हामिद अंसारी के बयान और विवादों का सिलसिला, 2026 में फिर क्यों गरम हुई सियासत?

Hamid Ansari statements and the series of controversies

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का नाम एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। 18 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर के दौरान अंसारी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने संदर्भ का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भारत के सामने खतरा साम्यवाद से ज्यादा हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से बताया गया था। यह संदर्भ उन्होंने एजी नूरानी की 2019 में प्रकाशित किताब The RSS: A Menace to India के हवाले से रखा। इस बयान पर भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई।

2026 का बयान फिर बना सियासी मुद्दा

अंसारी का ताजा बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल किसी मौजूदा राजनीतिक घटना पर टिप्पणी नहीं थी, बल्कि उन्होंने इसे नेहरू के पुराने कथन और नूरानी के विचारों के संदर्भ में रखा। उनके भाषण में नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच अंतर का मुद्दा भी उठा। अंसारी ने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान दिखाई दे रहे हैं, जो नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती देते हैं। उनके अनुसार इसमें नागरिकों की धार्मिक पहचान के आधार पर विभाजन, असहिष्णुता और दूसरे समुदाय के प्रति असुरक्षा जैसी प्रवृत्तियां शामिल हैं। भाजपा नेताओं ने इन टिप्पणियों को राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण से चुनौती दी।

2022 में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर टिप्पणी

हामिद अंसारी इससे पहले जनवरी 2022 में भी सुर्खियों में आए थे। इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के एक वर्चुअल कार्यक्रम में उन्होंने भारत में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के उभरने पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि कुछ नए रुझान नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती दे रहे हैं और नागरिकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर अलग करने, असहिष्णुता तथा असुरक्षा की भावना बढ़ाने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। उस समय भाजपा की ओर से इन टिप्पणियों की आलोचना की गई थी।

2017 में ‘मुसलमानों में असुरक्षा’ वाला बयान

अंसारी के सबसे चर्चित बयानों में 2017 का उनका विदाई इंटरव्यू भी शामिल है। उपराष्ट्रपति पद छोड़ने से ठीक पहले उन्होंने कहा था कि देश के मुसलमानों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है तथा भारत में सदियों से चली आ रही ‘स्वीकार्यता की भावना’ खतरे में है। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने असहिष्णुता से जुड़े मुद्दे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों के सामने उठाए थे। इस बयान के बाद भाजपा नेताओं ने उनकी आलोचना की और इसे राजनीतिक टिप्पणी बताया।

सिर्फ आलोचना नहीं, कुछ मुद्दों पर उनका अलग रुख भी

अंसारी के बयानों को केवल एक दिशा में देखना पूरी तस्वीर नहीं देता। 2017 में उन्होंने मुस्लिम समुदाय को भी विकास, शिक्षा और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप आगे बढ़ने की सलाह दी थी। उन्होंने तीन तलाक को सामाजिक समस्या बताते हुए समुदाय के भीतर सुधार की जरूरत की बात भी कही थी। यानी उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में एक तरफ अल्पसंख्यक सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता को लेकर चिंता दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के भीतर सुधार और आधुनिक शिक्षा की जरूरत पर भी उनका जोर रहा है।

हर बार विवाद का केंद्र क्या रहा?

हामिद अंसारी के बयानों में एक समान धागा दिखाई देता है—राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, बहुलवाद और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा। 2017 में सवाल था—क्या मुसलमान खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं? 2022 में बहस थी—क्या नागरिक राष्ट्रवाद की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रभाव बढ़ रहा है? और 2026 में विवाद इस बात पर केंद्रित है कि भारत के लिए किस तरह की राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति को खतरे के रूप में देखा जाना चाहिए। इन मुद्दों पर अंसारी का नजरिया भाजपा और उसके समर्थक संगठनों की राजनीतिक व्याख्या से अलग रहा है। यही वैचारिक अंतर उनके बयानों को बार-बार राजनीतिक विवाद में ले आता है।

2026 में फिर वही सवाल—बयान या वैचारिक संदेश?

ताजा विवाद को केवल एक बयान तक सीमित रखना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता। अंसारी पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े सवालों पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखते रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा नेता उनके बयानों को कांग्रेस और व्यापक विपक्ष की वैचारिक राजनीति से जोड़कर देखते हैं। इसलिए 2026 का विवाद वास्तव में सिर्फ हामिद अंसारी के एक बयान का विवाद नहीं है। यह भारत में राष्ट्रवाद की परिभाषा, बहुलवाद की अवधारणा और धार्मिक पहचान की राजनीति पर लंबे समय से चल रही वैचारिक बहस का नया अध्याय है। यही वजह है कि एक पूर्व उपराष्ट्रपति का नेहरू के पुराने संदर्भ को दोहराना भी तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया का कारण बन गया है।

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