विदिशा। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में विवाह सहायता योजना से जुड़े कथित 30.18 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े ने अब बड़ा मोड़ ले लिया है। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने सिरोंज जनपद पंचायत के तत्कालीन CEO शोभित त्रिपाठी को गिरफ्तार किया है। ED की कार्रवाई 2 सितंबर को हुई, जिसके बाद 3 सितंबर को उन्हें भोपाल की PMLA अदालत में पेश किया गया। अदालत ने पूछताछ के लिए 9 सितंबर तक ED रिमांड मंजूर की है।
जांच एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2019 से नवंबर 2021 के बीच विवाह सहायता योजना के तहत बड़ी संख्या में मामलों में राशि स्वीकृत और वितरित की गई। आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में फर्जी आवेदन और दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
फर्जी दस्तावेज…बैंक खाते और फिर रकम की निकासी?
जांच में आरोप है कि अपात्र लोगों के नाम पर बैंक खाते खुलवाए गए और सरकारी सहायता की रकम इन खातों में ट्रांसफर की गई। इसके बाद रकम की नकद निकासी किए जाने की बात भी जांच में सामने आई है।
ED अब यह पता लगाने में जुटी है कि कथित फर्जीवाड़े की पूरी प्रक्रिया कैसे संचालित हुई, इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे और सरकारी धन का अंतिम लाभार्थी कौन रहा।
कोरोना काल में भी भुगतान का आरोप
मामले में एक अहम बिंदु कोविड लॉकडाउन का दौर भी है। जांच के दौरान ऐसे भुगतान सामने आने की बात कही गई है, जिनकी तारीख कोरोना काल से जुड़ी बताई जा रही है। ऐसे में जांच एजेंसी के सामने सवाल है कि लॉकडाउन और प्रशासनिक प्रतिबंधों के बीच इन मामलों का सत्यापन और भुगतान किस प्रक्रिया के तहत हुआ।
51 हजार की सहायता योजना बनी घोटाले का केंद्र
यह योजना निर्माण श्रमिकों की बेटियों के विवाह के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने से जुड़ी थी। पात्र हितग्राहियों को 51 हजार रुपये की सहायता दिए जाने का प्रावधान था। आरोप है कि इसी सहायता राशि को फर्जी दस्तावेजों और अपात्र लाभार्थियों के जरिए सरकारी खजाने से निकालने का खेल किया गया।
अब ED की रिमांड में खुलेंगे कई राज?
शोभित त्रिपाठी की गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा और बढ़ सकता है। ED कथित फर्जी खातों, लाभार्थियों, दस्तावेजों, बैंक लेनदेन और रकम की निकासी की पूरी कड़ी खंगाल रही है। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि कथित घोटाले में सिर्फ एक अधिकारी की भूमिका थी या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था। फिलहाल मामले में जांच जारी है और अदालत में आरोपों की कानूनी जांच होनी बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या 30.18 करोड़ के कथित फर्जीवाड़े के पीछे सिर्फ सरकारी सिस्टम की लापरवाही थी, या फिर फर्जी लाभार्थियों से लेकर बैंक खातों और नकद निकासी तक पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से चल रहा था?