बुधवार सुबह करीब साढ़े दस बजे चीन-नेपाल सीमा पर एक भयानक प्राकृतिक आपदा आई।
नेपाल की ओर ऊंची हिमालयी चोटियों से अचानक एक विशाल हिमखंड टूटकर नीचे गिरा। यह
बर्फ और मलबे का तेज बहाव दक्षिण-पश्चिम चीन के शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश के शिकाज़े शहर के
चीलोंग जिले में स्थित चीलोंग बंदरगाह तक पहुंचा और वहां भीषण कीचड़ प्रवाह में बदल गया।
इस आपदा से दोनों देशों में भारी जानमाल का नुकसान हुआ।
आखिर इस आपदा की वजह क्या थी? चीनी प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय के विशेषज्ञों ने उच्च-
रिज़ॉल्यूशन उपग्रह तस्वीरों का अध्ययन करने के बाद बताया कि यह हिमस्खलन नेपाल की
ओर करीब 5,200 से 5,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हिमानी क्षेत्र में हुआ। नीचे गिरते समय
बर्फ के इस विशाल द्रव्यमान ने अत्यधिक स्थितिज ऊर्जा पैदा की और रास्ते में मौजूद मोरेन
निक्षेपों को भी अपने साथ बहा लिया। इसके बाद यह तेज गति से बहने वाला मलबा बन गया
और आगे चलकर विनाशकारी कीचड़ प्रवाह में बदल गया, जो चीलोंग बंदरगाह तक पहुंचा।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस हिमस्खलन ने करीब 20 किलोमीटर की दूरी महज 7 मिनट में तय
की। यानी इसकी औसत रफ्तार करीब 50 मीटर प्रति सेकंड थी। इतनी तेज गति और भारी मात्रा
में मलबे के कारण इसका असर बेहद विनाशकारी रहा। चीन के भूविज्ञानी प्रोफेसर श्यू छ्यांग (Xu
Qiang)) ने बताया कि स्रोत क्षेत्र और चीलोंग बंदरगाह के बीच ऊंचाई में करीब 3,200 मीटर का
अंतर, मलबे की विशाल मात्रा और आपदा का अचानक घटित होना, इन तीनों कारणों ने मिलकर
इसकी विनाशकारी ताकत को बढ़ाया।
इस भीषण घटना के तुरंत बाद चीनी सरकार ने राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिए। बुधवार
दोपहर 3 बजे ही चीनी प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय ने स्तर-2 भूवैज्ञानिक आपदा आपात
प्रतिक्रिया सक्रिय कर दी। इसके साथ ही राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण और राहत आयोग तथा
आपातकालीन प्रबंधन मंत्रालय ने स्तर-2 राष्ट्रीय राहत आपात प्रतिक्रिया शुरू की, जबकि
शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश ने स्तर-1 प्राकृतिक आपदा राहत आपात प्रतिक्रिया लागू की। सेना,
पुलिस, सीमा सुरक्षा बल और अग्निशमन दल भी तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए।
राहत कार्यों को तेज करने के लिए वित्त मंत्रालय और आपातकालीन प्रबंधन मंत्रालय ने 120
मिलियन युआन की आपातकालीन राहत राशि जारी की, जबकि राष्ट्रीय विकास एवं सुधार
आयोग ने बुनियादी ढांचे की बहाली के लिए 100 मिलियन युआन आवंटित किए। चीनी राष्ट्रीय
बचाव दल के 111 कर्मी और चीन एनेंग (China Aneng) के 310 विशेषज्ञ उन्नत उपकरणों के
साथ मौके पर पहुंचे। गुरुवार तक 45 भूवैज्ञानिक आपदा विशेषज्ञ भी राहत और बचाव कार्यों में
शामिल हो गए। वहीं, चीनी विदेश मंत्रालय ने नेपाल सरकार के साथ संपर्क और समन्वय
स्थापित किया तथा जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। चीनी
राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री ली छ्यांग ने भी राहत और बचाव कार्यों के निर्देश दिए।
लेकिन इस प्राकृतिक आपदा के बाद एक अलग तरह की बहस भी शुरू हो गई। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से
कई देशों के कुछ मीडिया कर्मियों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इस घटना को
राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। अनेकानेक अकाउंटों ने आरोप लगाया कि चीन की
सीमावर्ती परियोजनाओं ने पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाया और इस आपदा को
"जानबूझकर की गई पारिस्थितिक तबाही" बताया। वहीं, कुछ नेटीज़नों ने दावा किया कि चीन ने
बाढ़ की चेतावनी जारी करने में 45 मिनट की देरी की। कुछ अन्य लोगों ने इस आपदा को चीनी
जलविद्युत परियोजनाओं से जोड़ते हुए इसे "जल बम" तक करार दिया।
इतना ही नहीं, कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने बिना किसी ठोस सबूत के यह दावा भी
किया कि "चीन के बांध टूट गए" या "चीन ने जानबूझकर बांध खोल दिए"। ऐसे दावों की
गंभीरता को देखते हुए सवाल उठता है कि क्या किसी प्राकृतिक आपदा के बीच बिना प्रमाण के
इस तरह की बातें फैलाना उचित है?
उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी इन दावों की पुष्टि नहीं करती। वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक,
आपदा की शुरुआत नेपाल की ओर 5,200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हिमानी क्षेत्र से
हुई। चीनी भूविज्ञानी क्वो चाओछेंग (Guo Zhaocheng) ने उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन के
आधार पर बताया कि हिमस्खलन का स्रोत नेपाल के भीतर तोंगलिन जांगबो (Donglin
Zangbo) नदी की सहायक नदी थ्सोच्येन (Cuojian) के ऊपरी हिस्से में था।
नेपाल के भूविज्ञानी प्रकाश पोखरेल (Prakash Pokharel) ने भी कहा कि बाढ़ हिम-चट्टान
पतन के कारण आई। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने भूकंपीय संकेतों के आधार पर
इसे हिमानी पतन से जुड़ी घटना बताया। वहीं, कनाडा के भू-आकृति विज्ञानी डैनियल शुगर
(Daniel Shugar) ने उपग्रह तस्वीरों का अध्ययन कर बताया कि करीब 2,000 फीट चौड़ा बर्फ
का हिस्सा हिमानी से टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे गिरा।
इन आकलनों से संकेत मिलता है कि इस आपदा के पीछे प्राकृतिक और जलवायु संबंधी कारकों
की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण हिमानियों के
पिघलने, बर्फ की स्थिरता कम होने और जमी हुई मिट्टी के कमजोर पड़ने से हिमालय जैसे ऊंचे
पर्वतीय क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में बिना पर्याप्त वैज्ञानिक
प्रमाण के किसी मानव निर्मित ढांचे को सीधे आपदा का कारण बताना उचित नहीं होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र में हिमानी झीलों के फटने
और हिमस्खलन जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए बिना
ठोस सबूत के किसी एक देश को जिम्मेदार ठहराना न केवल अवैज्ञानिक है, बल्कि मानवीय
दृष्टि से भी गलत है। नेपाल और चीन, दोनों देशों में इस आपदा से लोगों की जान गई और बड़ी
संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं। ऐसे समय में किसी भी देश के पीड़ितों की पीड़ा को राजनीतिक
चश्मे से देखना मानवीय संवेदनाओं के खिलाफ जाता है।
प्राकृतिक आपदाएं किसी सीमा, देश या राजनीति को नहीं पहचानतीं। जब दोनों देशों के लोग
इस त्रासदी से जूझ रहे हों, तब बिना प्रमाण के आरोप लगाने और आपदा को राजनीतिक बहस
का हिस्सा बनाने से बचना चाहिए। इस समय सबसे जरूरी है कि राहत और बचाव कार्यों पर
ध्यान दिया जाए, प्रभावित परिवारों की मदद की जाए और आपदा के वास्तविक कारणों को
वैज्ञानिक तरीके से समझा जाए। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जब इंसानी जान चली जाए,
तब इंसानियत सबसे ऊपर होनी चाहिए।
(लेखक—रमेश शर्मा)





