मोदी सरकार के 12 साल: नेहरू से मोदी तक..जानें कैसे और कितनी बदली भारत की विदेश नीति की दिशा और दृष्टि?

भारत की विदेश नीति केवल देशों के बीच संबंधों का विषय नहीं है, बल्कि यह उस दृष्टि का प्रतिबिंब होती है जिसके माध्यम से कोई राष्ट्र स्वयं को और दुनिया में अपनी भूमिका को देखता है। आज जब नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभालते हुए स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नया रिकॉर्ड बनाया है, तब यह स्वाभाविक है कि उनकी विदेश नीति की तुलना देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से की जाए।

भारत की कूटनीति का नया अध्याय
पुरानी विरासत का विस्तार?

यह तुलना केवल दो नेताओं की नहीं, बल्कि दो अलग-अलग युगों, दो विचारधाराओं और भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर दो दृष्टिकोणों की भी है। सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति की दिशा बदल दी है या यह नेहरू की स्थापित नींव का ही विकसित रूप है?

नेहरू का भारत: नवस्वतंत्र राष्ट्र की आवाज

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पहचान स्थापित करने की थी। नेहरू ने भारत को एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच वाले राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। उनकी विदेश नीति का मूल आधार था गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद विरोध और विश्व शांति।

शीत युद्ध के दौर में जब दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो खेमों में बंटी हुई थी, तब भारत ने किसी भी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से इनकार किया। नेहरू का मानना था कि भारत की ताकत उसकी स्वतंत्र विदेश नीति में है। उन्होंने नवस्वतंत्र देशों की आवाज बनकर एशिया और अफ्रीका में भारत की प्रतिष्ठा स्थापित की। नेहरू के लिए भारत की महानता उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं, आधुनिक विकास मॉडल और नैतिक नेतृत्व में निहित थी। यही कारण था कि उनकी विदेश नीति आदर्शवाद और वैश्विक नैतिकता से प्रेरित दिखाई देती है।

मोदी का भारत: सभ्यतागत आत्मविश्वास की कूटनीति

2014 के बाद भारत की विदेश नीति में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। मोदी सरकार ने भारत को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर योग, आयुर्वेद, भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विचारों को प्रमुखता देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है। जी-20 शिखर सम्मेलन की थीम ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ इसी सोच को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का प्रयास था। मोदी सरकार की विदेश नीति में सांस्कृतिक कूटनीति, प्रवासी भारतीयों के साथ जुड़ाव और भारत की ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने पर विशेष जोर दिखाई देता है। यह दृष्टिकोण नेहरू की आधुनिकतावादी सोच से अलग माना जाता है।

गुटनिरपेक्षता से बहु-संरेखण तक

नेहरू के दौर में गुटनिरपेक्षता विदेश नीति की आधारशिला थी। लेकिन आज की दुनिया शीत युद्ध वाली दुनिया नहीं है। अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप और उभरती शक्तियों के बीच संतुलन बनाना आधुनिक कूटनीति की आवश्यकता बन चुका है।

मोदी सरकार ने इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बहु-संरेखण Multi-Alignment की रणनीति अपनाई। भारत एक ओर अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी साझेदारी मजबूत करता है, तो दूसरी ओर रूस के साथ पारंपरिक संबंध बनाए रखता है। साथ ही ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन और क्वाड जैसे विभिन्न मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाता है। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। यही रणनीतिक स्वायत्तता आज भारत की विदेश नीति की नई पहचान बन चुकी है।

चीन और सुरक्षा नीति में बदलाव

विदेश नीति के सबसे बड़े बदलावों में से एक राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर दिखाई देता है। नेहरू के दौर में चीन के साथ ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का दौर था, लेकिन 1962 का युद्ध भारत के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। मोदी सरकार के समय चीन के साथ संबंधों में प्रतिस्पर्धा और सतर्कता दोनों दिखाई देती हैं। गलवान संघर्ष के बाद भारत ने सीमा पर सैन्य ढांचे को मजबूत किया, चीनी निवेशों की समीक्षा की और रणनीतिक साझेदारियों को विस्तार दिया।

आज भारत केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सामरिक स्तर पर भी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

वैश्विक संकटों में भारत की भूमिका

कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ अभियान के तहत दर्जनों देशों को टीके उपलब्ध कराए। इससे भारत की छवि एक जिम्मेदार और भरोसेमंद वैश्विक साझेदार के रूप में मजबूत हुई। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, यूपीआई और आपदा राहत अभियानों के माध्यम से भारत ने अपनी सॉफ्ट पावर को नई ऊंचाई दी है। जहां नेहरू के समय भारत नैतिक नेतृत्व का दावा करता था, वहीं मोदी काल में भारत समाधान देने वाले राष्ट्र के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है।

क्या वास्तव में बदल गई है विदेश नीति?

हालांकि दोनों नेताओं की शैली और प्राथमिकताएं अलग हैं, लेकिन कुछ मूल तत्व आज भी समान हैं। राष्ट्रीय हितों की रक्षा, रणनीतिक स्वतंत्रता और वैश्विक मंचों पर भारत की प्रभावशाली भूमिका दोनों ही दौरों की साझा विशेषताएं हैं। अंतर केवल इतना है कि नेहरू ने भारत को एक नवस्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया, जबकि मोदी भारत को एक प्राचीन सभ्यता और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत की विदेश नीति में बदलाव केवल रणनीति का नहीं, बल्कि आत्मबोध का भी है। भारत अब केवल विश्व राजनीति का सहभागी नहीं बनना चाहता, बल्कि उसे आकार देने वाली शक्तियों में शामिल होने की आकांक्षा रखता है।

नेहरू और मोदी की विदेश नीतियां दो अलग-अलग युगों की उपज हैं। नेहरू ने स्वतंत्र भारत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई, जबकि मोदी उस पहचान को प्रभाव और नेतृत्व में बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक ने राष्ट्र निर्माण की कूटनीति दी, दूसरे ने सभ्यतागत आत्मविश्वास की। इन 12 वर्षों में भारत की विदेश नीति अधिक आत्मविश्वासी, बहुआयामी और परिणामोन्मुख दिखाई देती है। हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं—चीन, पाकिस्तान, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण—लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारत की कूटनीति अब केवल प्रतिक्रिया देने वाली नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यही शायद मोदी काल की विदेश नीति का सबसे बड़ा परिवर्तन है।

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