बढ़ते जलवायु संकट के बीच भारत की आपदा प्रबंधन व्यवस्था…
जलवायु आपदाओं में लगातार वृद्धि
भारत में जलवायु से जुड़ी आपदाओं की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों में अचानक बाढ़, पूर्वी तट पर तेज चक्रवात और उत्तर व मध्य भारत में लंबी हीटवेव अब सामान्य होती जा रही हैं। ये घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि जलवायु अस्थिरता के बड़े पैटर्न का हिस्सा बन चुकी हैं।
बदलता परिदृश्य और बढ़ती चुनौतियां
इन आपदाओं ने देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सरकार भले ही आपदा प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार की बात करती है, लेकिन बढ़ती जटिलता यह संकेत देती है कि मौजूदा व्यवस्था कई स्तरों पर कमजोर साबित हो रही है।
आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढांचा
पिछले दो दशकों में भारत ने आपदा प्रबंधन के लिए मजबूत ढांचा तैयार किया है। 2004 की सुनामी के बाद 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू हुआ, जिसके तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) को अहम जिम्मेदारियां दी गईं।
सुधारों से मिली सफलता
इस ढांचे के चलते कई क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला है। विशेष रूप से चक्रवात पूर्व चेतावनी प्रणाली ने पूर्वी तट पर मौतों की संख्या में भारी कमी लाई है। मौसम पूर्वानुमान सटीक हुए हैं और निकासी योजनाएं बेहतर तरीके से लागू की जा रही हैं।
जलवायु परिवर्तन से नई चुनौतियां
हालांकि जलवायु परिवर्तन आपदाओं के स्वरूप को तेजी से बदल रहा है। अब भारी बारिश, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन उन क्षेत्रों में भी हो रहे हैं जहां पहले ऐसे खतरे कम थे। इससे पारंपरिक आपदा प्रबंधन प्रणाली पर दबाव बढ़ गया है।
शहरी और ग्रामीण संकट गहराया
बड़े शहरों में जल निकासी व्यवस्था अचानक होने वाली भारी बारिश को संभाल नहीं पा रही, जिससे शहरी बाढ़ की समस्या बढ़ रही है। वहीं हीटवेव का असर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों पर पड़ रहा है, जिनके पास पर्याप्त सुरक्षा नहीं होती।
प्रतिक्रियात्मक नहीं, सक्रिय रणनीति की जरूरत
इन बदलते हालातों के बीच आपदा प्रबंधन के लिए केवल प्रतिक्रिया आधारित नहीं, बल्कि रोकथाम और तैयारी आधारित रणनीति अपनाने की जरूरत है। वर्तमान में भारत की व्यवस्था अधिकतर प्रतिक्रियात्मक बनी हुई है, जो भविष्य के जोखिमों को कम करने में पर्याप्त नहीं है।
हाइपरलोकल डेटा की कमी बड़ी समस्या
आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी हाइपरलोकल यानी स्थानीय स्तर के सटीक डेटा की कमी है। राष्ट्रीय स्तर के पूर्वानुमान अक्सर किसी विशेष गांव या इलाके की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शा पाते, जिससे जोखिम की सही पहचान नहीं हो पाती।
तकनीकी और संस्थागत खामियां
भारत में आपदा योजना मुख्यतः राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बनाई जाती है, जबकि आपदाओं का असर स्थानीय स्तर पर सबसे ज्यादा होता है। जिला और नगर प्रशासन के पास अक्सर रियल टाइम पर्यावरण डेटा की कमी होती है, जिससे प्रभावी निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।
भविष्य के लिए समन्वित समाधान जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, सैटेलाइट मॉनिटरिंग, सेंसर तकनीक और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को जोड़कर बेहतर आपदा प्रबंधन संभव है। जब तक हाइपरलोकल डेटा को नीति में शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक आपदाओं से निपटना अधूरा रहेगा और देश को हर बार नुकसान के बाद ही प्रतिक्रिया देनी पड़ेगी।