देश में पारंपरिक खेती के साथ अब किसान नई और नकदी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इन्हीं में से एक है कोको की खेती, जिसे चॉकलेट फार्मिंग भी कहा जाता है। बाजार में चॉकलेट और कोको उत्पादों की बढ़ती मांग ने किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने का नया रास्ता खोल दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही तकनीक और देखभाल के साथ कोको फार्मिंग किसानों को लंबे समय तक स्थायी आमदनी दे सकती है।
- कोको फार्मिंग से बढ़ेगी किसानों की आय
- चॉकलेट की बढ़ती मांग से फायदा
- कम लागत में शुरू करें नई खेती
- नारियल बागानों में भी उगा सकते हैं कोको
- दशकों तक देगा नियमित मुनाफा
- चॉकलेट कंपनियां खरीदती हैं महंगे बीन्स
- किसानों के लिए उभरता नया बिजनेस मॉडल
कोको के बीन्स से चॉकलेट, कोको पाउडर और कई खाद्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यही कारण है कि देश और विदेश की बड़ी कंपनियां कोको बीन्स की लगातार खरीद करती हैं। बढ़ती मांग के चलते इसकी खेती अब किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
गर्म और नमी वाला मौसम सबसे बेहतर
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कोको की खेती के लिए गर्म और नमी वाला वातावरण सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती मुख्य रूप से दक्षिण भारत के कई राज्यों में की जा रही है, लेकिन अब दूसरे राज्यों के किसान भी इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।
कोको के पौधों को तेज धूप से बचाने की जरूरत होती है। इसलिए किसान इसे नारियल, सुपारी या अन्य बड़े पेड़ों के बीच सह-फसल के रूप में आसानी से उगा सकते हैं। इससे पौधों को पर्याप्त छाया मिलती है और एक ही खेत से दोहरी कमाई संभव हो जाती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कोको की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी सबसे बेहतर रहती है। खेत में पानी जमा होने से पौधों को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए उचित ड्रेनेज व्यवस्था जरूरी मानी जाती है।
कम लागत में शुरू हो सकता है कारोबार
कोको फार्मिंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी शुरुआत कम लागत में की जा सकती है। किसान नर्सरी से अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे खरीदकर इसकी खेती शुरू कर सकते हैं। शुरुआती वर्षों में पौधों की नियमित सिंचाई और देखभाल जरूरी होती है।
कृषि जानकारों के अनुसार पौधे लगाने के लगभग तीन से चार साल बाद इसमें फल आने शुरू हो जाते हैं। इन फलों को कोको पॉड्स कहा जाता है। जब पॉड्स पीले या नारंगी रंग के हो जाते हैं, तब उनकी तुड़ाई की जाती है।
चॉकलेट कंपनियां खरीदती हैं बीन्स
कोको पॉड्स के अंदर मौजूद बीन्स ही असली कमाई का जरिया होते हैं। इन बीन्स को निकालकर धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें चॉकलेट और खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को बेचा जाता है।
बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले कोको बीन्स की कीमत काफी अधिक होती है। यही वजह है कि किसान इससे मोटा मुनाफा कमा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान सही तरीके से खेती करें और गुणवत्ता पर ध्यान दें तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी बेहतर दाम मिल सकते हैं।
दशकों तक होगी कमाई
कोको के पेड़ों की उम्र लगभग 30 से 40 साल तक होती है। यानी एक बार पौधे लगाने के बाद किसान कई वर्षों तक लगातार उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि इसे लंबी अवधि की लाभदायक खेती माना जाता है।
कम लागत, कम जोखिम और लंबे समय तक नियमित आमदनी मिलने की वजह से अब बड़ी संख्या में किसान कोको फार्मिंग की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में भी कोको उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है।
किसानों के लिए बन सकता है नया अवसर
बढ़ती चॉकलेट इंडस्ट्री और प्रोसेस्ड फूड सेक्टर को देखते हुए कोको की खेती किसानों के लिए रोजगार और आय बढ़ाने का बड़ा जरिया बन सकती है। सरकार और कृषि विभाग भी किसानों को नई नकदी फसलों के प्रति जागरूक करने पर जोर दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ कोको जैसी फसलों को अपनाएं तो उनकी आमदनी में बड़ा बदलाव आ सकता है। खासकर छोटे और मध्यम किसान सह-फसल मॉडल अपनाकर बेहतर लाभ हासिल कर सकते हैं।