भोपाल की पहचान उसके तालाबों से है, लेकिन आज यही तालाब शहर के लिए एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी सवाल बनते जा रहे हैं। एक तरफ तालाबों और जलाशयों को अतिक्रमण से बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ उन इलाकों में वर्षों से रह रहे या कारोबार कर रहे लोगों के सामने अपने घर-दुकान बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
मामला सिर्फ अतिक्रमण हटाने का नहीं है। असली सवाल है—तालाब, नदी और जलाशय की वास्तविक सीमा आखिर तय कैसे होगी?
NGT की नजर में भोपाल के तालाब
भोपाल के बड़े तालाब की सीमा और उसके FTL यानी Full Tank Level को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। वहीं कलियासोत नदी से जुड़े मामले में भी पर्यावरणीय और सीमांकन से जुड़े मुद्दे सामने आते रहे हैं। प्रशासनिक कार्रवाई के लिए सबसे जरूरी है कि जलस्रोत की सीमा वैज्ञानिक और प्रमाणित तरीके से तय हो। लेकिन जब पुराने रिकॉर्ड, राजस्व नक्शे और आधुनिक डिजिटल मैपिंग के आंकड़े आपस में अलग तस्वीर दिखाएं, तो विवाद और जटिल हो जाता है।
पटवारी की जंजीर से डिजिटल मैपिंग तक
पहले जमीन की सीमा तय करने में पारंपरिक राजस्व माप और पटवारी के रिकॉर्ड की बड़ी भूमिका होती थी। अब डिजिटल सर्वे, GIS और आधुनिक मैपिंग तकनीक ने सीमांकन को ज्यादा सटीक बनाने की क्षमता दी है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर किसी व्यक्ति ने वर्षों पहले तत्कालीन राजस्व रिकॉर्ड और सीमांकन के आधार पर जमीन खरीदी या निर्माण किया, तो नई डिजिटल मैपिंग में सीमा बदलने पर उसकी जिम्मेदारी कैसे तय होगी? यानी अतिक्रमणकारी और वैध कब्जाधारी के बीच अंतर करना बेहद जरूरी है।
असली अतिक्रमणकारी कौन और वैध रहवासी कौन?
तालाबों और नदियों की जमीन पर अतिक्रमण रोकना जरूरी है। लेकिन कार्रवाई से पहले यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित जमीन का रिकॉर्ड क्या कहता है, सीमांकन कब हुआ था, किस विभाग ने अनुमति दी थी और निर्माण या व्यवसाय की वैधता किस आधार पर तय हुई थी। अगर किसी को सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर जमीन या निर्माण की अनुमति मिली और वर्षों बाद सीमा बदलकर उसे अवैध बताया जाता है, तो उसके मामले की अलग जांच जरूरी होगी।
विभागों की जिम्मेदारी भी तय हो
नगर निगम, राजस्व विभाग और दूसरे संबंधित विभागों के पास जमीन और निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड होते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ नागरिकों से नहीं, बल्कि सिस्टम से भी होना चाहिए। अगर कोई अतिक्रमण वर्षों तक मौजूद रहा तो उसकी निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी थी? और अगर किसी व्यक्ति ने वैध दस्तावेजों के आधार पर निवेश किया, तो उसके हितों की रक्षा का रास्ता क्या होगा?
बड़ा तालाब और भदभदा का पेचीदा सवाल
भोपाल के बड़े तालाब का जलस्तर बढ़ने पर भदभदा के गेट खोलने पड़ते हैं, लेकिन गेट खोलने और न खोलने—दोनों परिस्थितियों में अलग-अलग सवाल खड़े होते हैं। यहीं से एक बड़ा मुद्दा सामने आता है—क्या भोपाल ने अपने जलाशयों की सीमा, जलस्तर और आसपास के निर्माण को लेकर लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थाओं की पर्याप्त वैज्ञानिक समीक्षा की है?
सबसे बड़ा सवाल
तालाब बचाना जरूरी है, अतिक्रमण हटाना भी जरूरी है और पर्यावरणीय नियमों का पालन भी होना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि गलत निर्माण करने वाले और सरकारी रिकॉर्ड पर भरोसा करके रहने वाले नागरिक को एक ही तराजू में न तौला जाए। भोपाल में अब जरूरत सिर्फ बुलडोजर या नोटिस की नहीं, बल्कि स्पष्ट सीमांकन, पारदर्शी रिकॉर्ड, वैज्ञानिक सर्वे और जवाबदेही तय करने की है।
आखिर सवाल यही है—अगर सीमा बदलने का आधार डिजिटल मैपिंग है, तो पुराने राजस्व रिकॉर्ड पर भरोसा करके वर्षों से बसे लोगों की जिम्मेदारी कितनी और उस व्यवस्था की जिम्मेदारी कितनी, जिसने उन्हें वहां रहने या कारोबार करने दिया?