
आकलन में ब्रिक्स के बढ़ते आकार की ओर ध्यान दिलाया है। उसके अनुसार मौजूदा 11 सदस्य देश
विश्व अर्थव्यवस्था के एक-चौथाई से अधिक और दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व
करते हैं।
ये आंकड़े अपने आप में बताते हैं कि ब्रिक्स को अब केवल पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले पुराने
समूह के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी है। सदस्य देशों की संख्या
बढ़ने के साथ उनके राष्ट्रीय हित और दृष्टिकोण भी अलग-अलग हैं। यही ब्रिक्स की ताकत भी है और
उसकी कमजोरी भी। व्यापार के आंकड़े शायद इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
भारत के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा मई में जारी आंकड़ों के अनुसार ब्रिक्स देशों के बीच वस्तु व्यापार
2003 में केवल 84 अरब डॉलर था। 2024 तक यह करीब 13 गुना बढ़कर 1.17 ट्रिलियन डॉलर हो
गया।
यह वृद्धि बताती है कि ब्रिक्स के भीतर आर्थिक रिश्ते केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति पर आधारित
नहीं हैं। उनके पीछे तेजी से बढ़ता वास्तविक व्यापार भी है। फिर भी सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के
आकार को देखते हुए इस व्यापार को और बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। यहीं चीन का महत्व और बढ़
जाता है।
चीन के विशाल बाजार, मजबूत औद्योगिक आधार और व्यापक आपूर्ति श्रृंखलाओं के बिना ब्रिक्स के
भीतर व्यापार को अगले स्तर तक ले जाना मुश्किल होगा।
जिम ओ'नील का बदला हुआ आकलन
ब्रिक्स की बदलती संभावनाओं पर सबसे दिलचस्प टिप्पणी किसी चीनी अधिकारी ने नहीं, बल्कि उस
अर्थशास्त्री ने की है, जिसने ब्रिक नाम दिया था। गोल्डमैन सैक्स के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री जिम
ओ'नील ने 2001 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन की संभावित आर्थिक ताकत को समझाने के लिए
ब्रिक शब्द का इस्तेमाल किया था। उस समय यह कोई राजनीतिक संगठन नहीं था, बल्कि चार तेजी से
उभरती अर्थव्यवस्थाओं के भविष्य को लेकर एक आर्थिक अवधारणा थी।
6 जुलाई को रॉयटर्स को दिए एक साक्षात्कार में ओ'नील ने कहा कि करीब डेढ़ साल पहले तक उन्हें
ब्रिक्स द्वारा अमेरिकी डॉलर के विकल्प तैयार करने की संभावना एक कल्पना जैसी लगती थी। अब
वह इसे इतनी आसानी से खारिज नहीं करते।
रॉयटर्स के मुताबिक भुगतान तकनीक में तेजी से आए बदलाव ने उनके आकलन को प्रभावित किया है।
भारत का यूपीआई, चीन का सीआईपीएस, दूसरे देशों की घरेलू भुगतान प्रणालियां और केंद्रीय बैंक की
डिजिटल मुद्राएं ऐसी तकनीकी संभावनाएं पैदा कर रही हैं, जिनकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक अलग
तरह से की जाती थी।
हालांकि ओ'नील की टिप्पणी को डॉलर के अंत की भविष्यवाणी समझना गलत होगा। अमेरिकी मुद्रा
आज भी वैश्विक वित्त और विदेशी मुद्रा भंडार में केंद्रीय भूमिका निभाती है और ब्रिक्स देश किसी साझा
मुद्रा पर सहमत नहीं हैं।
लेकिन असली सवाल डॉलर को हटाने का नहीं है। विकासशील देशों के लिए ज्यादा व्यावहारिक सवाल
यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त के क्षेत्र में उनके पास अतिरिक्त रास्ते हो सकते हैं।
ओ'नील ने ब्रिक्स की सीमाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया है। रॉयटर्स के अनुसार वह इसकी
प्रतीकात्मक ताकत को महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन नए विकास बैंक के बाहर इसकी ठोस संस्थागत
उपलब्धियों को अब भी सीमित देखते हैं। यही आलोचना ब्रिक्स की अगली परीक्षा को और महत्वपूर्ण
बना देती है।
नए विकास बैंक की 44 अरब डॉलर की मंजूरी
नया विकास बैंक ब्रिक्स की अब तक की सबसे ठोस उपलब्धियों में से एक है। बैंक के उपाध्यक्ष और
मुख्य परिचालन अधिकारी रोमन सेरोव ने 11 अगस्त को जयपुर में एक कार्यक्रम में जो आंकड़े रखे, वे
समूह की आर्थिक क्षमता को समझने का बेहतर आधार देते हैं। बैंक की वेबसाइट पर प्रकाशित उनके
भाषण के मुताबिक 30 जून 2026 तक बैंक 141 परियोजनाओं के लिए कुल 44 अरब डॉलर की मंजूरी
दे चुका था और इनमें से 25 अरब डॉलर वितरित किए जा चुके थे। जिन परियोजनाओं को बैंक वित्त दे
रहा है, उनकी कुल लागत करीब 250 अरब डॉलर है।
एक और आंकड़ा महत्वपूर्ण है। सेरोव के मुताबिक बैंक के स्थानीय मुद्रा में होने वाले वित्तीय कारोबार
की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है। भारत इस बैंक से वित्त पाने वाला दूसरा सबसे बड़ा
देश है। भारत में 35 बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए करीब 10.5 अरब डॉलर मंजूर किए गए हैं,
जो बैंक के कुल ऋण पोर्टफोलियो का लगभग 24 प्रतिशत है। इनमें से करीब 6 अरब डॉलर वितरित
किए जा चुके हैं।
सेरोव ने बैंक के पहले दशक को एक महत्वाकांक्षी विचार से पूरी तरह काम करने वाले बहुपक्षीय विकास
बैंक में बदलने की यात्रा के रूप में पेश किया। विश्व बैंक और दूसरे पुराने बहुपक्षीय संस्थानों की तुलना
में नया विकास बैंक अभी छोटा है। लेकिन शायद यही तुलना पूरी तस्वीर नहीं बताती।
विकासशील देशों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उनके पास विकास के लिए वित्त जुटाने के
कितने रास्ते हैं। विश्व बैंक भी रहे और नया विकास बैंक भी। डॉलर में कर्ज उपलब्ध हो और जहां संभव
हो, वहां स्थानीय मुद्रा में वित्त भी मिले। इस नजरिए से ब्रिक्स की ताकत मौजूदा व्यवस्था को हटाने में
नहीं, बल्कि उसमें अतिरिक्त विकल्प जोड़ने में हो सकती है।
चीन की असली ताकत कहां है?
यहीं चीन का आर्थिक आकार निर्णायक हो जाता है। पिछले दो दशकों में चीन ने वैश्विक विनिर्माण
आपूर्ति श्रृंखलाओं में ऐसी जगह बनाई है, जिसे किसी दूसरे ब्रिक्स सदस्य के लिए कम समय में
दोहराना आसान नहीं होगा। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सौर उपकरण, दूरसंचार, मशीनरी, तेज रफ्तार
परिवहन और बुनियादी ढांचे के निर्माण में चीनी कंपनियों की क्षमता दूसरे विकासशील देशों के लिए
निवेश और तकनीक का स्रोत बन सकती है।
लेकिन चीन के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क सिर्फ यह नहीं है कि उसकी अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है। ज्यादा
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वह अपनी औद्योगिक ताकत का इस्तेमाल किस तरह करता है। केवल
तैयार माल बेचना एक मॉडल है। लेकिन स्थानीय उत्पादन, निवेश, तकनीक और बाजार तक पहुंच
उपलब्ध कराना उससे कहीं ज्यादा गहरा और टिकाऊ मॉडल होगा।
भारत-चीन: प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग
भारत और चीन के संबंधों की कठिनाइयों को इस तस्वीर से अलग नहीं किया जा सकता। 2020 के
सीमा संकट ने दोनों देशों के रिश्तों को गंभीर नुकसान पहुंचाया था। सीमा विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं
हुआ है। व्यापार असंतुलन भारत की चिंता बना हुआ है और एशिया में रणनीतिक प्रभाव को लेकर
प्रतिस्पर्धा भी जारी है। फिर भी दोनों देश ब्रिक्स को कमजोर करने के बजाय आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं।
यही इस मंच की उपयोगिता भी है।
जुलाई में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भी
इसी व्यापक रिश्ते की बात की। चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी विवरण के अनुसार वांग ने कहा
कि चीन और भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण सदस्यों के रूप में
अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मामलों में समन्वय बढ़ा सकते हैं।
इससे पहले जून में ब्रिक्स के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक के बाद वांग ने एक और स्पष्ट संदेश
दिया था। उनके मुताबिक ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हुए एकजुटता
और पारस्परिक सहयोग मजबूत करना चाहिए।
भारत हर चीनी प्रस्ताव से सहमत नहीं होगा। लेकिन दोनों देशों की एक साझा दिलचस्पी जरूर है।
वैश्विक संस्थाओं में आज की आर्थिक वास्तविकताओं को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए।
असली मुकाबला व्यापार और छोटे कारोबार में होगा
ब्रिक्स की सफलता अंततः शिखर सम्मेलनों में जारी होने वाले घोषणापत्रों से नहीं, बल्कि व्यापार और
निवेश के वास्तविक आंकड़ों से मापी जाएगी। अगस्त में जयपुर में हुई 16वीं ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की
बैठक ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण फैसले किए। सदस्य देशों ने ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी 2030
रणनीति को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति की और छोटे कारोबारों के लिए ऋण, वैश्विक मूल्य
श्रृंखलाओं, सेवा व्यापार और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया।
2026 के बाद 2027: नई दिल्ली से पेइचिंग
भारत और चीन की लगातार दो वर्षों की अध्यक्षता खास महत्व रखती है।
ब्रिक्स की सफलता की कसौटी यह नहीं होनी चाहिए कि भारत और चीन अचानक रणनीतिक साझेदार
बन जाएं। ज्यादा व्यावहारिक सवाल यह है कि क्या वे उन क्षेत्रों में साथ काम कर सकते हैं, जहां उनके
हित मिलते हैं। व्यापार, विकास वित्त, जलवायु वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा और
वैश्विक संस्थाओं में सुधार ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं।
20 साल बाद ब्रिक्स को अब अपने आकार को साबित करने की जरूरत नहीं है। काउंसिल ऑन फॉरेन
रिलेशंस के आंकड़े बताते हैं कि उसके 11 सदस्य दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक
अर्थव्यवस्था के एक-चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स देशों के बीच वस्तु व्यापार 2003 के 84 अरब डॉलर से
बढ़कर 2024 में 1.17 ट्रिलियन डॉलर हो चुका है।
चीन के पास विशाल बाजार है, पूंजी है, मजबूत विनिर्माण आधार है, तकनीक है और ग्लोबल साउथ के
साथ व्यापक आर्थिक संबंध हैं।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक: नीरज बाली)