नवरात्रि शुरू होते ही गुजरात से लेकर देश के कई शहरों तक गरबा पंडाल सजने लगते हैं। रंग-बिरंगे कपड़े, ढोल की आवाज, घूमते कदम और हजारों लोगों की भीड़—आज गरबा एक बड़े उत्सव का रूप ले चुका है। लेकिन गरबा की कहानी केवल संगीत और नाच तक सीमित नहीं है। इसकी शुरुआत देवी की आराधना और शक्ति की उपासना से जुड़ी मानी जाती है। गुजरात में नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान देवी शक्ति के सम्मान में गरबा करने की परंपरा रही है। 2023 में गुजरात का गरबा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में भी शामिल किया गया।
गरबा आखिर है क्या और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
गरबा मूल रूप से नवरात्रि के दौरान किया जाने वाला भक्ति और सामूहिक नृत्य है। पारंपरिक गरबा में बीच में मिट्टी का छेददार घड़ा रखा जाता था, जिसमें दीपक जलाया जाता था। इसे देवी शक्ति और जीवन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसके चारों ओर लोग गोल घेरा बनाकर तालियों और कदमों की लय के साथ नृत्य करते हैं। गुजरात पर्यटन के अनुसार, ‘गरबा’ शब्द का संबंध ‘गर्भदीप’ से माना जाता है, यानी घड़े के अंदर जलता हुआ दीपक।
पहले गरबा का स्वरूप आज के बड़े स्टेज जैसा नहीं था। गांवों और मोहल्लों में लोग देवी की पूजा के बाद एक जगह इकट्ठा होते थे और रात में सामूहिक रूप से गरबा करते थे। यूनेस्को के अनुसार, गरबा की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी अभ्यास, देखकर सीखने और सामुदायिक भागीदारी से आगे बढ़ी है। समय के साथ इसमें नए गीत, नृत्य की नई शैलियां और अलग-अलग पोशाकें जुड़ती गईं।
गरबा करने का असली और पारंपरिक तरीका क्या है?
पारंपरिक गरबा में सबसे महत्वपूर्ण चीज लय और गोलाकार गति है। बीच में दीपक या देवी की प्रतिमा को केंद्र मानकर लोग उसके चारों ओर घूमते हैं। शुरुआत आमतौर पर धीमी गति से होती है। तालियां बजाते हुए कदम आगे बढ़ते हैं और धीरे-धीरे नृत्य की गति तेज होती जाती है। यूनेस्को के विवरण के अनुसार, पारंपरिक गरबा में नर्तक केंद्र के चारों ओर गोलाकार दिशा में चलते हैं और तालियों के साथ गीत गाते हैं।
यानी गरबा का असली उद्देश्य सिर्फ नाचना नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से देवी शक्ति की आराधना करना था। पुराने समय में इसमें दिखावे से ज्यादा भक्ति, संगीत और सामुदायिक भागीदारी पर जोर रहता था। यही वजह है कि गरबा केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि गुजरात की सामाजिक और धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन गया।
गरबा से डांडिया कैसे अलग हुआ?
गरबा और डांडिया को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन दोनों की शैली अलग है। गरबा में मुख्य रूप से तालियां और शरीर की लयबद्ध गतिविधियां होती हैं, जबकि डांडिया में लकड़ी की छोटी छड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। गुजरात पर्यटन के अनुसार, डांडिया रास में पुरुष और महिलाएं दोनों समूह बनाकर गोलाकार तरीके से नृत्य करते हैं और डांडिया की छड़ियों को ताल के साथ आपस में टकराते हैं।
समय के साथ नवरात्रि के आयोजनों में गरबा और डांडिया एक साथ होने लगे। आज कई जगह पूरे कार्यक्रम को ही ‘गरबा नाइट’ कहा जाता है, जिसमें पारंपरिक गरबा, डांडिया रास, फिल्मी गीत और आधुनिक संगीत सब शामिल होते हैं।
भक्ति से बड़े कमर्शियल आयोजन तक कैसे पहुंचा गरबा?
समय के साथ गरबा का स्वरूप तेजी से बदला। पहले यह घर, मंदिर, गांव या मोहल्ले में होने वाला सामुदायिक आयोजन था। अब बड़े शहरों में हजारों लोगों की क्षमता वाले मैदानों और स्टेडियमों में गरबा आयोजित होता है। बड़े मंच, डीजे, लाइव ऑर्केस्ट्रा, लाइटिंग, सेलिब्रिटी कलाकार, टिकट और प्रायोजक इसके नए रूप का हिस्सा बन चुके हैं।
यूनेस्को भी मानता है कि गरबा लगातार बदलने वाली जीवंत परंपरा है। नई पीढ़ियां इसमें नए संगीत, नृत्य शैली और पहनावे जोड़ रही हैं, जबकि देवी शक्ति के चारों ओर घूमने वाली मूल परंपरा बनी हुई है।
अब गरबा में धर्म और राजनीति की चर्चा क्यों होती है?
गरबा अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़ा सामाजिक और सार्वजनिक मंच भी बन चुका है। बड़े आयोजनों में हजारों लोग पहुंचते हैं, इसलिए राजनीतिक दल और नेता भी ऐसे कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। कई जगह नेताओं की तस्वीरें, स्वागत मंच, राजनीतिक संदेश या स्थानीय राजनीति से जुड़े मुद्दे भी गरबा आयोजनों के आसपास दिखाई देते हैं।
इसके साथ ही कुछ आयोजनों में प्रवेश नियम, पहचान जांच, लाउडस्पीकर, गीतों की सामग्री और धार्मिक पहचान जैसे मुद्दे भी चर्चा में आते हैं। यही वजह है कि आज गरबा कभी संस्कृति, कभी धर्म और कभी राजनीति से जुड़ी बहस का हिस्सा बन जाता है।
गरबा आज क्या है—भक्ति, संस्कृति या मनोरंजन?
सच्चाई यह है कि आज गरबा इन तीनों का मिश्रण बन चुका है। कहीं लोग अब भी पारंपरिक तरीके से देवी के सामने गरबा करते हैं, तो कहीं हजारों लोगों के बीच टिकट वाले बड़े आयोजन होते हैं। कहीं ढोल और पारंपरिक गीत हैं, तो कहीं डीजे और बॉलीवुड संगीत।
यही बदलाव गरबा की सबसे बड़ी खासियत भी है। इसकी मूल पहचान देवी शक्ति की आराधना और सामूहिक नृत्य से जुड़ी है, लेकिन समय के साथ इसने खुद को नए समाज और नई पीढ़ी के हिसाब से बदला है। यूनेस्को में शामिल होना भी इसी जीवंत परंपरा की वैश्विक पहचान है।