भारत की गृहिणियों का अनमोल योगदान! अगर मिले वेतन तो सालाना कीमत होगी 22.7 लाख करोड़ रुपये

भारत की करोड़ों महिलाएं हर दिन घर और परिवार की जिम्मेदारियां निभाती हैं, लेकिन उनके इस श्रम का आर्थिक मूल्य अक्सर दिखाई नहीं देता। खाना बनाना, घर की साफ-सफाई, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार की दैनिक जरूरतों को संभालने जैसे कई महत्वपूर्ण काम बिना किसी वेतन के किए जाते हैं। अब सामने आई रिपोर्ट ने इस अदृश्य मेहनत की वास्तविक आर्थिक अहमियत को सामने रखा है। रिपोर्ट बताती है कि यदि इन घरेलू कार्यों का भुगतान किया जाए तो इसकी सालाना कीमत लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी गृहिणियों के योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें “राष्ट्र निर्माता” बताया था।

21 करोड़ से ज्यादा महिलाएं बिना वेतन संभाल रही हैं घर की पूरी जिम्मेदारी

सरकारी आंकड़ों और विभिन्न शोध रिपोर्टों के अनुसार भारत में 21 करोड़ से अधिक महिलाएं बिना किसी वेतन के घरेलू कार्य और परिवार की देखभाल में लगी हुई हैं। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक रिपोर्ट के मुताबिक यदि इन सभी कार्यों का आर्थिक मूल्य तय किया जाए तो यह करीब 22.7 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष बैठता है। यह राशि देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 7.5 प्रतिशत मानी गई है, जो महिलाओं के योगदान की विशालता को दर्शाती है।

हर दिन लगभग सात घंटे घरेलू जिम्मेदारियों में बीत जाता है समय

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी टाइम-यूज सर्वे 2024 के अनुसार महिलाएं प्रतिदिन औसतन करीब 7 घंटे बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों में बिताती हैं। इसमें खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं। ये ऐसे कार्य हैं जिनके बिना किसी भी परिवार की दैनिक व्यवस्था सुचारु रूप से चल पाना मुश्किल है, लेकिन इनका कोई प्रत्यक्ष आर्थिक भुगतान नहीं होता।

उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं पर जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ता जाता है

रिपोर्ट बताती है कि 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं प्रतिदिन औसतन 305 मिनट घरेलू कार्यों में लगाती हैं। वर्ष 2019 में यह समय 315 मिनट था, यानी इसमें थोड़ी कमी आई है, लेकिन जिम्मेदारियों का स्तर अभी भी काफी अधिक है। इसी आयु वर्ग में 41 प्रतिशत महिलाएं परिवार के सदस्यों की देखभाल में सक्रिय रहती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा केवल 21.4 प्रतिशत दर्ज किया गया। इससे साफ है कि घरेलू देखभाल की बड़ी जिम्मेदारी आज भी महिलाओं के कंधों पर है।

गृहिणियों के योगदान को आर्थिक पहचान देने की बढ़ रही मांग

विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू कामकाज को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह देश की अर्थव्यवस्था में अप्रत्यक्ष लेकिन बेहद महत्वपूर्ण योगदान देता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” कहे जाने के बाद इस विषय पर नई बहस शुरू हुई है कि क्या भविष्य में घरेलू श्रम को आर्थिक मान्यता देने की दिशा में और कदम उठाए जाने चाहिए। फिलहाल यह रिपोर्ट महिलाओं की मेहनत और उनके अमूल्य योगदान को नए नजरिए से देखने का अवसर देती है।

 

 

 

 

 

 

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