जंतर-मंतर से लेकर झारखंड और पटना तक: नेता अचानक छात्रों के साथ क्यों खड़े होना चाहते हैं?

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भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नई तस्वीर उभर रही है। यह तस्वीर किसी चुनावी रैली में उमड़ी भीड़ की नहीं, बल्कि सड़कों पर बैठे उन छात्रों की है, जिनके हाथों में तख्तियां हैं और नारों में परीक्षा, भर्ती, पेपर लीक और रोजगार जैसे सवाल हैं। खास बात यह है कि इन छात्रों के आसपास अब राजनीतिक दलों और नेताओं की मौजूदगी भी लगातार बढ़ रही है। दिल्ली का जंतर-मंतर हो, झारखंड में छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों का आंदोलन या अब पटना की सड़कों पर दिखाई दे रही छात्र सक्रियता—तीनों जगह एक समान बेचैनी दिखाई देती है। फर्क सिर्फ इतना है कि पटना ने इस पूरे घटनाक्रम में राजनीति की भूमिका को और ज्यादा स्पष्ट कर दिया है। सवाल सीधा है—क्या राजनेता छात्रों के आंदोलन के साथ खड़े हो रहे हैं या उनके आंदोलन को अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं?  जवाब केवल हां या ना में नहीं दिया जा सकता।

जंतर-मंतर से झारखंड और पटना तक: छात्रों के साथ खड़े होने की होड़ में क्यों जुटे राजनेता? छात्र आंदोलन बना नई सियासी जमीन

छात्र अब सिर्फ वोट बैंक नहीं

राजनीतिक दल लंबे समय से युवाओं को चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण वर्ग मानते रहे हैं। लेकिन मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि युवा अब सिर्फ ‘वोट बैंक’ नहीं रहना चाहता। वह अपने मुद्दों को खुद राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में लाने लगा है। एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की जिंदगी को समझना जरूरी है। कॉलेज खत्म करने के बाद परिवार उससे नौकरी और भविष्य की उम्मीद करता है। कोचिंग, किराया, किताबों और परीक्षा शुल्क पर पैसा खर्च होता है। महीनों और कई बार वर्षों तक तैयारी चलती है। फिर परीक्षा टल जाती है।

कभी अनियमितता के आरोप लगते हैं, कभी पेपर लीक की खबर सामने आती है, कभी भर्ती प्रक्रिया अटक जाती है। देखते ही देखते छह महीने या एक साल और निकल जाता है। बाहर से यह प्रशासनिक समस्या दिखाई दे सकती है, लेकिन अभ्यर्थी के लिए यह उसके जीवन के रुक जाने जैसा अनुभव होता है। यही बेचैनी अब राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

जंतर-मंतर ने दिखाई छात्र शक्ति

जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन की सबसे बड़ी राजनीतिक सीख सिर्फ यह नहीं थी कि युवा नाराज हैं। असली संदेश यह था कि छात्रों को अपने मुद्दे उठाने के लिए पहले किसी राजनीतिक दल के बुलावे की जरूरत नहीं है। आज छात्र अपने मोबाइल फोन के जरिए अपनी बात सीधे समाज तक पहुंचा सकता है। प्रदर्शन का वीडियो कुछ घंटों में हजारों युवाओं तक पहुंच सकता है। किसी छात्र का सवाल सोशल मीडिया पर वायरल हो सकता है। एक नारा मीम बन सकता है और राजनीतिक भाषण से कहीं ज्यादा प्रभाव पैदा कर सकता है। यहीं से राजनीति ने भी संकेत समझना शुरू किया। दशकों तक राजनीतिक दल युवाओं को लामबंद करते रहे। अब कई जगह युवा खुद लामबंद हो रहे हैं और राजनीतिक दल उनके साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यही बदलाव इस पूरे आंदोलन को महत्वपूर्ण बनाता है।

झारखंड ने बताया, गुस्सा स्थानीय नहीं

झारखंड में छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों के आंदोलनों ने यह साफ किया कि यह केवल दिल्ली की समस्या नहीं है। भर्ती परीक्षाओं, कथित अनियमितताओं और रोजगार से जुड़े सवालों ने राज्य के युवाओं को सड़कों पर उतारा। जो मुद्दा कभी किसी एक परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया तक सीमित रह सकता था, वह धीरे-धीरे देश के युवाओं की व्यापक चिंता का प्रतीक बन गया। परीक्षा। भर्ती। रोजगार। पारदर्शिता। अवसर। राज्य अलग हो सकता है, लेकिन चिंता एक जैसी है। यही वजह है कि छात्र असंतोष को राजनीतिक दलों के लिए नजरअंदाज करना अब आसान नहीं रहा।

पटना में आंदोलन का राजनीतिक विस्तार

अब राजनीतिक नजर बिहार और पटना पर है। पटना में छात्र और नौकरी के अभ्यर्थी परीक्षा, भर्ती, रोजगार, देरी और पारदर्शिता जैसे सवाल उठा रहे हैं। शिक्षक अभ्यर्थियों की मांगों से लेकर अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों तक, युवाओं की नाराजगी कई स्तरों पर दिखाई दे रही है। इसी बीच राजनीतिक दल भी तेजी से सक्रिय हुए हैं। तेजस्वी यादव और आरजेडी ने परीक्षा, रोजगार, शिक्षा और कथित पेपर लीक जैसे मुद्दों को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हमले का हिस्सा बनाया है। दूसरे राजनीतिक नेताओं ने भी आंदोलनरत अभ्यर्थियों के समर्थन में आवाज उठाई है। इससे छात्र आंदोलन अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया। वह राजनीतिक मुकाबले का हिस्सा भी बनने लगा है।

लेकिन यहीं सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है— क्या नेता छात्रों की आवाज बन रहे हैं या छात्रों के आंदोलन को अपनी राजनीति का मंच बना रहे हैं? 

‘युवा वोट’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘युवा गुस्सा’

राजनीतिक दलों ने हमेशा ‘युवा वोट’ की चर्चा की है। लेकिन इस समय शायद उससे ज्यादा महत्वपूर्ण चीज ‘युवा गुस्सा’ है। किसी परीक्षा में गड़बड़ी से नाराज छात्र की पहचान कई तरह की हो सकती है। वह किसी भी धर्म, जाति, क्षेत्र या राजनीतिक विचार से जुड़ा हो सकता है। लेकिन परीक्षा के संकट के समय उसकी प्राथमिक पहचान एक अभ्यर्थी की होती है। उसके दिमाग में शायद सिर्फ एक सवाल होता है— “मैंने दो साल पढ़ाई की, अब मुझे फिर से शुरुआत क्यों करनी पड़े?” यही सवाल इन आंदोलनों को राजनीतिक रूप से शक्तिशाली बनाता है। क्योंकि इस गुस्से पर किसी एक दल का स्वाभाविक अधिकार नहीं है।

परीक्षा व्यवस्था भी अब राजनीतिक मुद्दा

भारत में लंबे समय से युवा राजनीति का केंद्र रोजगार रहा है। लेकिन अब रोजगार तक पहुंचने वाली पूरी परीक्षा और भर्ती व्यवस्था भी राजनीतिक सवाल बनती जा रही है। प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती। लाखों परिवारों के लिए यह मेहनत और अवसर के बीच का पुल होती है। एक साधारण परिवार अपने बच्चे की कोचिंग, कमरे, किताबों और परीक्षा शुल्क पर बड़ी रकम खर्च करता है। छात्र वर्षों तक रोजाना कई घंटे पढ़ता है। इसके बाद यदि परीक्षा रद्द हो जाए, भर्ती वर्षों तक अटकी रहे या प्रक्रिया पर सवाल उठें, तो नुकसान केवल समय और पैसे का नहीं होता। सबसे बड़ा नुकसान व्यवस्था पर भरोसे का होता है। युवा को लगता है कि मेहनत करने के बावजूद उसे बराबरी का अवसर नहीं मिल रहा। यही भावना आंदोलन को जन्म देती है।

समर्थन और राजनीतिक कब्जे में फर्क

लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं का छात्रों के साथ खड़ा होना गलत नहीं है। अगर युवाओं को लगता है कि परीक्षा व्यवस्था में खामी है, तो विपक्ष को सवाल उठाने चाहिए। सरकार को जवाब देना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को जवाबदेही तय करने की मांग करनी चाहिए। समस्या तब शुरू होती है जब छात्र आंदोलन की आवाज धीरे-धीरे राजनीतिक दल की आवाज बन जाती है।

इसकी पहचान का एक आसान तरीका है— बोल कौन रहा है?  अगर छात्र अपनी मांग तय कर रहे हैं और राजनीतिक नेता उनकी आवाज को मजबूती दे रहे हैं, तो यह लोकतांत्रिक समर्थन है। लेकिन अगर राजनीतिक दल मंच पर कब्जा कर लें, पार्टी के झंडे आ जाएं और छात्र आंदोलन धीरे-धीरे सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई में बदल जाए, तो तस्वीर बदल जाती है। तब छात्र आंदोलन का मुद्दा पीछे और राजनीति आगे आ जाती है। छात्रों को राजनीतिक समर्थन चाहिए हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वे अपने आंदोलन का राजनीतिक स्वामित्व भी किसी दल को देना चाहें।

जेनरेशन जेड को साधना आसान नहीं

राजनीतिक दलों के लिए एक और चुनौती है—जेनरेशन जेड। आज की युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से उतनी आसानी से प्रभावित नहीं होती। उसका राजनीतिक अनुभव इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब वीडियो, मीम्स, व्हाट्सऐप और दोस्तों के बीच होने वाली चर्चाओं से बनता है। ऐसे माहौल में किसी पार्टी का तैयार किया हुआ ‘यूथ कैंपेन’ उतना असरदार नहीं हो सकता, जितना किसी परेशान छात्र का वास्तविक वीडियो।

एक छात्र कैमरे के सामने खड़ा होकर पूछता है—

“परीक्षा कब होगी?”

यह सवाल किसी राजनीतिक विज्ञापन से ज्यादा प्रभावशाली हो सकता है। इसीलिए छात्रों के बीच खड़े होने वाली तस्वीर नेताओं के लिए सिर्फ समर्थन का प्रतीक नहीं, बल्कि राजनीतिक ‘ऑथेंटिसिटी’ यानी वास्तविकता का प्रमाण भी बन सकती है। लेकिन यह प्रभाव तभी तक रहेगा, जब तक युवा यह महसूस न करें कि उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है।

बिहार के लिए छात्र राजनीति नई नहीं

पटना में छात्र आंदोलन का उभरना अपने आप में ऐतिहासिक संदर्भ भी रखता है। बिहार ने छात्र राजनीति की ताकत को पहले भी देखा है। 1974 का बिहार छात्र आंदोलन शिक्षा और रोजमर्रा की आर्थिक समस्याओं से जुड़े सवालों से शुरू हुआ था और आगे चलकर व्यापक जेपी आंदोलन का हिस्सा बना। उस दौर से जुड़े कई युवा नेता बाद में बिहार और राष्ट्रीय राजनीति के बड़े चेहरे बने। आज पांच दशक से ज्यादा समय बाद एक नई पीढ़ी बिहार की सड़कों पर अपने सवाल उठा रही है। आज का भारत 1974 के भारत से पूरी तरह अलग है। मौजूदा परीक्षा आंदोलनों की तुलना सीधे जेपी आंदोलन से करना भी उचित नहीं होगा। लेकिन इतिहास का एक सबक आज भी प्रासंगिक है— छात्र असंतोष को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उसकी शुरुआत किसी छोटे या सीमित मुद्दे से हुई है। कई बार परीक्षा का सवाल वास्तव में निष्पक्षता का सवाल होता है।

भर्ती का सवाल अवसर का सवाल बन जाता है। और रोजगार का सवाल पूरी पीढ़ी के इस भरोसे से जुड़ जाता है कि व्यवस्था उसके लिए काम कर रही है या नहीं।

अब एजेंडा खुद तय कर रहे हैं युवा

दशकों से राजनीतिक दल युवाओं को देश का भविष्य बताते रहे हैं। चुनावी घोषणापत्रों में रोजगार के वादे हुए। भाषणों में ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की चर्चा हुई। विश्वविद्यालयों और युवा सम्मेलनों में नेताओं की मौजूदगी रही। लेकिन अब संबंध बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। पहले राजनीतिक दल छात्रों को राजनीति में लाने की कोशिश करते थे। अब कई मामलों में छात्र खुद राजनीतिक मुद्दे तय कर रहे हैं और राजनीतिक दल उन मुद्दों के बीच जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यही इस बदलाव की सबसे बड़ी राजनीतिक अहमियत है।

असली सवाल ‘किसका आंदोलन’ नहीं

जंतर-मंतर, झारखंड और पटना के घटनाक्रमों को अलग-अलग देखने पर अलग-अलग परीक्षा विवाद और भर्ती संबंधी शिकायतें दिखाई देती हैं। लेकिन इन्हें एक साथ देखने पर एक बड़ी तस्वीर सामने आती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा लगभग एक जैसे सवाल पूछ रहे हैं—

परीक्षा कब होगी?

भर्ती कब पूरी होगी?

व्यवस्था पारदर्शी क्यों नहीं है?

अगर मेहनत की है तो निष्पक्ष अवसर मिलेगा या नहीं?

राजनीतिक दलों ने इन सवालों की ताकत को पहचान लिया है। खतरा यह है कि छात्र ऊर्जा को सिर्फ चुनावी गणित में बदल दिया जाए—कौन युवा वोट हासिल करेगा, कौन छात्र आंदोलन का चेहरा बनेगा और किस नेता की तस्वीर प्रदर्शनकारियों के साथ सबसे ज्यादा वायरल होगी। लेकिन शायद असली संदेश इससे कहीं बड़ा है। छात्र जरूरी नहीं कि किसी नेता से उन्हें नेतृत्व देने की मांग कर रहे हों। वे चाहते हैं कि राजनीतिक व्यवस्था उनकी बात सुने।

कैमरे हटने के बाद कौन खड़ा रहेगा?

भारतीय राजनीति ने वर्षों तक युवाओं को देश का भविष्य कहा है। लेकिन दिल्ली, झारखंड और पटना की सड़कों पर बैठे युवा शायद इससे अलग संदेश दे रहे हैं। वे कह रहे हैं—

“हम सिर्फ भविष्य नहीं हैं। हमारा भविष्य अभी तय हो रहा है।” यही वह बिंदु है जहां छात्र आंदोलन राजनीति के लिए अवसर भी बनता है और चुनौती भी। राजनेता छात्रों के साथ खड़े हो सकते हैं, उनकी आवाज संसद और विधानसभा तक पहुंचा सकते हैं और सरकारों से जवाब मांग सकते हैं। लेकिन अगर आंदोलन की असली आवाज राजनीतिक नारों के शोर में दब गई, तो भरोसा टूट सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में असली परीक्षा छात्रों की नहीं, राजनीति की होगी। सवाल यह नहीं होगा कि कौन नेता छात्रों के साथ तस्वीर खिंचवाता है। सवाल यह होगा कि कैमरे हटने के बाद भी कौन उनके मुद्दों के साथ खड़ा रहता है?

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