निर्जला एकादशी पर बनेगा महादुर्लभ संयोग…4 शुभ योगों के महासंगम से बरसेगी विष्णु कृपा..जानें कब है निर्जला एकादशी

Nirjala Ekadashi 2026

गुरुवार, एकादशी और तीन दिव्य योगों का अद्भुत मेल

सनातन परंपरा में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की आराधना का सर्वोत्तम माध्यम माना गया है। सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की उपासना करते हैं। वर्ष 2026 की निर्जला एकादशी इस बार और भी विशेष मानी जा रही है। 25 जून को पड़ने वाली इस एकादशी पर चार शुभ संयोग एक साथ बन रहे हैं, जिससे इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाएगा।

एक साथ बनेंगे चार शुभ योग

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार निर्जला एकादशी के दिन शिव योग, रवि योग और सिद्ध योग का निर्माण होगा। इसके साथ ही यह व्रत गुरुवार के दिन पड़ रहा है, जो स्वयं भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित माना जाता है। धर्मशास्त्रों में गुरुवार और एकादशी का संयोग अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।

रवि योग प्रातः 5:25 बजे से शाम 4:29 बजे तक रहेगा। यह योग नकारात्मक प्रभावों को दूर कर सफलता और शुभ परिणाम प्रदान करने वाला माना जाता है। वहीं शिव योग सुबह 10:22 बजे से प्रारंभ होगा, जो सौभाग्य, समृद्धि और मंगल कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इसके बाद सिद्ध योग सुबह 10:53 बजे से प्रभावी रहेगा, जो पूजा-पाठ, दान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

कब रखा जाएगा निर्जला एकादशी व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026 को शाम 6:12 बजे होगा और इसका समापन 25 जून को रात 8:09 बजे होगा। चूंकि 25 जून को उदया तिथि में एकादशी रहेगी, इसलिए शास्त्रों के अनुसार इसी दिन व्रत रखना श्रेष्ठ और मान्य होगा।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

क्यों विशेष है निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाता, वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखकर सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस दिन व्रती अन्न और जल दोनों का त्याग कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं।

यह व्रत केवल धार्मिक साधना ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम और धैर्य का भी प्रतीक माना जाता है। कठिन परिस्थितियों में स्वयं को संयमित रखने और मानसिक दृढ़ता विकसित करने का संदेश भी यह पर्व देता है।

जल संरक्षण का भी देता है संदेश

निर्जला एकादशी का सामाजिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह पर्व जल के महत्व को समझने और उसके संरक्षण का संदेश देता है। बढ़ते जल संकट के दौर में यह पर्व हमें जल की प्रत्येक बूंद का महत्व समझाता है।

इसी भावना के तहत उत्तर भारत में निर्जला एकादशी के अवसर पर मीठे और शीतल जल की छबील लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। राहगीरों को पानी पिलाना और जरूरतमंदों की सेवा करना इस दिन विशेष पुण्यकारी माना जाता है।

श्रद्धा, सेवा और संयम का महापर्व

चार शुभ योगों के दुर्लभ संयोग के साथ आने वाली निर्जला एकादशी 2026 श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक अवसर लेकर आ रही है। भगवान विष्णु की आराधना, दान-पुण्य, सेवा और आत्मसंयम के माध्यम से यह पर्व जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल प्राप्त करने का संदेश देता है।

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