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ट्रेन ड्राइवर को क्यों दी जाती थी लोहे की रिंग? इस छोटे से टोकन ने बचाई हैं हजारों ट्रेनों की टक्कर, जानिए पूरा सिस्टम

DigitalDesk by DigitalDesk
August 16, 2026
in स्पेशल
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metal ring given to the train driver
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नई दिल्ली। भारतीय रेलवे में आज आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और ट्रैक सर्किट जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। एक दौर ऐसा भी था, जब सिंगल रेलवे लाइन पर ट्रेनों को सुरक्षित चलाने के लिए तकनीक का नहीं, बल्कि एक खास लोहे की रिंग और टोकन का सहारा लिया जाता था। आज भी देश के कुछ हिस्सों में इस पुराने सिस्टम के अवशेष या सीमित उपयोग देखने को मिलते हैं। पहली नजर में ट्रेन ड्राइवर के हाथ में दी जाने वाली यह लोहे की रिंग सामान्य लगती है, लेकिन वास्तव में इसका संबंध ट्रेन की सुरक्षा से था। यह रिंग इस बात का संकेत होती थी कि ट्रेन को जिस रेलवे सेक्शन में प्रवेश करना है, वह उसके लिए अधिकृत और सुरक्षित है।

1. आखिर ट्रेन ड्राइवर को क्यों दी जाती थी लोहे की रिंग?

पुराने दौर में रेलवे की कई लाइनें सिंगल ट्रैक थीं। यानी एक ही पटरी पर ट्रेन को दोनों दिशाओं में चलना होता था। ऐसे में सबसे बड़ा खतरा यह था कि अगर एक ही सेक्शन में विपरीत दिशा से दो ट्रेनें आ जाएं तो भीषण टक्कर हो सकती है।

आज के समय में सिग्नलिंग और इंटरलॉकिंग सिस्टम यह सुनिश्चित करते हैं कि एक ही ट्रैक सेक्शन में एक साथ ऐसी ट्रेनें प्रवेश न करें जो आपस में टकरा सकती हैं। लेकिन पुराने समय में हर जगह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम उपलब्ध नहीं था।

ऐसे में टोकन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था।

इस व्यवस्था में किसी खास सिंगल लाइन सेक्शन के लिए एक निर्धारित टोकन होता था। जिस ट्रेन के लोको पायलट के पास वह टोकन होता, उसे उस सेक्शन में प्रवेश करने का अधिकार माना जाता था। यानी टोकन अपने आप में एक तरह का भौतिक सुरक्षा प्रमाण था।

2. लोहे की रिंग ही क्यों थी इतनी जरूरी?

टोकन सिस्टम में टोकन को ऐसी संरचना से जोड़ा जाता था, जिससे लोको पायलट उसे ट्रेन चलते समय भी आसानी से प्राप्त कर सके। कई जगहों पर यह टोकन एक बड़ी लोहे की रिंग या छल्ले के रूप में दिखाई देता था।

ट्रेन के स्टेशन से गुजरने के दौरान स्टेशन स्टाफ और लोको पायलट के बीच इस टोकन का आदान-प्रदान किया जाता था।

रिंग मिलने का मतलब था कि ट्रेन को संबंधित सेक्शन में जाने की अनुमति है। वहीं दूसरी ट्रेन को उसी सेक्शन में प्रवेश करने की अनुमति तब तक नहीं दी जा सकती थी, जब तक निर्धारित प्रक्रिया के तहत टोकन वापस उपलब्ध न हो जाए।

यानी यह साधारण लोहे का छल्ला असल में रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा था।

3. टोकन एक्सचेंज सिस्टम कैसे काम करता था?

मान लीजिए दो स्टेशनों के बीच एक सिंगल रेलवे लाइन है। इस पूरे हिस्से को एक निश्चित सेक्शन माना गया।

अगर स्टेशन A से ट्रेन को स्टेशन B की ओर भेजना है, तो स्टेशन A का स्टाफ यह सुनिश्चित करेगा कि संबंधित सेक्शन में दूसरी ट्रेन मौजूद नहीं है। इसके बाद निर्धारित टोकन सिस्टम के जरिए ट्रेन को सेक्शन में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी।

लोको पायलट के पास टोकन पहुंचने के बाद ट्रेन उस सिंगल लाइन सेक्शन में आगे बढ़ सकती थी।

अब सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आता था—जब ट्रेन दूसरे स्टेशन यानी स्टेशन B पर पहुंचती थी, तो टोकन वहां जमा कराया जाता था। इसके बाद ही संबंधित सिस्टम के जरिए अगली ट्रेन के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ सकती थी।

इस तरह एक ही समय में दोनों दिशाओं से आने वाली ट्रेनों को एक ही सेक्शन में प्रवेश करने से रोका जाता था।

4. टोकन के अंदर भी था सुरक्षा का खास इंतजाम

टोकन एक्सचेंज सिस्टम सिर्फ एक लोहे की रिंग तक सीमित नहीं था। इसमें विशेष प्रकार की मशीनों और टोकन का इस्तेमाल किया जाता था।

कुछ प्रणालियों में रिंग के साथ एक धातु का हिस्सा या टोकन बॉल/टैबलेट जुड़ा होता था। स्टेशन पर मौजूद टोकन मशीन के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता था कि संबंधित सेक्शन के लिए टोकन सही तरीके से जारी और वापस हुआ है।

यही व्यवस्था सिस्टम को ज्यादा सुरक्षित बनाती थी।

मान लीजिए ट्रेन स्टेशन A से स्टेशन B के लिए रवाना हुई, लेकिन किसी कारण से स्टेशन B तक नहीं पहुंची। जब तक निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होती और टोकन सिस्टम दोबारा सामान्य स्थिति में नहीं आता, तब तक उसी सेक्शन के लिए दूसरी ट्रेन को आगे भेजने में रोक रहती थी।

यानी टोकन की मौजूदगी या अनुपलब्धता ही यह बताने में मदद करती थी कि रेलवे सेक्शन दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार है या नहीं।

5. आधुनिक सिग्नलिंग ने धीरे-धीरे खत्म कर दिया पुराना सिस्टम

समय के साथ भारतीय रेलवे ने अपने सिग्नलिंग और सुरक्षा सिस्टम को आधुनिक बनाया। ट्रैक सर्किट, इलेक्ट्रिकल इंटरलॉकिंग, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और दूसरे आधुनिक उपकरणों के आने से ट्रेन की स्थिति और ट्रैक की उपलब्धता को ज्यादा वैज्ञानिक तरीके से मॉनिटर करना संभव हुआ।

इसके साथ ही पुराने टोकन सिस्टम का इस्तेमाल लगातार कम होता गया। फिर भी इस व्यवस्था की अहमियत रेलवे के इतिहास में बेहद खास है। उस दौर में जब आधुनिक डिजिटल तकनीक मौजूद नहीं थी, तब  एक साधारण सा दिखने वाला लोहे का टोकन ट्रेन के सुरक्षित संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य था—एक ही सिंगल लाइन सेक्शन में एक समय पर ऐसी दो ट्रेनों को प्रवेश करने से रोकना, जिनके आमने-सामने आने का खतरा हो। आज अगर किसी पुराने रेलवे सेक्शन में ट्रेन के लोको पायलट या रेलवे स्टाफ के हाथ में ऐसी बड़ी रिंग दिखाई दे जाए तो इसे सिर्फ लोहे का छल्ला समझने की गलती न करें। यह भारतीय रेलवे की उस तकनीकी विरासत का हिस्सा है, जिसने आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम आने से पहले सिंगल लाइन पर ट्रेनों की आवाजाही को व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका निभाई। यानी जिस रिंग को देखकर आज सवाल उठता है कि ‘आखिर इसका काम क्या है?’—कभी वही रिंग ट्रेन के लिए एक तरह की सुरक्षा चाबी हुआ करती थी।

Tags: #metal ring given to the train driver This small token has prevented collisions involving thousands of trains learn about the entire system
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