मध्य प्रदेश की राजनीति में गुरुवार का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा। राज्यसभा की तीनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने निर्विरोध जीत दर्ज करते हुए अपनी संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन किया। भाजपा उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट को रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा निर्वाचित होने का प्रमाण पत्र सौंपा गया। इसके साथ ही तीनों नेता राज्यसभा के लिए चुन लिए गए।
यह चुनाव उस समय चर्चा में आया जब कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त हो गया। कांग्रेस ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मामले में 12 जून को सुनवाई प्रस्तावित है। हालांकि नाम वापसी की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद चुनाव आयोग से कोई राहत नहीं मिलने पर भाजपा के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए।
मध्य प्रदेश की तीनों सीटों पर भाजपा की यह जीत केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि संगठन की मजबूती और रणनीतिक प्रबंधन का भी संकेत मानी जा रही है। खास बात यह है कि तीनों नए सांसद अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं और लंबे समय से संगठन के लिए काम करते रहे हैं।
संगठन के रणनीतिकार हैं तरुण चुघ
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। पंजाब के अमृतसर में जन्मे चुघ छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे। उन्होंने संगठन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाई।
जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और तेलंगाना जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के प्रभारी के रूप में उन्होंने पार्टी संगठन को मजबूत करने में भूमिका निभाई। “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” अभियान के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। राज्यसभा में उनका प्रवेश भाजपा नेतृत्व की संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बूथ मैनेजमेंट के विशेषज्ञ हैं रजनीश अग्रवाल
रजनीश अग्रवाल को भाजपा संगठन में “बूथ का भूत” कहा जाता है। इसके पीछे उनकी बूथ स्तर पर काम करने की क्षमता और चुनावी प्रबंधन की कुशलता मानी जाती है। इलेक्ट्रॉनिक विज्ञान में स्नातक और प्रसारण पत्रकारिता में स्नातकोत्तर रजनीश अग्रवाल लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं।
एबीवीपी से राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले अग्रवाल ने छात्र राजनीति से लेकर भाजपा के प्रदेश संगठन तक कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बूथ प्रबंधन और चुनावी रणनीति को सफल बनाने में उनकी भूमिका को बेहद अहम माना गया था। इसी संगठनात्मक दक्षता का पुरस्कार उन्हें राज्यसभा सदस्यता के रूप में मिला है।
साधारण कार्यकर्ता से सांसद बने महेश केवट
निवाड़ी जिले के ओरछा धाम से आने वाले महेश केवट की राजनीतिक यात्रा संघर्ष और संगठनात्मक समर्पण की मिसाल मानी जा रही है। एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत करने वाले केवट लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े रहे।
साल 1995 में भाजपा की मुख्यधारा की राजनीति में आने के बाद उन्होंने संगठन के लिए लगातार काम किया। सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले महेश केवट को राज्यसभा भेजकर भाजपा ने सामाजिक संतुलन साधने का भी प्रयास किया है। उनकी जीत को संगठन में लंबे समय तक कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के सम्मान के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस की कानूनी लड़ाई जारी
दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने का मामला अब न्यायालय पहुंच चुका है। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए लगातार विरोध कर रही है। पार्टी नेतृत्व का आरोप है कि नामांकन निरस्त करने की प्रक्रिया में निष्पक्षता नहीं बरती गई। हालांकि अंतिम फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर निर्भर करेगा।
फिलहाल राज्यसभा की तीनों सीटों पर भाजपा की निर्विरोध जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्य प्रदेश में पार्टी की संगठनात्मक पकड़ मजबूत बनी हुई है। वहीं कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर उठाकर आगामी दिनों में संघर्ष तेज करने की तैयारी में है।