नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: सभी के लिए लाभकारी वैश्वीकरण को बढ़ावा
13 सितंबर 2026 को 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह ब्रिक्स ने भारत मंडपम, नई दिल्ली में
अपने 18वें वार्षिक शिखर सम्मेलन का समापन किया। ब्रिक्स देशों ने अंतरराष्ट्रीय स्थिति, वैश्विक
शासन और आपसी सहयोग पर आम सहमति बनाई।
12 से 13 सितंबर तक "लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और सततता के निर्माण" विषय पर आयोजित
इस सम्मेलन में 12 सितंबर को संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए।
ब्रिक्स के दो दशक: पाँच से वैश्विक शक्ति तक
इस वर्ष ब्रिक्स सहयोग तंत्र के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण
अफ्रीका से बना यह समूह अपने बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव से पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती
देता रहा है। 2024 से मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया भी मूल पाँच देशों में
जुड़ चुके हैं, और लगभग एक दर्जन अन्य देशों को "साझेदार देश" का दर्जा प्राप्त है।
आज यह विस्तारित समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और क्रय शक्ति समता के आधार पर
वैश्विक जीडीपी के लगभग 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है। 20 वर्षों में ब्रिक्स वैश्विक
अर्थव्यवस्था की एक नई शक्ति बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 सितंबर को अपने उद्घाटन
भाषण में कहा कि पिछले दो दशकों में ब्रिक्स वैश्विक मंच पर एक विशिष्ट आवाज बनकर उभरा है,
और इसकी आम सहमति आधारित कार्यशैली ने विविध दृष्टिकोण वाले सदस्यों को एक साथ काम
करने में सक्षम बनाया है।
नई दिल्ली घोषणा
नई दिल्ली घोषणा में ब्रिक्स नेताओं ने विकास के लिए मिलकर काम करने के सामूहिक संकल्प को
रेखांकित किया और आपसी सम्मान, संप्रभु समानता, एकजुटता, लोकतंत्र, खुलापन, समावेशिता और
सहयोग की भावना को दोहराया।
ब्रिक्स: ग्लोबल साउथ के नेतृत्व वाले विकास का आधार
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन ने स्पष्ट कर दिया कि विस्तारित ब्रिक्स वैश्विक शासन में समानता
चाहने वाले ग्लोबल साउथ की सबसे विश्वसनीय आवाज बन रहा है। संदेश साफ था: ग्लोबल साउथ के
विकास के लिए सहयोग अब केवल आकांक्षा नहीं, बल्कि कार्ययोजना है।
13 सितंबर को चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने “ब्रिक्स सहयोग की नींव मजबूत करें, वैश्विक दक्षिण
की शक्ति को बढ़ाएं” शीर्षक भाषण दिया। “वृहद ब्रिक्स” को अपने आर्थिक भार को व्यावहारिक
सहयोग में बदलना होगा, बाजारों को खुला रखना होगा, पारस्परिक लाभ बढ़ाना होगा और औद्योगिक
व आपूर्ति श्रृंखलाओं के लचीलेपन की रक्षा करनी होगी।
व्यापार और प्रौद्योगिकी के अस्त्रीकरण का विरोध
नई दिल्ली घोषणा में ब्रिक्स नेताओं ने वह किया जो हाल में कुछ ही बहुपक्षीय समूह कर पाए हैं।
उन्होंने संघर्ष, आतंकवाद, व्यापार, जलवायु, प्रौद्योगिकी और विकास जैसे वैश्विक विभाजनों पर
स्पष्ट और सर्वसम्मत रुख अपनाया।
यह स्पष्टता आर्थिक वास्तविकता को दर्शाती है। ब्रिक्स अब भविष्य का समूह नहीं, बल्कि वर्तमान
वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन है। पर नई दिल्ली में इसका तर्क शक्ति का नहीं, सिद्धांत का था।
ब्रिक्स नेताओं ने खुली और समावेशी विश्व अर्थव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई और संरक्षणवाद
का दृढ़ विरोध किया।
घोषणापत्र ने एकपक्षीय टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर गंभीर चिंता जताई, जो व्यापार को विकृत
करते हैं और WTO नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसने पर्यावरण नीति के नाम पर संरक्षणवाद और
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना लगाए गए एकपक्षीय प्रतिबंधों की भी निंदा की।
जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 13 सितंबर को कहा, ‘‘तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों का रणनीतिक
दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करना हमारी साझा प्रगति में बाधा डाल सकता है।’संक्षेप में, नई
दिल्ली घोषणा वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्त्र-मुक्त करने का आह्वान है।
मोदी-शी बैठक: भारत-चीन संबंधों में रणनीतिक विश्वास की बहाली
अक्टूबर 2019 में महाबलीपुरम के बाद राष्ट्रपति शी चिनफिंग की सात साल में यह पहली भारत यात्रा
अपने आप में विश्वास बहाली का एक उपाय है।
12 सितंबर को दोनों नेता दिल्ली में ब्रिक्स के इतर मिले। यह मुलाकात अकेली नहीं थी। इससे पहले
सीधी उड़ानों की बहाली, छह साल बाद नाथू ला से सीमा व्यापार का फिर से शुरू होना और भू-सीमा
वाले देशों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर पाबंदियों में ढील जैसे सकारात्मक संकेत मिले थे। यह
लगातार तीसरा वर्ष है जब दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों के नेता आमने-सामने मिले हैं
— 2024 में कज़ान और 2025 में थ्येनचिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलनों के बाद।
बैठक में दोनों नेताओं ने स्पष्ट सहमति बनाई: चीन और भारत को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार
होना चाहिए। खुली बातचीत में दोनों ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, मतभेदों को विवाद
न बनने देने और व्यापार सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया।
शी ने दोहराया कि चीन भारत के साथ संबंधों को रणनीतिक ऊँचाई और दीर्घकालिक दृष्टि से देखता है।
दोनों ने माना कि ग्लोबल साउथ के प्रमुख सदस्य और ब्रिक्स, SCO, G20 व संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण
भागीदार के रूप में उनका सहयोग वैश्विक शासन और विकासशील देशों की आवाज को आकार देता है।
मोदी ने माना कि मतभेद हैं, पर उन्हें विवाद नहीं बनना चाहिए। राजनीतिक खिंचाव के बावजूद
आर्थिक निर्भरता गहरी हुई है और वित्त वर्ष 2025-26 में भारत-चीन व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा है।
यदि स्पष्टता से विश्वास बनता है और विश्वास ठोस कार्रवाई की ओर ले जाता है, तो यह बैठक
द्विपक्षीय संबंधों और ब्रिक्स दोनों को नई गति दे सकती है।
मानव कल्याण के लिए मजबूत ब्रिक्स साझेदारी
उथल-पुथल और तेज़ बदलाव के दौर से गुजर रही दुनिया में 11 सदस्यों और 10 साझेदार देशों वाला
“वृहद ब्रिक्स सहयोग” बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की रक्षा में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनकर उभरा है।
इसकी ताकत इसके तरीके में निहित है — ब्रिक्स ने राजनीतिक-सैन्य गुटों की पुरानी सोच से आगे
बढ़कर आपसी विश्वास और साझा लाभ पर आधारित साझेदारी बनाई है।
उम्मीद है कि 2027 में चीन की अध्यक्षता में होने वाला 19वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस समावेशिता,
आत्मविश्वास और खुलेपन को और आगे ले जाएगा।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक- रविशंकर बसु)