नकद से सुरक्षा तक… योगी सरकार का ‘लाभार्थी मॉडल’ कितना बदल गया?,,,2027 से पहले यूपी में कल्याणकारी योजनाओं का नया विस्तार

From cash to security how much has the Yogi government beneficiary models changed

नकद से सुरक्षा तक… योगी सरकार का ‘लाभार्थी मॉडल’ कितना बदल गया?

मानदेय बढ़ोतरी से लेकर पेंशन, कैशलेस इलाज, बीमा और नौकरी की सुरक्षा तक… 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ‘लाभार्थी’ की परिभाषा भी बदलती दिखाई दे रही है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार किसी व्यक्ति के खाते में कितनी रकम भेज रही है, बल्कि यह भी है कि उसे बीमारी में इलाज की सुविधा मिलेगी या नहीं, दुर्घटना में परिवार को आर्थिक सहारा मिलेगा या नहीं और नौकरी या मानदेय की सुरक्षा कितनी होगी।

इसी कड़ी में 16 सितंबर को पंचायत सहायकों के लिए सरकार की घोषणा महत्वपूर्ण है। 57 हजार से ज्यादा पंचायत सहायकों का मानदेय 6 हजार से बढ़ाकर 9 हजार रुपये करने का फैसला हुआ है। यानी सीधे 3 हजार रुपये और 50 फीसदी की बढ़ोतरी। इसके साथ डीबीटी से भुगतान, सेवा सुरक्षा, कैशलेस इलाज, महिला पंचायत सहायकों को मातृत्व अवकाश, आंदोलन से जुड़े मुकदमों की वापसी और हटाए गए सहायकों की बहाली जैसे फैसले भी घोषित किए गए। किसी सहायक को हटाने के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति की मंजूरी का प्रावधान भी बताया गया है। यानी एक घोषणा में चार परतें हैं—आय, स्वास्थ्य, नौकरी और सामाजिक सुरक्षा। यही इस पूरे मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

पहला बदलाव… मानदेय से आगे सेवा सुरक्षा

पंचायत सहायक गांव की प्रशासनिक व्यवस्था में ग्राम पंचायत और ग्रामीणों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं। डिजिटल सेवाओं से लेकर प्रमाणपत्र और ऑनलाइन सरकारी कामकाज तक उनकी भूमिका बढ़ी है। ऐसे में केवल 3 हजार रुपये की बढ़ोतरी को देखना इस फैसले की पूरी तस्वीर नहीं बताता। सरकार ने भुगतान को डीबीटी से जोड़ने और स्थानीय स्तर पर मनमाने तरीके से हटाए जाने की आशंका को कम करने की व्यवस्था का भी ऐलान किया है। यानी संदेश यह है कि सरकारी व्यवस्था में काम करने वाले संविदा या मानदेय कर्मी भी केवल ‘कमाने वाला हाथ’ नहीं, बल्कि सुरक्षा पाने वाला लाभार्थी हैं।

दूसरा मॉडल… रसोइया से आंगनबाड़ी तक

यह बदलाव सिर्फ पंचायत सहायकों तक सीमित नहीं दिखता। अगस्त में मिड-डे मील रसोइयों के मानदेय और सामाजिक सुरक्षा को लेकर फैसले किए गए और सितंबर में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं के मानदेय में बढ़ोतरी की घोषणा हुई। उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग ने 8 सितंबर को आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के मानदेय वृद्धि को लेकर आधिकारिक प्रेस रिलीज भी जारी की। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए घोषित बढ़ोतरी में मानदेय को 8 हजार से 12 हजार रुपये किए जाने की बात सामने आई है। साथ ही सहायिकाओं के मानदेय में वृद्धि और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं का भी ऐलान हुआ। इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये कर्मचारी सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने वाली व्यवस्था का हिस्सा हैं। आंगनबाड़ी केंद्र से लेकर स्कूल की रसोई और ग्राम सचिवालय तक, सरकार का लाभार्थी मॉडल अब उन लोगों तक पहुंच रहा है जो खुद सरकारी योजनाओं को लागू करने में भूमिका निभाते हैं।

तीसरा मॉडल… बीमारी का खर्च भी सरकार के सुरक्षा घेरे में

कल्याणकारी राजनीति का अगला बड़ा बदलाव स्वास्थ्य सुरक्षा है। नकद सहायता में लाभार्थी को रकम मिलती है। लेकिन कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा का मतलब है कि बीमारी आने पर परिवार की जेब से होने वाला बड़ा खर्च कम किया जा सकता है। यही वजह है कि पंचायत सहायकों, रसोइयों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और दूसरे कर्मचारी वर्गों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा की घोषणाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इस मॉडल में लाभ का मूल्य केवल हर महीने मिलने वाली रकम से नहीं मापा जाता। उदाहरण के लिए, किसी परिवार में गंभीर बीमारी आती है तो नियमित मानदेय की तुलना में इलाज का बड़ा खर्च कहीं अधिक आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है। ऐसे में बीमा और कैशलेस इलाज सामाजिक सुरक्षा की दूसरी दीवार बन जाते हैं।

चौथा मॉडल… पेंशन का मतलब नियमित सुरक्षा

योगी सरकार की कल्याणकारी नीति का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक पेंशन भी है। वृद्धावस्था, निराश्रित महिला और दिव्यांगजन पेंशन को बढ़ाकर 1,500 रुपये प्रतिमाह करने की दिशा में बजट में घोषणा की गई थी। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इन तीन श्रेणियों में करीब 1.18 करोड़ लाभार्थी बताए गए हैं। यहां भी अंतर समझना जरूरी है। एकमुश्त सहायता और मासिक पेंशन की प्रकृति अलग है। पेंशन लाभार्थी को यह भरोसा देती है कि सहायता केवल एक बार नहीं, बल्कि नियमित अंतराल पर मिलती रहेगी।

यानी लाभार्थी मॉडल अब ‘एक बार की मदद’ से ‘लगातार मिलने वाली सुरक्षा’ की ओर बढ़ता दिखाई देता है।

पांचवां मॉडल… आउटसोर्स कर्मचारी भी लाभार्थी

सबसे बड़ा बदलाव शायद आउटसोर्स कर्मचारियों के मामले में दिखाई देता है। सितंबर में उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम यानी UPCOS शुरू किया गया। इसके तहत करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारियों को अधिक व्यवस्थित सामाजिक सुरक्षा ढांचे में लाने की बात कही गई है। सरकार की घोषित व्यवस्था में समय पर पारिश्रमिक, ईपीएफ-ईएसआई, सीधे भुगतान और दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाओं पर जोर है। दुर्घटना की स्थिति में अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार 20 से 40 लाख रुपये तक बीमा कवर की बात सामने आई है। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी तंत्र में काम तो करते हैं, लेकिन नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं होते। एजेंसी बदलने, भुगतान में देरी और सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल लंबे समय से इस वर्ग से जुड़े रहे हैं। UPCOS के जरिए सरकार इन्हीं कमजोरियों को संस्थागत व्यवस्था से जोड़ने का दावा कर रही है। इस तरह सरकारी कर्मचारी और पारंपरिक गरीब लाभार्थी के बीच जो खाली जगह थी, उसमें अब आउटसोर्स और मानदेय कर्मियों का नया वर्ग दिखाई दे रहा है।

और यहीं से 2027 की राजनीति का नया सवाल शुरू होता है

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में कल्याणकारी राजनीति का मुकाबला केवल नकद सहायता की राशि पर नहीं रह गया है। विपक्ष की तरफ से भी सीधे आर्थिक लाभ की घोषणाएं सामने आ रही हैं। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सत्ता में आने पर समाजवादी पेंशन योजना फिर शुरू करने और महिलाओं को सालाना 40 हजार रुपये देने की घोषणा की है। यानी एक तरफ नकद और पेंशन आधारित गारंटी है, तो दूसरी तरफ सरकार के मौजूदा फैसलों में मानदेय + स्वास्थ्य + बीमा + सेवा सुरक्षा का मिश्रण दिखाई देता है। लेकिन इसका चुनावी असर अपने आप तय नहीं माना जा सकता। किसी योजना की घोषणा और उसके राजनीतिक प्रभाव के बीच कई कड़ियां होती हैं—लाभ वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचा, भुगतान कितना नियमित रहा, स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसानी से मिली, नौकरी की सुरक्षा कितनी प्रभावी हुई और लोगों के सामने रोजगार, महंगाई, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और स्थानीय समस्याओं जैसे दूसरे मुद्दे कितने महत्वपूर्ण रहे।

लाभार्थी से ‘सुरक्षा लाभार्थी’ तक

उत्तर प्रदेश में उभरते इस मॉडल को एक लाइन में समझें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है— पहले सवाल था—खाते में कितना पैसा आया? 

अब सवाल बन रहा है— हर महीने कितनी आय मिलेगी?
बीमारी में इलाज कौन कराएगा?
दुर्घटना में परिवार को क्या मिलेगा?
नौकरी कितनी सुरक्षित होगी?
और सरकार से मिलने वाला लाभ कितना नियमित रहेगा?

पंचायत सहायक से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिड-डे मील रसोइया, सामाजिक पेंशन लाभार्थी और आउटसोर्स कर्मचारी तक, अलग-अलग वर्गों को जोड़कर सरकार एक ऐसा सुरक्षा घेरा बनाने की कोशिश कर रही है जिसमें नकद सहायता के साथ सामाजिक सुरक्षा भी शामिल हो।  यही इस नए ‘लाभार्थी मॉडल’ की सबसे बड़ी विशेषता है। हालांकि 2027 के चुनाव में इसका कितना राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा, यह अभी निष्कर्ष का विषय नहीं है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की कल्याणकारी राजनीति में मुकाबला अब केवल ‘किसने कितना दिया’ का नहीं, बल्कि ‘किसने कितनी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दी’ का भी बनता जा रहा है।

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