बीजिंग। वैश्विक व्यापार और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को लेकर चीन और पश्चिमी देशों के बीच जारी बहस अब और तेज हो गई है। हाल के वर्षों में अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं ने चीन पर “अतिरिक्त उत्पादन क्षमता” (Overcapacity) और “चीन शॉक 2.0” जैसे आरोप लगाए हैं। इन आरोपों का उपयोग कई देशों ने व्यापारिक प्रतिबंधों और संरक्षणवादी नीतियों के समर्थन में भी किया है। अब चीन ने इन दावों का विस्तृत जवाब देते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि चीन के खिलाफ लगाए जा रहे आरोप तथ्यात्मक आधार पर सही नहीं हैं और इन्हें भू-राजनीतिक उद्देश्यों से जोड़ा जा रहा है।
चीन ने ‘अति रिक्त उत्पादन क्षमता’ के आरोपों को बताया निराधार, आंकड़ों के साथ रखा पक्ष
पश्चिमी देशों के दावों पर चीन का जवाब
WTO नियमों के अनुरूप बताई सब्सिडी नीति
तकनीक और नवाचार को बताया प्रतिस्पर्धा की असली ताकत
व्यापार अधिशेष को लेकर भी दी सफाई
‘चीन अवसर 2.0’ को वैश्विक विकास का नया मॉडल बताया
चीन ने “तथाकथित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के मुद्दे पर चीन का रुख” शीर्षक से जारी अपने दस्तावेज में कहा है कि दुनिया में ऐसा कोई सार्वभौमिक मानक नहीं है, जिससे किसी देश की औद्योगिक उत्पादन क्षमता को “अतिरिक्त” घोषित किया जा सके। चीन का तर्क है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उद्योगों की 75 से 80 प्रतिशत क्षमता उपयोग दर को सामान्य माना जाता है। चीन के अनुसार वर्ष 2025 में उसके बड़े औद्योगिक उद्यमों की क्षमता उपयोग दर 74.4 प्रतिशत रही, जो सामान्य स्तर के काफी करीब है। इसलिए केवल उत्पादन क्षमता के आधार पर चीन पर “ओवरकैपेसिटी” का आरोप लगाना उचित नहीं है।
चीन ने पश्चिमी देशों के उस आरोप को भी खारिज किया है, जिसमें कहा जाता है कि सरकारी सब्सिडी के कारण चीन के उद्योग वैश्विक बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। चीन का कहना है कि अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देने के लिए कर छूट और वित्तीय प्रोत्साहन देना दुनिया के अनेक देशों की सामान्य औद्योगिक नीति का हिस्सा है। चीन ने दावा किया कि उसकी सब्सिडी नीति विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप है और इसमें घरेलू तथा विदेशी कंपनियों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता।
चीन के अनुसार उसकी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा केवल सरकारी सहायता का परिणाम नहीं है, बल्कि दशकों से किए गए निवेश, तकनीकी अनुसंधान, नवाचार और विनिर्माण क्षमता के लगातार विस्तार का नतीजा है। बयान में यह भी कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन परामर्श कंपनी मैककिन्से ने चीन को “दुनिया का सबसे कठिन कॉर्पोरेट जिम” बताया है, जो वहां की कंपनियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा और लगातार सुधार की संस्कृति को दर्शाता है।
व्यापार अधिशेष को लेकर भी चीन ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। बयान के अनुसार, बड़ा निर्यात या व्यापार अधिशेष अपने आप में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का प्रमाण नहीं होता। चीन ने कहा कि वह जानबूझकर व्यापार अधिशेष बढ़ाने की नीति नहीं अपनाता। चीन के अनुमान के मुताबिक, 2025 तक उसके कुल निर्यात में विदेशी निवेश वाली कंपनियों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत और व्यापार अधिशेष में उनकी हिस्सेदारी 16 प्रतिशत रहेगी। चीन का दावा है कि उसका निर्यात केवल उसकी अर्थव्यवस्था को ही नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और उपभोक्ताओं को भी लाभ पहुंचाता है।
चीन ने यह भी कहा कि उसका चालू खाता अधिशेष सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 3.7 प्रतिशत है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य सीमा के भीतर माना जाता है। चीन ने सवाल उठाया कि यदि बड़े पैमाने पर निर्यात को ही अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का संकेत माना जाए, तो क्या अमेरिका के सेमीकंडक्टर निर्यात या वैश्विक विमान निर्माता कंपनियों के निर्यात को भी उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
बयान में यह भी कहा गया कि कुछ पश्चिमी देश अपनी घरेलू औद्योगिक चुनौतियों और धीमी आर्थिक वृद्धि का कारण चीन को बताने की कोशिश कर रहे हैं। चीन का कहना है कि इससे उनकी आंतरिक आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इसके बजाय वैश्विक सहयोग, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना अधिक प्रभावी विकल्प होगा।
चीन ने अपने तथाकथित “नए तीन स्तंभ”—इलेक्ट्रिक वाहन (EV), लिथियम बैटरी और सौर ऊर्जा उत्पाद—को वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बताया है। उसके अनुसार इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उत्पादन से दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों की लागत कम हुई है और ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति मिली है। चीन का दावा है कि इन उद्योगों ने वैश्विक नवाचार को भी बढ़ावा दिया है।
अपने बयान के अंत में चीन ने कहा कि तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट है कि उसके बारे में बनाई जा रही नकारात्मक धारणाएं लंबे समय तक टिक नहीं सकतीं। चीन ने “चीन अवसर 2.0” की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उसका बाजार, तकनीकी विकास और औद्योगिक नवाचार वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर लेकर आ रहे हैं, जिनका लाभ दुनिया के अनेक देशों को मिल सकता है।
हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि “अतिरिक्त उत्पादन क्षमता” को लेकर चीन और कई पश्चिमी देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। जहां चीन इन आरोपों को खारिज करता है, वहीं कुछ देश अपने व्यापारिक और औद्योगिक आकलन के आधार पर अलग निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में यह विषय अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक नीति के स्तर पर चर्चा का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)





