भारत की अध्यक्षता में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन राजधानी दिल्ली में आयोजित होने जा
रहा है। वैश्विक उथल-पुथल और संघर्षों के इस दौर में ब्रिक्स का आयोजन काफी महत्व रखता
है। क्योंकि इस संगठन का दायरा लगातार बढ़ रहा है और यह ग्लोबल साउथ की एक आवाज
भी बन रहा है। वैसे इस सम्मेलन के लिए दिल्ली में सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और इसमें
हिस्सा लेने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन सहित कई देशों के
नेता पहुंचेंगे। इस तरह 12-13 सितंबर को समूचे विश्व की नजर दिल्ली पर रहेगी।
इस दौरान चाइना मीडिया ग्रुप (सीएमजी) के अधीन चाइना ग्लोबल टेलीविज़न नेटवर्क (सीजीटीएन)
हिंदी के संवाददाता अनिल पांडेय ने एक बड़े थिंक टैंक भारतीय वैश्विक परिषद के सीनियर फेलो
फज़्जुर रहमान सिद्दीकी के साथ विशेष इंटरव्यू किया।
बकौल सिद्दीकी ब्रिक्स ने पिछले दो दशकों के दौरान एक लंबा सफर तय किया है। जब ब्रिक्स
की स्थापना हुई थी, उस समय दुनिया एकध्रुवीय वर्ल्ड ऑर्डर में थी। लेकिन अब स्थितियां बदल
चुकी हैं, क्योंकि हाल के वर्षों में इस तरह का माहौल बना है और चर्चा हो रही है कि एक ऐसा
विश्व बने, जहां कोई एक बड़ा और प्रभावशाली देश अपना प्रभुत्व न जमा सके। एक ऐसी
दुनिया हो जिसमें सभी देशों को अपनी बात और आवाज उठाने का मौका मिले। आज ब्रिक्स के
11 सदस्य देश हैं, जो ग्लोबल साउथ की आवाज़ बन रहे हैं। इस तरह ब्रिक्स विश्व को नयी
राह दिखाने के साथ-साथ बेहतर विकल्प के रूप में उभर रहा है।
यह संगठन अमेरिका जैसे देशों को टक्कर देने या चुनौती देने की बात नहीं कर रहा, बल्कि
अपने हितों और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के मद्देनजर आगे बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में
वैश्विक संघर्षों और चुनौतियों के लिहाज से जो स्थितियां सामने आयीं हैं, उसे देखते हुए ब्रिक्स
के प्रति भरोसा मजबूत हुआ है। वर्तमान में दुनिया में जारी तमाम संघर्षों और चुनौतियों को
बातचीत और राजनयिक तरीके से हल करने के लिए ब्रिक्स और एससीओ जैसे संगठन अहम
भूमिका निभा सकते हैं। यह संगठन कभी दूसरे देशों को कमजोर करने या किसी देश के साथ
टकराव की वकालत नहीं करता है। जो ब्रिक्स के लगातार व्यापक और सुदृढ़ होने के लिए
जरूरी भी है।
सिद्दीकी कहते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो दुनिया बनी, उसमें कई देशों को अपनी
बात मजबूती से उठाने का अवसर नहीं मिला, जिससे उस पर विश्वास कम हुआ है। जिस तरह
से अमेरिका विश्व में हर जगह अपना हस्तक्षेप करता है, विश्व की बड़ी संस्थाओं को महत्व
नहीं देता, जिसमें यूएन और डब्ल्यूटीओ भी शामिल है। ऐसे माहौल में एक अलग और बेहतर
ग्लोबल आर्डर को लेकर विभिन्न देश एकजुट हो रहे हैं। इसके लिए ब्रिक्स एक मंच के तौर पर
सामने आया है, जिसमें न केवल एशिया बल्कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका आदि का भी
प्रतिनिधित्व है। साथ ही सहयोगी देशों को ब्रिक्स के माध्यम से अपनी बात रखने का अवसर
मिल रहा है। यह इस बात का प्रतीक है कि एकध्रुवीय विश्व के परिदृश्य को बदलने के लिए
तमाम देश और उनके नेता एकजुट हो रहे हैं। पिछले 20 वर्षों में इस संगठन ने बहुत कुछ
हासिल किया है। इसकी शुरुआत आर्थिक तौर पर हुई थी, जो अब विस्तृत रूप ले चुका है।
आज विश्व में 40 प्रतिशत आर्थिक योगदान ब्रिक्स के देश देते हैं, साथ ही आधी आबादी का
प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें चीन, रूस और भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देश शामिल हैं। जो
आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक रूप से मजबूत ताकते हैं, जिससे ब्रिक्स बड़ी आवाज और
मंच बनकर सामने आया है।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
में हिस्सा लेने के लिए भारत जा रहे हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि ब्रिक्स में चीन, भारत और रूस जैसे
बड़े देशों के नेता मौजूद रहेंगे। इस दौरान वे मजबूती से अपनी बात रखेंगे और दुनिया को महत्वपूर्ण संदेश
देंगे।
इन्टरव्यू में सिद्दीकी ने कहा कि वर्तमान सम्मेलन भारत और चीन दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के
लिहाज से एक बड़ा मौका हो सकता है। हाल के वर्षों में दोनों राष्ट्रों के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद रहे हैं,
ऐसे में इस ब्रिक्स सम्मेलन का लाभ उठाते हुए सहयोग मजबूत करने पर जोर दिया जाना चाहिए।
जैसा कि हम जानते हैं कि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सात वर्षों के बाद पहली बार भारत जा रहे हैं,
सिद्दीकी के विचार में यह द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने का एक अच्छा अवसर साबित हो सकता
है। एशिया के इन पड़ोसी देशों के बीच जो भी विश्वास की कमी है, उसे दूर करने के लिए कोशिशें हो रही हैं।
यह एक अच्छी बात है कि चीन और भारत की ओर से पूर्व में कहा गया है कि दोनों खुले और साफ मन से
बात करने के इच्छुक हैं। जो भी मतभेद और तनाव के विषय रहे हैं, उन्हें बातचीत और राजनयिक तरीके
से हल करने के लिए काम कर रहे हैं।
सिद्दीकी ने उम्मीद जतायी कि दिल्ली में अगर मौका मिला तो दोनों देशों के प्रतिनिधि और अधिकारी
इस बारे में चर्चा भी कर सकते हैं। हाल में चीन की राजधानी पेइचिंग में हुई सीमा मुद्दे पर वार्ता ने एक
सकारात्मक संदेश दिया है। जो सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति बने रहने के लिए अहम है। कहा जा सकता है कि
बातचीत और चर्चा से ही तनाव कम होता है और संबंधों में सुधार होता है। चीन और भारत के नेता इस बात
को बखूबी समझते हैं। यह भी कहना होगा कि तनाव और उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों के बावजूद चीन-भारत
आर्थिक संबंध अच्छे रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि दीर्घकालिक और अल्पकालिक मतभेद वाले
मसलों को सुलझाने में प्रगति हासिल होगी।
(अनिल पांडेय, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)