WTO में भारत का सख्त रुख—चीन के IFD समझौते पर ‘वीटो’, आर्थिक संप्रभुता की बड़ी लड़ाई…

India blocks China

WTO में भारत का सख्त रुख—चीन के IFD समझौते पर ‘वीटो’, आर्थिक संप्रभुता की बड़ी लड़ाई

‘एनेक्स-4’ के जरिए IFD लागू करने की कोशिश पर भारत ने लगाया ब्रेक, चीन के रणनीतिक प्लान पर उठे सवाल

नई दिल्ली/जिनेवा। वैश्विक व्यापार की सबसे अहम संस्था विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इन दिनों एक बड़ा टकराव देखने को मिल रहा है। चीन के नेतृत्व में कई देश ‘इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट’ (IFD) समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं भारत ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए ‘वीटो’ लगा दिया है। भारत का यह कदम केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक संप्रभुता और नीति निर्माण की स्वतंत्रता से जुड़ा बड़ा संदेश माना जा रहा है।

क्या है IFD समझौता और क्यों है विवाद?

IFD यानी Investment Facilitation for Development एक प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसे 2017 में चीन और कुछ अन्य देशों ने आगे बढ़ाया था। इसका उद्देश्य विदेशी निवेश (FDI) की प्रक्रियाओं को आसान, पारदर्शी और तेज बनाना है। इस समझौते के तहत देशों को निवेश से जुड़े नियम सार्वजनिक करने होंगे और ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ जैसी सुविधाएं विकसित करनी होंगी ताकि विदेशी कंपनियों को मंजूरी लेने में आसानी हो। सतही तौर पर यह व्यवस्था निवेश बढ़ाने के लिए सकारात्मक दिखती है, लेकिन इसके पीछे छिपे रणनीतिक पहलुओं को लेकर भारत सतर्क है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, IFD को समर्थन देने वाले 128 देशों में से बड़ी संख्या उन देशों की है जो चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से जुड़े हैं। ऐसे में भारत को आशंका है कि इस समझौते के जरिए चीन वैश्विक निवेश नियमों पर प्रभाव बढ़ाकर अपने इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देना चाहता है।

‘एनेक्स-4’ का पेंच और भारत का वीटो

WTO में किसी भी नए समझौते को शामिल करने के दो तरीके होते हैं—मल्टीलैटरल (सभी देशों पर लागू) और प्लूरोलैटरल (कुछ देशों के लिए)। ‘एनेक्स-4’ इसी दूसरी श्रेणी में आता है, जिसमें शामिल नियम केवल उन देशों पर लागू होते हैं जो समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं। लेकिन यहां एक अहम शर्त है—किसी भी नए समझौते को ‘एनेक्स-4’ में शामिल करने के लिए WTO के सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। भारत ने इसी बिंदु पर अपनी ‘वीटो पावर’ का इस्तेमाल करते हुए IFD को आगे बढ़ने से रोक दिया। भारत का मानना है कि ‘एनेक्स-4’ के जरिए इस तरह के समझौतों को लाना WTO की मूल भावना के खिलाफ है, जहां सभी देशों की समान भागीदारी और सहमति को महत्व दिया जाता है।

भारत के विरोध के तीन बड़े कारण

पहला कारण है नीति निर्माण की स्वतंत्रता। भारत को आशंका है कि अगर IFD लागू होता है, तो उसे अपने निवेश नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार बदलना पड़ेगा। इससे ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों पर असर पड़ सकता है और घरेलू उद्योगों को मिलने वाली प्राथमिकता कमजोर हो सकती है। दूसरा मुद्दा है ‘ट्रेड बनाम इन्वेस्टमेंट’। भारत का स्पष्ट रुख है कि WTO का गठन व्यापार से जुड़े नियमों के लिए हुआ है, न कि निवेश से जुड़े मामलों के लिए। निवेश हर देश का आंतरिक और रणनीतिक विषय होता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय नियमों में बांधना उचित नहीं है। तीसरा कारण रणनीतिक और सामरिक है। भारत लंबे समय से WTO में खाद्य सुरक्षा और पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग के मुद्दे पर स्थायी समाधान की मांग कर रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत IFD पर अपने कड़े रुख का इस्तेमाल एक ‘बार्गेनिंग टूल’ के रूप में भी कर सकता है, ताकि कृषि क्षेत्र में उसे राहत मिल सके।

चीन का ‘गेम प्लान’ और भारत की चिंता

चीन की रणनीति को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि IFD के जरिए वैश्विक निवेश के नियमों को इस तरह सेट किया जा सकता है, जिससे बड़े और विकसित देश छोटे व विकासशील देशों पर अपनी शर्तें थोप सकें। अगर ऐसा होता है, तो भविष्य में बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसी देश की नीतियों को चुनौती दे सकती हैं। इससे विकासशील देशों की आर्थिक नीतियों पर बाहरी दबाव बढ़ सकता है।

आगे क्या होगा? MC14 पर टिकी नजरें

अब सभी की नजरें WTO की अगली मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) पर टिकी हैं, जहां इस मुद्दे पर अंतिम फैसला हो सकता है। अगर भारत अपने रुख पर कायम रहता है, तो चीन और उसके सहयोगी देशों के लिए IFD को वैश्विक मान्यता दिलाना मुश्किल हो जाएगा।

भारत का संदेश: संप्रभुता से समझौता नहीं

भारत का यह रुख साफ संकेत देता है कि वह किसी भी ऐसे वैश्विक समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा, जो उसकी आर्थिक नीतियों और घरेलू हितों को प्रभावित करता हो। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी संकेत दिए हैं कि भारत विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिए हर स्तर पर अपनी आवाज उठाता रहेगा। WTO में IFD को लेकर जारी यह टकराव केवल एक व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की भी कहानी है। भारत का ‘वीटो’ यह दिखाता है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका निर्णायक हो चुकी है। साथ ही, यह विकासशील देशों के लिए भी एक संदेश है कि वे अपने हितों की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़े हो सकते हैं।

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