राष्ट्रपति ने पिछले दिनों डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नया उपराज्यपाल नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति उस तारीख से प्रभावी होगी, जिस दिन वे पदभार ग्रहण करेंगे। पहली नजर में यह एक सामान्य संवैधानिक नियुक्ति दिखाई दे सकती है, लेकिन अंडमान-निकोबार की भौगोलिक स्थिति और पिछले कुछ वर्षों में यहां बढ़ते सामरिक तथा आर्थिक निवेश को देखते हुए यह जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल क्यों बनाया गया, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि भारत के लिए अंडमान-निकोबार आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत का समुद्री प्रहरी है अंडमान-निकोबार
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और हिंद महासागर के बीच भारत की सामरिक मौजूदगी को मजबूत करता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी भौगोलिक स्थिति है। ये द्वीप दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के बेहद करीब हैं। खास तौर पर मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक होने के कारण भारत को हिंद महासागर से दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जाने वाले समुद्री यातायात पर नजर रखने की रणनीतिक क्षमता मिलती है।
भारतीय नौसेना के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंडमान-निकोबार भारत को अपने पूर्वी समुद्री क्षेत्र में दूर तक निगरानी और संचालन की क्षमता देता है। 2012 में कमीशन किया गया INS Baaz ग्रेट निकोबार में स्थित है और आधिकारिक तौर पर इसे मलक्का जलडमरूमध्य तथा सिक्स डिग्री चैनल की निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया था।
चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच क्यों महत्वपूर्ण?
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों ने अंडमान-निकोबार की अहमियत और बढ़ा दी है। भारत के लिए चुनौती यह है कि हिंद महासागर केवल व्यापार का रास्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक आवाजाही का भी प्रमुख क्षेत्र है। ऐसे में भारत की पूर्वी समुद्री सीमा पर मजबूत निगरानी व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। इसी वजह से अंडमान-निकोबार में केवल सैन्य मौजूदगी बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि सड़क, एयरपोर्ट, बंदरगाह, संचार और नागरिक बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया जा रहा है। भारत की अंडमान निकोबार कमांड यानी ANC देश की एकमात्र ऑपरेशनल ज्वाइंट सर्विसेज कमांड है। इसमें तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त संचालन की व्यवस्था है और इसे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्यों बना गेमचेंजर?
अंडमान-निकोबार के महत्व को समझने के लिए ग्रेट निकोबार परियोजना सबसे बड़ा उदाहरण है। केंद्र सरकार के अनुसार ग्रेट निकोबार परियोजना का उद्देश्य इस क्षेत्र को रणनीतिक समुद्री और आर्थिक हब के रूप में विकसित करना है। परियोजना में 14.2 मिलियन TEU क्षमता वाला इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, नया अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, 450 MVA गैस-सोलर पावर प्लांट और नई टाउनशिप शामिल है।
यानी भारत अब अंडमान-निकोबार को केवल दूरस्थ द्वीप समूह के रूप में नहीं देख रहा। इसे डिफेंस, ट्रेड, लॉजिस्टिक्स और समुद्री कनेक्टिविटी के एकीकृत केंद्र के तौर पर विकसित करने की कोशिश हो रही है।
ग्रेट निकोबार ईस्ट-वेस्ट शिपिंग रूट के करीब है। सरकार का कहना है कि परियोजना भारत की समुद्री मौजूदगी मजबूत करने, वैश्विक व्यापार नेटवर्क से जुड़ने और विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।
सिर्फ सुरक्षा नहीं, ब्लू इकोनॉमी भी बड़ा मुद्दा
अंडमान-निकोबार की ताकत केवल रक्षा तक सीमित नहीं है। द्वीप समूह भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र और समुद्री संसाधनों के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप मिलकर भारत के EEZ का लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। समुद्री मत्स्य संसाधनों और विशेष रूप से ट्यूना जैसी उच्च-मूल्य वाली मछलियों की संभावनाओं को देखते हुए यहां ब्लू इकोनॉमी के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में अंडमान-निकोबार में सुरक्षा + व्यापार + पर्यटन + मत्स्य पालन + लॉजिस्टिक्स का मॉडल देखने को मिल सकता है।
अब सवाल—डॉ. दिनेश शर्मा को ही क्यों मिली जिम्मेदारी?
यहीं से राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषण शुरू होता है। डॉ. दिनेश शर्मा उत्तर प्रदेश की राजनीति का अनुभवी चेहरा रहे हैं। वह योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले कार्यकाल में उपमुख्यमंत्री रहे और बाद में राज्यसभा सदस्य बने। इससे पहले वह लखनऊ के दो बार मेयर भी रह चुके हैं। उनकी पृष्ठभूमि केवल सक्रिय राजनीति तक सीमित नहीं है। वे लखनऊ विश्वविद्यालय में वाणिज्य के प्रोफेसर रहे हैं और संगठनात्मक राजनीति का भी लंबा अनुभव रखते हैं। ऐसे में उपराज्यपाल के रूप में उनकी नियुक्ति को केवल राजनीतिक पुनर्वास के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। अंडमान-निकोबार में आने वाले वर्षों में विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती रहने वाली है। एक तरफ रणनीतिक बुनियादी ढांचे का विस्तार है, दूसरी तरफ द्वीपों का बेहद संवेदनशील पर्यावरण और आदिवासी समुदायों के अधिकार हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना के आधिकारिक दस्तावेज भी विकास के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की चिंता को महत्वपूर्ण बताते हैं।
डॉ.दिनेश शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती
नई जिम्मेदारी में डॉ. दिनेश शर्मा के सामने तीन बड़ी प्राथमिकताएं हो सकती हैं—
पहली—सुरक्षा:
द्वीपों में सामरिक और समुद्री सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना।
दूसरी—विकास:
सड़क, एयरपोर्ट, बंदरगाह, पर्यटन और डिजिटल कनेक्टिविटी को गति देना।
तीसरी—पर्यावरण और स्थानीय समुदाय:
तेजी से होने वाले विकास और द्वीपों की पारिस्थितिकी के बीच संतुलन कायम रखना।
एक नियुक्ति, कई संकेत
डॉ. दिनेश शर्मा की नियुक्ति को ऐसे समय में देखना होगा जब केंद्र सरकार अंडमान-निकोबार को रणनीतिक समुद्री हब के रूप में विकसित करने पर जोर दे रही है। इसलिए यह नियुक्ति सिर्फ एक राजनीतिक चेहरे को नई संवैधानिक जिम्मेदारी देने की कहानी नहीं है। इसके पीछे उस पूरे रणनीतिक बदलाव को भी देखना होगा, जिसमें भारत अपने द्वीप क्षेत्रों को राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति के केंद्र में ला रहा है। एक तरफ मलक्का के करीब भारत की निगरानी क्षमता, दूसरी तरफ चीन की बढ़ती समुद्री मौजूदगी और तीसरी तरफ ग्रेट निकोबार जैसी विशाल परियोजनाएं—इन सबके बीच अंडमान-निकोबार आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री रणनीति का बेहद महत्वपूर्ण मोर्चा बनने जा रहा है। और इसी बदलते रणनीतिक परिदृश्य में डॉ. दिनेश शर्मा की नई भूमिका का महत्व सामान्य प्रशासनिक नियुक्ति से कहीं बड़ा दिखाई देता है।