ईरान युद्ध का असर: मंडीदीप उद्योगों पर संकट, नौकरियां घटीं….उत्पादन घटा…शिफ्ट हुई कम..श्रमिकों की रोजी-रोटी पर गहराया ये संकट

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ईरान युद्ध का असर: मंडीदीप उद्योगों पर संकट, नौकरियां घटीं

भोपाल/मंडीदीप 
मध्यप्रदेश के औद्योगिक केंद्र मंडीदीप में इन दिनों सुस्ती का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह वैश्विक स्तर पर जारी ईरान युद्ध है, जिसने तेल और ऊर्जा की कीमतों को तेजी से बढ़ा दिया है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए सप्लाई में आई बाधा ने भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की औद्योगिक व्यवस्था पर सीधा असर डाला है। नतीजतन, मंडीदीप की फैक्ट्रियों में उत्पादन घटा है, शिफ्ट कम कर दी गई हैं और हजारों श्रमिकों की रोजी-रोटी पर संकट गहराने लगा है।

  1. ईरान युद्ध से उद्योगों पर गहरा असर
  2. मंडीदीप में उत्पादन 30% तक घटा
  3. महंगाई और सप्लाई संकट से फैक्ट्रियां प्रभावित
  4. नौकरियां घटीं, मजदूर गांव लौटने को मजबूर
  5. निर्यात घटा, उद्योगों पर बढ़ा दबाव

दरअसल, ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आया है। इससे उन उद्योगों की लागत बढ़ गई है, जो आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं। मंडीदीप, जो भोपाल के पास स्थित एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है, वहां की कई इकाइयां पेट्रोकेमिकल आधारित उत्पादन करती हैं। ऐसे में कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत के कारण इन इकाइयों को अपने उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है।

जब औद्योगिक क्षेत्र का जायजा लिया गया, तो वहां की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली नजर आई। जो फैक्ट्रियां पहले तीन शिफ्ट में लगातार चलती थीं, वे अब एक या दो शिफ्ट में ही सीमित हो गई हैं। कई जगह मशीनें आधी क्षमता से चल रही हैं और फैक्ट्री गेट पर ट्रकों की संख्या भी पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। अनुमान के मुताबिक, कुल उत्पादन में करीब 30 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।

इस मंदी का सबसे ज्यादा असर मजदूरों पर पड़ा है। मंडीदीप के लेबर चौक पर रोजाना काम की तलाश में आने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ गई है, जबकि काम के अवसर घटते जा रहे हैं। कई मजदूरों को या तो नौकरी से निकाल दिया गया है या उनकी मजदूरी कम कर दी गई है।

विदिशा के रहने वाले रोहित शर्मा, जो पिछले आठ साल से मंडीदीप में काम कर रहे थे, बताते हैं कि उन्होंने प्लास्टिक यूनिट में अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि उनकी दिहाड़ी 600-700 रुपये से घटाकर 450 रुपये कर दी गई थी। उनका कहना है कि कच्चे माल की कमी के कारण फैक्ट्रियों ने शिफ्ट घटा दी हैं, जिससे मजदूरों के लिए काम मिलना मुश्किल हो गया है।

इसी तरह सागर के रहने वाले रामकुमार मजदूर भी अपनी नौकरी गंवाने के बाद गांव लौटने को मजबूर हो गए हैं। उनका कहना है कि बढ़ते खर्च और किराया वहन करना मुश्किल हो गया है। “अभी काम नहीं है और खर्च बहुत ज्यादा है, ऐसे में गांव लौटना ही बेहतर है,” उन्होंने बताया।

फैक्ट्रियों के अंदर भी हालात ज्यादा बेहतर नहीं हैं। एक पेन निर्माण और पैकेजिंग यूनिट में जहां पहले करीब 100 मजदूर काम करते थे, वहां अब केवल 50 ही बचे हैं। यूनिट की मालिक का कहना है कि कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत के कारण उत्पादन धीमा हो गया है। “जब सप्लाई कम होती है, तो हर चीज प्रभावित होती है। हम कम ऑर्डर भेज पा रहे हैं और ज्यादा मजदूर रखने की स्थिति में नहीं हैं,” उन्होंने कहा। मजदूर सप्लाई करने वाले ठेकेदार के मुताबिक भी स्थिति चिंताजनक है। ठेकेदार  जो फैक्ट्रियों को श्रमिक उपलब्ध कराते हैं, बताते हैं कि पहले जहां रोजाना 300 मजदूर काम पर भेजे जाते थे, अब यह संख्या घटकर 150-175 रह गई है। उनका कहना है कि जब उत्पादन कम होता है, तो सबसे पहले सहायक कार्यों में कटौती होती है, जिससे रोजगार पर सीधा असर पड़ता है।

इस संकट का असर केवल स्थानीय उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्यात पर भी पड़ा है। मंडीदीप ऑल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के महासचिव नीरज जैन के अनुसार, पेट्रोकेमिकल उत्पादन में कमी और सप्लाई में देरी के कारण घरेलू बाजार का करीब आधा हिस्सा प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही निर्यात में भी भारी गिरावट आई है। पहले जहां हर महीने 3500 से ज्यादा कंटेनर भेजे जाते थे, अब यह संख्या घटकर करीब 1500 रह गई है। खासतौर पर खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात पिछले एक महीने से लगभग ठप हो गया है।

कुल मिलाकर, मंडीदीप की यह स्थिति दिखाती है कि वैश्विक स्तर पर होने वाले युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का असर किस तरह स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। जिन मजदूरों का इस युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं है, वही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। फैक्ट्रियों की रफ्तार धीमी पड़ने से रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं और मजदूरों को अपने घर लौटना पड़ रहा है। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह संकट और गहरा सकता है। फिलहाल मंडीदीप की औद्योगिक गतिविधियों में आई यह गिरावट न केवल आर्थिक चिंता का विषय है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि वैश्विक संकटों का प्रभाव अब स्थानीय स्तर पर भी तेजी से महसूस किया जा रहा है।

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