Story of an Unsung Freedom Fighter : क्या एक कविता अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला सकती है? क्या कलम की ताकत इतनी बड़ी हो सकती है कि अंग्रेज एक पिता और बेटे को तोप के मुंह से बांधकर मौत की सजा दे दें? 1857 की क्रांति के दौर में मध्य भारत की धरती पर राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया। उनके पास न बड़ी सेना थी, न आधुनिक हथियार, लेकिन उनके पास था देशभक्ति से भरा जुनून और क्रांति की आवाज। उनकी कविताओं ने जनता और सैनिकों में विद्रोह की चिंगारी जगाई। आजादी स्पेशल में जानिए इन अमर बलिदानियों की पूरी शौर्यगाथा।
जब कविता बनी अंग्रेजों के खिलाफ हथियार
पिता-पुत्र की शहादत से कांपा महाकौशल
कलम से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती
तोप के मुंह से अमर हुई शौर्यगाथा
शंकर-रघुनाथ की कुर्बानी, अमर कहानी
गोंडवाना के राजवंश से 1857 की क्रांति तक, शंकर शाह-रघुनाथ शाह की बलिदानी विरासत
1857 की क्रांति में अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह गढ़ा-मंडला और जबलपुर के गोंड राजवंश के प्रतापी राजा संग्राम शाह के वंशज थे। इस राजवंश की कई पीढ़ियों ने देश, मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। राजा संग्राम शाह के बड़े पुत्र दलपत शाह की पत्नी रानी दुर्गावती और उनके पुत्र वीर नारायण ने मुगल सम्राट अकबर की सेना के खिलाफ युद्ध करते हुए बलिदान दिया। इसके बाद गढ़ा-मंडला मुगल अधीनता में चला गया और चंद्र शाह को शासन की जिम्मेदारी दी गई। इसी वंश की 11वीं पीढ़ी में अमर शहीद राजा शंकर शाह का जन्म हुआ।
राजा शंकर शाह के दादा गोंड राजवंश के अंतिम प्रसिद्ध शासकों में माने जाने वाले राजा निजाम शाह और पिता राजा सुमेद शाह थे। शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह का जन्म मंडला के ऐतिहासिक किले में हुआ था। वर्ष 1818 में मंडला अंग्रेजों के अधीन चला गया। इसके बाद शंकर शाह के पास सीमित जागीर और अंग्रेजों से मिलने वाली पेंशन ही बची, लेकिन जनता के बीच उनका सम्मान कायम रहा। उनकी पत्नी रानी फूलकुंवर और पुत्र रघुनाथ शाह थे। रघुनाथ शाह का विवाह रानी मन कुंवर से हुआ और उनके पुत्र का नाम लक्ष्मण शाह था।
1857 की क्रांति में जब पूरा देश आजादी की आग में जल रहा था। तब मध्य भारत की धरती पर। दो नाम। अंग्रेजी हुकूमत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुके थे। राजा शंकर शाह। और। उनके बेटे रघुनाथ शाह। इन दोनों ने ऐसी कविता लिखी। जिसमें अंग्रेजी शासन के अंत की हुंकार थी। और फिर। ब्रिटिश सरकार ने ऐसा फैसला लिया। जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 18 सितंबर 1857 जबलपुर। हजारों लोगों की भीड़। बीच मैदान में खड़ी दो तोपें। और उनसे बंधे। एक पिता। और उसका बेटा। अगले ही पल। एक जोरदार धमाका। और दोनों के शरीर के टुकड़े हवा में बिखर गए। लेकिन उस दिन दो इंसान नहीं मरे। उस दिन पैदा हुए भारत के दो अमर शहीद। जिन्होंने दुनिया को सिखाया। कि जब कलम क्रांति लिखती है। तो साम्राज्य भी कांप उठते हैं। तो आखिर कौन थे राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह? कैसी थी वो कविता। जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी? और क्यों अंग्रेजों ने उन्हें इतनी दर्दनाक मौत दी? आज जानिए एक ऐसी सच्ची कहानी। जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए।
राजा शंकर शाह। गढ़ा-मंडला के गोंड राजवंश के उत्तराधिकारी थे। यह वही वंश था। जिसने कभी मध्य भारत पर शासन किया था। इसी राजवंश में जन्म लिया था। वीरांगना रानी दुर्गावती ने। जिन्होंने अकबर की सेना से आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी थी। समय बदला। अंग्रेजों ने गोंडवाना की सत्ता खत्म कर दी। लेकिन जनता के दिलों से। राजा शंकर शाह का सम्मान कभी खत्म नहीं हुआ। उनकी एक आवाज। हजारों लोगों को एकजुट कर सकती थी। राजा शंकर शाह अकेले नहीं थे। उनके साथ थे। उनके बेटे। रघुनाथ शाह। रघुनाथ शाह भी अपने पिता की तरह। देशभक्त। और बेहतरीन कवि थे ! दोनों का सपना सिर्फ एक था। भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो। लेकिन उनके पास। न बड़ी सेना थी। न आधुनिक हथियार। फिर भी। अंग्रेजों की सबसे बड़ी कमजोरी को उन्होंने पहचान लिया था। बस फिर क्या था जनता में चेतना जगाने राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह देशभक्ति से भरी कविताएं लिखने लगे थे।
इन कविताओं ने गुप्त रूप से लोगों और सैनिकों तक अपनी पहुंचाई बनाई। इन कविताओं में मां काली से यह प्रार्थना की जाती थी। कि भारत में अंग्रेजी शासन का अंत हो और हमारा भारत आजादी की सांस ले। इन रचनाओं में गुलामी के खिलाफ आक्रोश था। स्वाभिमान था। और आजादी का सपना था। धीरे-धीरे। इन कविताओं ने लोगों के दिलों में आग लगा दी। सैनिकों के भीतर विद्रोह की चिंगारी भड़कने लगी। जनता अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर बोलने लगी। और यहीं से। ब्रिटिश सरकार घबरा गई। अंग्रेजों के जासूस लगातार नजर रख रहे थे। किसी मुखबिर ने खबर दी। कि राजा शंकर शाह। सिर्फ कविताएं नहीं लिख रहे। बल्कि विद्रोह की तैयारी भी कर रहे हैं। उनके घर पर छापा पड़ा। तलाशी में। देशभक्ति की कविताएं मिलीं। बस। यही उनकी सबसे बड़ी “गलती” बन गई। आज जिन कविताओं को हम साहित्य कहते हैं। उन्हें अंग्रेजों ने। राजद्रोह का हथियार घोषित कर दिया।
14 सितंबर 1857 को दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। न मुकदमा। न इंसाफ। न दया। ब्रिटिश सरकार ने फैसला कर लिया था। कि इन दोनों को ऐसी मौत दी जाएगी। जिससे पूरा भारत डर जाए। 18 सितंबर 1857। जबलपुर में। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को। तोप के मुंह पर बांधा गया। हजारों लोग यह दृश्य देख रहे थे। कुछ ही सेकंड बाद। एक धमाका हुआ। और। दो शरीर नहीं। बल्कि दो अमर नाम। इतिहास में दर्ज हो गए।
अंग्रेज सोच रहे थे। कि इस मौत से लोग डर जाएंगे। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। पूरा महाकौशल क्षेत्र भड़क उठा। लोगों के भीतर गुस्सा और बढ़ गया। 1857 की क्रांति को। नई ताकत मिल गई। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह। अब सिर्फ राजा और राजकुमार नहीं रहे। वे। शहादत का प्रतीक बन गए। दोस्तों। इतिहास हमें यह सिखाता है। कि हर लड़ाई। सिर्फ तलवारों से नहीं जीती जाती। कई बार। एक कलम। एक कविता। एक गीत। या एक विचार। साम्राज्यों की नींव हिला देता है। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने। अपने खून से यह साबित किया। कि अगर शब्दों में सच्चाई और साहस हो। तो वे तोपों से भी ज्यादा ताकतवर बन जाते हैं। आज जब हम अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं। तो हमें उन दो शहीदों को जरूर याद करना चाहिए। जिन्होंने अपनी कविता की कीमत। अपनी जान देकर चुकाई। यही कारण है कि आज भी। मध्य प्रदेश की धरती। इन दोनों वीरों को। सिर झुकाकर नमन करती है।
जबलपुर में राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह की याद में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय में स्थापित किया गया है। इसे 15 नवंबर 2024 को जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर जनता को समर्पित किया गया। यह संग्रहालय उसी ऐतिहासिक स्थल पर बनाया गया है, जहाँ 18 सितंबर 1857 को इन दोनों वीर नायकों को अंग्रेजों ने तोप से उड़ाकर मृत्युदंड दिया था। संग्रहालय में कुल पाँच प्रमुख गैलरी हैं। इनमें गोंडवाना साम्राज्य की संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक जीवन, राजा शंकर शाह की क्रांतिकारी कविताएँ और उनके हथियारों को प्रदर्शित किया गया है। यहाँ इतिहास को जीवंत करने के लिए 3डी होलोग्राम और डिजिटल माध्यमों का उपयोग किया गया है, जिससे लोग उनके बलिदान और गाथा को आसानी से समझ सकें।
अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह की शौर्य गाथा आज भी सिर्फ महाकौशल ही नहीं पूरे प्रदेश और देश को जोश और जुनून से भर देती है। मध्यप्रदेश का इतिहास वीर सपूतों और जननायकों के बलिदानों से भरा हुआ है, जिन्होंने विदेशी हुकूमत और दमनकारी ताकतों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।
भारत के ‘हृदय प्रदेश’ कहे जाने वाले इस राज्य ने देश को ऐसे महान क्रांतिकारी और जनजातीय योद्धा दिए, जिनकी वीरता आज भी जन-जन को प्रेरित करती है।





