अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने बाद फिर गोलीबारी होना इस संघर्ष की सबसे बड़ी विडंबना सामने लाता है—युद्ध खत्म करने की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन युद्ध की परिस्थितियां लगातार बनी हुई हैं। छह महीने से जारी संघर्ष अब केवल ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच सैन्य टकराव नहीं रह गया है। इसके प्रभाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार, अमेरिकी रणनीतिक विश्वसनीयता और मध्य-पूर्व की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया कि अगला हमला कौन करेगा। असली सवाल है—क्या कोई पक्ष इस युद्ध को ऐसी स्थिति में रोक सकता है, जिसे वह अपनी हार न माने?
- छह महीने बाद भी जंग बेनतीजा?
- हॉर्मुज पर अटका दुनिया का कारोबार
- ईरान युद्ध में ट्रंप की अगली चाल
- अमेरिकी ताकत पर उठते बड़े सवाल
- युद्ध से आगे अब कूटनीति की बारी
ट्रंप की रणनीति: युद्ध से पीछे, दबाव से नहीं
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे कठिन चुनौती यही है कि सैन्य कार्रवाई से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद भी ईरान पर दबाव बनाए रखना है। पूर्ण पैमाने के सैन्य अभियान से पीछे हटकर आर्थिक प्रतिबंधों पर लौटना बताता है कि वॉशिंगटन फिलहाल ‘अधिकतम दबाव’ की नीति को सैन्य युद्ध से आर्थिक युद्ध की तरफ मोड़ना चाहता है। लेकिन इसमें जोखिम भी है। यदि ईरान की ओर से ऐसा हमला होता है जिसमें अमेरिकी नागरिक मारे जाते हैं, या अमेरिका पर बड़ा साइबर हमला होता है, तो सैन्य कार्रवाई की वापसी फिर संभव हो सकती है। यानी संघर्ष का भविष्य किसी बड़े अप्रत्याशित घटनाक्रम से तय हो सकता है।
हॉर्मुज बना युद्ध का सबसे खतरनाक मोर्चा
इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील बिंदु है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज। यह केवल एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि यह लंबे समय तक बाधित रहता है तो इसका असर ईंधन की कीमतों से लेकर वैश्विक महंगाई और सप्लाई चेन तक पहुंच सकता है। यहीं ईरान की रणनीतिक ताकत दिखाई देती है। तेहरान जानता है कि हॉर्मुज पर नियंत्रण उसे सैन्य ताकत से कहीं ज्यादा रणनीतिक सौदेबाजी की शक्ति देता है। अमेरिका के सामने भी दुविधा है—हॉर्मुज को सैन्य बल से खोलने की कोशिश बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैनिकों के जोखिम को बढ़ा सकती है।
क्या अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन मॉडल निकल सकता है?
हॉर्मुज को लेकर बहुपक्षीय व्यवस्था की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समस्या का एक ऐसा रास्ता सुझाती है जिसमें सीधे अमेरिका और ईरान के बीच टकराव कम किया जा सके। फारस की खाड़ी से जुड़े सभी देशों की भागीदारी वाला कोई बहुपक्षीय तंत्र समुद्री संचालन और सुरक्षा में भूमिका निभा सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल रहेगा—क्या ईरान अपनी संप्रभुता और सुरक्षा हितों से जुड़े मुद्दे पर किसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्वीकार करेगा? और दूसरी तरफ अमेरिका इस व्यवस्था को कितना प्रभावी मानेगा? यहीं कूटनीति की असली परीक्षा होगी।
6 हजार नाविक: युद्ध का मानवीय चेहरा
इस संघर्ष की चर्चा अक्सर मिसाइलों, प्रतिबंधों और सैन्य ठिकानों तक सीमित रहती है। लेकिन हॉर्मुज के आसपास फंसे करीब 6 हजार नाविक इस युद्ध का एक अलग मानवीय पहलू सामने लाते हैं। कुछ कंपनियां भोजन, क्रू रोटेशन और सुरक्षा का ध्यान रख रही हैं, जबकि कुछ नाविकों के सामने भोजन, वेतन और घर लौटने जैसी बुनियादी समस्याएं हैं। यह स्थिति बताती है कि आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों को प्रभावित नहीं करता। समुद्री व्यापार से जुड़े आम श्रमिक भी भू-राजनीतिक टकराव के अनदेखे शिकार बन जाते हैं।
युद्ध ने ईरानी शासन को कमजोर किया या मजबूत?
यह सवाल बेहद जटिल है। बाहरी दुश्मन के सामने अक्सर सरकार के आसपास राष्ट्रवादी एकजुटता बढ़ती है। ईरान के मामले में भी युद्ध ने शासन को विपक्ष के खिलाफ कार्रवाई को उचित ठहराने का अतिरिक्त आधार दिया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि युद्ध ने ईरानी समाज के भीतर मौजूद असंतोष को समाप्त कर दिया है। बल्कि संभावित तस्वीर यह है कि बाहरी युद्ध ने आंतरिक विरोध को दबाने के लिए शासन को अतिरिक्त राजनीतिक और सुरक्षा तर्क दिया है। इसलिए युद्ध समाप्त होने के बाद असली राजनीतिक परीक्षा फिर शुरू हो सकती है।
अमेरिकी शक्ति की विश्वसनीयता पर सवाल
इस युद्ध का सबसे बड़ा रणनीतिक नुकसान अमेरिका की deterrence credibility यानी प्रतिरोधक क्षमता की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य क्षमताओं में से एक है। लेकिन केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होती। सैन्य ताकत + स्पष्ट रणनीति + हासिल किया गया राजनीतिक परिणाम = वास्तविक शक्ति। अगर सैन्य अभियान के बावजूद हॉर्मुज बाधित रहता है, ईरान की परमाणु क्षमता का सवाल अनसुलझा रहता है और अमेरिकी ठिकाने तथा सहयोगी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह पाते, तो विरोधी देश अमेरिकी क्षमता का नए सिरे से आकलन करेंगे।
रूस और चीन सबसे ज्यादा क्या देख रहे हैं?
इस युद्ध को केवल अमेरिका-ईरान संघर्ष के रूप में देखना रणनीतिक भूल होगी। रूस और चीन के लिए यह एक केस स्टडी है—अमेरिकी सैन्य शक्ति कितने लंबे संघर्ष को संभाल सकती है? अमेरिकी हथियार भंडार पर कितना दबाव पड़ता है? सहयोगियों को कितनी सहायता दी जा सकती है? और सबसे महत्वपूर्ण—अमेरिका सैन्य शक्ति को राजनीतिक परिणाम में कितनी जल्दी बदल सकता है? इसलिए ईरान युद्ध का प्रभाव मध्य-पूर्व से कहीं आगे जा सकता है।
नवंबर का अमेरिकी चुनाव—युद्ध का राजनीतिक मोर्चा
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव भी इस संघर्ष को नया राजनीतिक आयाम दे सकते हैं। अगर डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा या सीनेट में मजबूत स्थिति हासिल करते हैं, तो युद्ध से जुड़े फैसलों की जांच और प्रशासन की जवाबदेही का मुद्दा तेजी से उठ सकता है। इसका अर्थ है कि युद्ध अब केवल विदेश नीति नहीं रहा—यह अमेरिकी घरेलू राजनीति का भी मुद्दा बन सकता है।
ईरान युद्ध इस समय ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जहां किसी भी पक्ष के लिए पूर्ण जीत मुश्किल और पीछे हटना राजनीतिक रूप से महंगा है। अमेरिका सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है, लेकिन लंबे युद्ध की कीमत भी समझता है। ईरान अपने रणनीतिक कार्ड—विशेषकर हॉर्मुज—को छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन लंबे संघर्ष के आर्थिक और सामाजिक असर से बचना भी उसके हित में है। यही कारण है कि आगे का रास्ता संभवतः युद्ध और बातचीत के बीच झूलता रहेगा। “ईरान युद्ध अब मिसाइलों की लड़ाई से आगे बढ़कर हॉर्मुज, अर्थव्यवस्था और अमेरिकी विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है।”





