क्या बड़ा स्टार होता तो ‘हनुमान अंश’ इतनी बड़ी हिट बनती?…क्योंकि…यहां स्टार नहीं था… किरदार था.

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बड़ा स्टार होता तो ‘हनुमान अंश’ इतनी बड़ी हिट बनती?..क्योंकि यहां स्टार नहीं था… किरदार था

एक मित्र ने मेरी पोस्ट पर कमेंट किया—“अगर ‘हनुमान अंश’ में शोभिनव सत्या की जगह कोई बड़ा एक्टर होता, तो फिल्म ब्लॉकबस्टर होती।” सवाल दिलचस्प था… लेकिन शायद इस कहानी को उल्टा पढ़ने की जरूरत है। क्या पता ‘हनुमान अंश’ की ब्लॉकबस्टर सफलता की सबसे बड़ी वजह ही यह हो कि इसमें कोई बड़ा स्टार नहीं था? क्योंकि कहानी सिर्फ फिल्म की कास्टिंग की नहीं है… कहानी उस अभिनेता की है, जो असल में इस फिल्म का लीड एक्टर बनने वाला ही नहीं था।

शोभिनव सत्या इस फिल्म से अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में जुड़े थे। फिल्म की तैयारी पूरी हो चुकी थी। स्क्रिप्ट तैयार थी, गानों की रिकॉर्डिंग हो चुकी थी और नीम करौली बाबा के किरदार के लिए एक दूसरे अभिनेता को फाइनल भी किया जा चुका था। लेकिन शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले वह अभिनेता अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। शूटिंग रुकने की स्थिति बन गई।

इसी दौरान निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की नजर अपने ही सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर शोभिनव सत्या पर गई। छोटे बाल… चेहरे पर सादगी… और नीम करौली बाबा महाराज जी से मिलती-जुलती शक्ल। लेकिन सिर्फ चेहरा देखकर इतना बड़ा फैसला लेना आसान नहीं था। इसलिए हुआ एक लंबा स्क्रीन टेस्ट।

चित्रकूट की मंदाकिनी नदी में नाव पर करीब पांच घंटे तक शोभिनव का ऑडिशन लिया गया। पांच घंटे की परीक्षा के बाद निर्देशक को लगा कि शायद जिस चेहरे की तलाश थी, वह उनके सामने ही मौजूद था।
और फिर शोभिनव सत्या को महाराज जी के किरदार के लिए फाइनल कर दिया गया। यहीं से यह कहानी सामान्य फिल्म कास्टिंग से निकलकर एक अलग तरह की कहानी बन जाती है।

बताया जाता है कि शोभिनव साल 2009 से नीम करौली बाबा के भक्त रहे हैं। वे लंबे समय से हनुमान जी की भक्ति और सात्विक जीवनशैली से जुड़े रहे हैं। उनका मानना है कि वर्षों से चल रहा यही आध्यात्मिक अनुशासन उन्हें अनजाने में इस किरदार के लिए तैयार कर रहा था।

अब जरा कल्पना कीजिए…

अगर उनकी जगह कोई बड़ा बॉलीवुड या साउथ स्टार इस किरदार में आता तो क्या होता? शायद दर्शक थिएटर में नीम करौली बाबा को देखने जाते, लेकिन पर्दे पर उन्हें उस स्टार की छवि भी लगातार दिखाई देती। बड़े स्टार का अपना व्यक्तित्व होता है। उसकी अपनी फैन फॉलोइंग होती है। उसकी पिछली फिल्मों की छवि होती है। दर्शक उसके किरदार को भी उसी नजर से देखते हैं।

शोभिनव सत्या के साथ ऐसा कुछ नहीं था। उनका कोई बड़ा फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था। दर्शकों के लिए उनका चेहरा नया था। इसलिए पर्दे पर किरदार और अभिनेता के बीच की दूरी बेहद कम हो गई। और यहीं शायद ‘हनुमान अंश’ का सबसे बड़ा सिनेमाई प्रयोग सफल हुआ।

यहां स्टार नहीं था… किरदार था।

यहां अभिनय का दावा नहीं था… श्रद्धा का भाव था। फिल्म के समर्थकों और भक्तों की प्रतिक्रियाओं में भी यही भाव सामने आया कि शोभिनव जब महाराज जी के गेटअप में पर्दे पर दिखाई दिए तो लोगों को वह सिर्फ अभिनय जैसा नहीं लगा। कई दर्शकों के लिए यह एक भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव बन गया। यही वजह है कि जब फिल्म की शुरुआती कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं रही और इसे जल्द थिएटर से हटाए जाने की बात सामने आई, तब शोभिनव सत्या ने खुद लोगों से फिल्म देखने की अपील की।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि फिल्म को एक बार सिनेमाघर जाकर जरूर देखें। उनका संदेश साफ था—यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि नीम करौली बाबा महाराज के प्रति श्रद्धा से बनाई गई है।
और शायद यहीं से कहानी बदल गई। एक तरफ था कमजोर शुरुआती कलेक्शन…दूसरी तरफ थे बाबा के भक्त। एक तरफ सीमित पहचान वाला अभिनेता… दूसरी तरफ करोड़ों लोगों की आस्था। और सोशल मीडिया पर जब फिल्म को लेकर लोगों ने बात करनी शुरू की तो धीरे-धीरे सिनेमाघरों में दर्शक बढ़ने लगे। फिर वही फिल्म, जिसे शुरुआती दिनों में शायद कम स्क्रीन और कमजोर कलेक्शन की वजह से संघर्ष करना पड़ रहा था, बॉक्स ऑफिस पर असाधारण प्रदर्शन करने लगी।

यही वह जगह है जहां ‘हनुमान अंश’ बॉलीवुड को एक बड़ा सवाल देती है। क्या हर फिल्म को हिट कराने के लिए बड़ा स्टार जरूरी है? शायद नहीं। कभी-कभी कहानी इतनी बड़ी होती है कि स्टार की जरूरत ही नहीं पड़ती। और कभी-कभी बड़ा स्टार कहानी से भी बड़ा हो जाता है। ‘हनुमान अंश’ की सफलता को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि शोभिनव सत्या बड़े अभिनेता नहीं थे। फिल्म की सफलता में कहानी, विषय, दर्शकों की आस्था, प्रचार, वर्ड ऑफ माउथ और रिलीज के बाद बनी चर्चा—कई因素 काम कर सकते हैं। लेकिन शोभिनव की कास्टिंग ने निश्चित तौर पर फिल्म को एक अलग पहचान दी। क्योंकि यहां दर्शक किसी स्टार की लोकप्रियता देखने नहीं आया था। वह अपने महाराज जी को देखने आया था। और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट है— अगर कोई बड़ा स्टार होता, तो शायद दर्शक स्टार को देखने आते। शोभिनव सत्या आए… तो दर्शक महाराज जी को देखने आए। अब सवाल यह नहीं कि बड़ा स्टार होता तो फिल्म कितनी बड़ी हिट होती। सवाल यह है— क्या बड़ा स्टार होता तो ‘हनुमान अंश’ वही फिल्म रह जाती? शायद यही इस फिल्म की सबसे दिलचस्प कास्टिंग कहानी है।

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