18th BRICS Summit: मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात… ड्रैगन ने दिखाया दोस्ती का हाथ, मतभेद संभालने का दिया भरोसा

Xi-Modi meeting

18th BRICS Summit: भारत में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रस्तावित द्विपक्षीय मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है। करीब सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब भारत और चीन के रिश्ते एक तरफ धीरे-धीरे सामान्य होने की दिशा में बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

शी जिनपिंग के भारत पहुंचने से पहले चीन की ओर से आया बयान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीजिंग ने साफ कहा है कि वह भारत के साथ मतभेदों को उचित तरीके से संभालने, संवाद बढ़ाने और सहयोग मजबूत करने के लिए काम करेगा। चीन के भारत में राजदूत शू फेइहोंग ने कहा कि दोनों देश प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के रणनीतिक मार्गदर्शन में आगे बढ़ेंगे। यह बयान महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं माना जा सकता। इसकी टाइमिंग महत्वपूर्ण है। एक तरफ शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आ रहे हैं। दूसरी तरफ गलवान के बाद दोनों देशों के संबंध जिस तनावपूर्ण दौर से गुजरे, उसके बाद अब दोनों नेताओं की लगातार मुलाकातें एक नए संवाद की दिशा का संकेत दे रही हैं।

गलवान के बाद पहली भारत यात्रा   रिश्तों की नई परीक्षा

शी जिनपिंग की भारत यात्रा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ 2020 का गलवान संघर्ष है। पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को लंबे समय तक प्रभावित किया। सीमा पर तनाव के बाद भारत ने चीन के साथ अपने संबंधों में सुरक्षा और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी। सैन्य स्तर पर कई दौर की  बातचीत हुई और सीमा पर तनाव कम करने के लिए लंबे समय तक प्रयास चलते रहे। इसके बाद दोनों नेताओं की मुलाकातें कजान और तियानजिन में हुईं। अब नई दिल्ली में आमने-सामने की बैठक इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अवसर बन सकती है। यह सिर्फ दो नेताओं की मुलाकात नहीं होगी। इसके जरिए यह संकेत भी जाएगा कि भारत और चीन मतभेदों के बावजूद संवाद का रास्ता खुला रखना चाहते हैं।

चीन का नया संदेश। मतभेद रहेंगे, लेकिन संवाद भी रहेगा

चीन के राजदूत का बयान इस यात्रा का सबसे अहम कूटनीतिक संकेत है। बीजिंग ने कहा है कि दोनों देश रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से द्विपक्षीय संबंधों को देखेंगे, संवाद बढ़ाएंगे, सहयोग मजबूत करेंगे और मतभेदों को उचित तरीके से संभालेंगे।  इस बयान का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है ‘मतभेद’। चीन ने यह दावा नहीं किया कि दोनों देशों के बीच सभी विवाद खत्म हो गए हैं। बल्कि उसने स्वीकार किया है कि मतभेद मौजूद हैं और उन्हें संभालने की जरूरत है। यानी चीन का संदेश कुछ ऐसा है। विवाद अपनी जगह हैं, लेकिन रिश्ते सिर्फ विवादों के आधार पर नहीं चल सकते। भारत के लिए भी यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना व्यापक संबंधों में भरोसा कायम करना मुश्किल है। ऐसे में संवाद और सीमा प्रबंधन दोनों साथ-साथ चलना जरूरी होगा।

BRICS बना मंच। मोदी-शी मुलाकात बनी सबसे बड़ी नजर

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है। ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच पर दुनिया की कई प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं एक साथ मौजूद हैं। लेकिन इस सम्मेलन के दौरान मोदी-शी मुलाकात का महत्व अलग है। भारत और चीन दोनों ब्रिक्स के प्रमुख सदस्य हैं और वैश्विक दक्षिण, आर्थिक सहयोग, व्यापार तथा  बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर दोनों देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है। शी जिनपिंग का भारत आना यह भी दिखाता है कि चीन भारत के साथ उच्चस्तरीय संपर्क को बनाए रखना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की बैठक में सीमा विवाद, द्विपक्षीय व्यापार, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की संभावना को लेकर स्वाभाविक रूप से नजरें रहेंगी। हालांकि किसी भी बैठक के बाद तत्काल बड़े समझौते की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। असली महत्व इस बात का होगा कि दोनों पक्ष किस तरह की राजनीतिक भाषा अपनाते हैं और आगे के संवाद का रास्ता कितना स्पष्ट करते हैं।

भारत के लिए संदेश। दोस्ती जरूरी, लेकिन सीमा पर भरोसा पहले

भारत-चीन संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आर्थिक और वैश्विक सहयोग की जरूरत अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारत चीन के साथ व्यापार करता है। दोनों देश वैश्विक मंचों पर कई मुद्दों पर साथ दिखाई देते हैं। लेकिन सीमा पर तनाव ने यह स्पष्ट किया है कि राजनीतिक विश्वास के बिना रिश्तों को पूरी तरह सामान्य बनाना आसान नहीं होगा। ऐसे में भारत के लिए शी जिनपिंग की यात्रा का मतलब सिर्फ गर्मजोशी भरी तस्वीरें नहीं है। भारत की प्राथमिकता यह होगी कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे, सैन्य तनाव कम हो और संवाद की प्रक्रिया लगातार चलती रहे। अगर चीन वास्तव में मतभेदों को ‘उचित तरीके से संभालने’ की बात कर रहा है, तो इस संदेश को जमीन पर भी दिखाई देना होगा। यानी बयान से भरोसा नहीं बनेगा, भरोसा कार्रवाई से बनेगा।

मोदी-शी मुलाकात। क्या खुलेगा रिश्तों का नया दरवाजा?

शी जिनपिंग की भारत यात्रा को भारत-चीन रिश्तों के लिए एक संभावित नए अध्याय के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन इसे रिश्तों में पूरी तरह बदलाव की शुरुआत मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे कई मुद्दे अब भी मौजूद हैं। इसके बावजूद संवाद का जारी रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है। चीन का यह कहना कि वह भारत के साथ संवाद बढ़ाएगा, सहयोग मजबूत करेगा और मतभेदों को सही तरीके से संभालेगा, संकेत देता है कि बीजिंग भी रिश्तों को पूरी तरह टकराव की दिशा में ले जाने के पक्ष में नहीं है। अब गेंद दोनों देशों के पाले में है। प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात सिर्फ हाथ मिलाने और तस्वीर खिंचवाने तक सीमित रहती है या इससे रिश्तों को स्थिर करने की कोई ठोस दिशा निकलती है, यही सबसे बड़ा सवाल होगा।

गलवान के बाद दूरी बढ़ी थी। कजान और तियानजिन से संवाद लौटा। अब नई दिल्ली में मुलाकात हो रही है। चीन ने मतभेद संभालने की बात कही है। भारत के लिए असली कसौटी यही होगी कि यह कूटनीतिक भाषा सीमा पर शांति, भरोसे और व्यावहारिक सहयोग में कितनी बदलती है। कुल मिलाकर, शी जिनपिंग का भारत दौरा सिर्फ ब्रिक्स की बैठक नहीं है। यह भारत-चीन रिश्तों की अगली दिशा का एक अहम संकेतक है। दोस्ती की बात हो सकती है, सहयोग की राह खुल सकती है, लेकिन भारत के लिए संदेश स्पष्ट है। संवाद स्वागत योग्य है, मगर राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पर समझौता नहीं।

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