क्या हैं महाकाल की नगरी उज्जैन में मिले 90 साल पुराने 42 कंकाल. जानें क्या है पूरा सच…क्या यहां हुआ था सामूहिक नरसंहार

story behind the 42 skeletons dating back 90 years found in Ujjain city of Mahakal

महाकाल की नगरी उज्जैन की धरती सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए ही नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे पुरातात्विक रहस्यों के लिए भी जानी जाती है। करीब नौ दशक पहले यहां कुमार टेकरी, जिसे कुम्हारों का टीला भी कहा जाता है, से मिले 42 मानव कंकाल आज भी इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए बड़ी पहेली बने हुए हैं।

साल 1938-39 में ब्रिटिश काल के दौरान ग्वालियर स्टेट के पुरातत्व विभाग की ट्रायल खुदाई में इन कंकालों का पता चला था। सबसे चौंकाने वाली बात सिर्फ इनकी संख्या नहीं थी, बल्कि दफनाने का तरीका था। कुछ कंकाल पेट के बल मिले, कुछ पीठ के बल, जबकि कुछ बैठे हुए या मुड़े हुए पैरों की अवस्था में पाए गए। इनमें पुरुष, महिलाएं, वयस्क और बच्चे शामिल बताए गए हैं।

कंकालों के साथ मिलीं कई अहम चीजें

खुदाई के दौरान मानव अवशेषों के साथ शेल यानी सीप से बने आभूषण, बर्तन, प्याले-तश्तरियां और राख तथा हड्डियों से जुड़े कलश मिलने की जानकारी सामने आई थी। यही चीजें इस खोज को और रहस्यमय बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये सभी लोग एक ही समुदाय या संस्कृति से जुड़े थे? क्या अलग-अलग दफन मुद्राएं किसी विशेष अंतिम संस्कार परंपरा का संकेत थीं? या फिर अलग-अलग कालखंडों में यहां दफनाने की परंपरा रही?

इन सवालों का निश्चित जवाब अभी सामने नहीं आया है।

अब आधुनिक तकनीक से खुलेगा राज?

बेहतर स्थिति में मिले कुछ मानव अवशेषों को उस दौर में मानवशास्त्रीय परीक्षण के लिए भेजा गया था और वे वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में बताए जाते हैं। विशेषज्ञों ने इन अवशेषों की दोबारा वैज्ञानिक जांच की जरूरत जताई है। AMS रेडियोकार्बन डेटिंग, डीएनए विश्लेषण और आइसोटोप स्टडी जैसी तकनीकों से इनकी उम्र, खान-पान, संभावित भौगोलिक उत्पत्ति और आपसी संबंधों के बारे में नई जानकारी हासिल की जा सकती है।

वैश्य टेकरी से जुड़ेगा इतिहास का नया अध्याय

अब करीब दो किलोमीटर दूर स्थित वैश्य टेकरी इस पूरे रहस्य में नया अध्याय जोड़ सकती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां नई खुदाई की अनुमति के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने की जानकारी सामने आई है। वैश्य टेकरी पर एक विशाल प्राचीन स्तूप के अवशेष बताए जाते हैं, जिसका आकार सांची के प्रसिद्ध स्तूप से भी काफी बड़ा माना जाता है।

पुरातत्व विभाग की प्रस्तावित खुदाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इससे इस पूरे इलाके के प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों को समझने में मदद मिल सकती है।

क्या 42 कंकालों की कहानी का मिलेगा जवाब?

करीब 90 साल से ये कंकाल इतिहास के पन्नों में सवाल बनकर मौजूद हैं। आखिर ये लोग कौन थे? किस काल में रहते थे? यहां उनकी मृत्यु कैसे हुई? उन्हें अलग-अलग मुद्राओं में क्यों दफनाया गया? और उनके साथ मिले आभूषण और बर्तन किस संस्कृति की ओर इशारा करते हैं? इन सवालों का जवाब सिर्फ एक पुरानी खुदाई में नहीं, बल्कि कुमार टेकरी और वैश्य टेकरी के व्यापक पुरातात्विक अध्ययन में छिपा हो सकता है। अगर नई खुदाई और वैज्ञानिक परीक्षणों से दोनों स्थलों के बीच कोई स्पष्ट सांस्कृतिक या कालक्रम संबंध स्थापित होता है, तो उज्जैन के प्राचीन इतिहास की कई धारणाओं को नया आधार मिल सकता है। 90 साल पुराना रहस्य अभी खत्म नहीं हुआ है…बल्कि नई खुदाई के साथ अब उसके खुलने की उम्मीद जरूर बढ़ गई है।

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