हूती का बढ़ता हमला, पाकिस्तान की तेहरान दौड़ और ईरान का ट्रंप कार्ड

Escalating Houthi attacks Pakistan russia to Tehran and Iran Trump card

सऊदी पर हूती हमला, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव

पश्चिम एशिया की जंग अब सिर्फ अमेरिका, इजरायल और ईरान तक सीमित नहीं रह गई है। यमन के हूती विद्रोहियों के सऊदी अरब पर लगातार हमलों ने पूरे क्षेत्र में एक नया सुरक्षा संकट खड़ा कर दिया है। 19 सितंबर को रियाद की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने रोकने का दावा किया। राजधानी में हवाई खतरे के अलर्ट जारी किए गए और रियाद एयरपोर्ट के आसपास धुआं और आग दिखाई देने की खबरें भी सामने आईं। हालांकि हूतियों ने जिन खास ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया, उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

इस घटनाक्रम का सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ रहा है। दरअसल, अगस्त में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। अब हूतियों ने पाकिस्तान और तुर्की को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने यमन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में हस्तक्षेप किया तो उसका जवाब दिया जाएगा।

यानी पाकिस्तान के सामने अब एक बेहद जटिल स्थिति है। एक तरफ सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता और दूसरी तरफ ईरान के साथ पड़ोसी संबंध। इसी बीच पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी का 20 सितंबर को तेहरान दौरा तय हुआ है। ईरान ने साफ किया है कि यात्रा का घोषित एजेंडा द्विपक्षीय संबंध और पहले हुए समझौतों पर आगे की कार्रवाई है। तेहरान ने यह भी कहा है कि नकवी के पास अमेरिकी संदेश या प्रस्ताव होने की उसे कोई जानकारी नहीं है।

ईरान ने चला अपना ‘ट्रंप कार्ड’

सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम तेहरान से आया है। ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए अपनी शर्तें सामने रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसेन रेजाई के मुताबिक, कतर के जरिए अमेरिका तक ईरान की शर्तें पहुंचाई गई हैं और अब तेहरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जवाब का इंतजार कर रहा है।

युद्ध खत्म करने से जुड़ी तीन प्रमुख मांगें बताई गई हैं।

पहली शर्त — सभी मोर्चों पर युद्ध बंद हो।
ईरान चाहता है कि सभी सक्रिय मोर्चों पर सैन्य अभियान समाप्त हों।

दूसरी शर्त — नौसैनिक नाकाबंदी हटे।
ईरान के मुताबिक समुद्री व्यापार और उसके बंदरगाहों पर अमेरिकी दबाव खत्म होना चाहिए।

तीसरी शर्त — जमी हुई संपत्तियां मुक्त हों।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के तहत फ्रीज की गई ईरानी सरकारी वित्तीय परिसंपत्तियों को जारी करने की मांग की गई है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान की ओर से बातचीत की इच्छा और सैन्य दबाव दोनों एक साथ दिखाई दे रहे हैं। यानी तेहरान एक तरफ वार्ता का रास्ता खुला रख रहा है, तो दूसरी तरफ अपनी शर्तों के जरिए अमेरिका पर दबाव बनाए रखना चाहता है।

अब असली सवाल ट्रंप के जवाब का

मौजूदा घटनाक्रम में तीन अलग-अलग दबाव एक साथ दिखाई दे रहे  हैं। पहला, सऊदी अरब पर हूती हमले क्षेत्रीय संघर्ष को और फैलाने का खतरा पैदा कर रहे हैं। दूसरा, मक्का समझौते ने पाकिस्तान और तुर्की को सऊदी सुरक्षा संकट से जोड़ दिया है। तीसरा, ईरान ने बातचीत की गेंद सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पाले में डाल दी है। अमेरिका ने भी क्षेत्र में अपने नागरिकों के लिए सुरक्षा चेतावनी जारी की है और पश्चिम एशिया में यात्रा को लेकर सावधानी बरतने को कहा गया है।

इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान ईरान क्यों गया, बल्कि यह है कि क्या पाकिस्तान इस युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभा पाएगा या मक्का रक्षा समझौता उसे संघर्ष में किसी पक्ष के साथ खड़ा होने के लिए मजबूर करेगा। और उससे भी बड़ा सवाल है कि ट्रंप ईरान की शर्तों को बातचीत की शुरुआत मानते हैं या तेहरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव जारी रखते हैं। पश्चिम एशिया में अब एक साथ तीन मोर्चे सक्रिय हैं — ईरान-अमेरिका तनाव, सऊदी-हूती संघर्ष और पाकिस्तान की कूटनीतिक परीक्षा। आने वाले दिनों में इन्हीं तीनों का रुख तय करेगा कि यह युद्ध बातचीत की मेज तक पहुंचता है या एक और नए मोर्चे में बदलता है।

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