बीस साल पहले, गर्मियों के मौसम में छिंगहाई-शीत्सांग रेलवे ने अभी-अभी यातायात शुरू
किया था। इस रेलवे के जरिए चीन के शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश पहुंचने वाले पहले खेप के
पत्रकारों में से एक होने के नाते, मैंने आखिरकार उस धरती पर कदम रखा, जिसके बारे में
लंबे समय से सुनती और जानने की इच्छा रखती थी। उस समय शीत्सांग की राजधानी
ल्हासा में बहुत नीला आसमान, तेज हवाएं, तीखी धूप और बंजर पहाड़ नजर आते थे। बीस
साल बाद, जब मैंने एक बार फिर इस धरती पर कदम रखा, तो ल्हासा की ओर जा रही बस
में बैठकर खिड़की से बाहर के हरे-भरे नज़ारे देखते हुए मैं कुछ पल के लिए हैरान रह गई।
मन में सवाल उठा, क्या यह सचमुच वही ल्हासा है?
गोंगगा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से पोटाला पैलेस की ओर जाने वाली बस में बैठते ही ऊंचे-
ऊंचे चिनार, विलो और बबूल के पेड़ों की कतारें नजर आने लगती हैं। ये पेड़ किसी हरी-भरी
विशाल दीवार की तरह दिखाई देते हैं, जो कभी बंजर रही पहाड़ियों और सड़कों को चारों
ओर से घेरे हुए हैं। स्थानीय मित्रों से बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि ल्हासा ने पिछले
कुछ वर्षों में हरियाली बढ़ाने के लिए काफी प्रयास किए हैं। यह काम केवल शहर तक
सीमित नहीं है, बल्कि आसपास की बंजर पहाड़ियों को भी हरा-भरा बनाने पर जोर दिया
गया है।
इसी बदलाव की झलक बरखोर स्ट्रीट में भी साफ दिखाई देती है। यहां कदम रखते ही
आसपास की रौनक और समृद्धि ने मुझे लगभग पहचान से बाहर कर दिया। बीस साल
पहले जोखांग मंदिर के आसपास कई दुकानें जरूर थीं, लेकिन आज जैसी चहल-पहल तब
नहीं थी। आज बरखोर स्ट्रीट की पत्थर से बनी सड़क के दोनों ओर थांगखा चित्रों की
दुकानें, तिब्बती रेस्तरां, हस्तशिल्प की दुकानें और कैफे नजर आते हैं। पर्यटकों की भारी
भीड़ यहां उमड़ती है और अलग-अलग भाषाओं की आवाजें मिलकर पूरे इलाके को बेहद
जीवंत बना देती हैं।
हालांकि, इन तमाम बदलावों में जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह फलों
और सब्जियों में आया बदलाव है। बीस साल पहले ल्हासा में ताजे फल का एक टुकड़ा
खाना भी किसी विलासिता से कम नहीं था। परिवहन की कठिनाइयों के कारण चीन के
दूसरे प्रांतों से लाए गए फलों के एक डिब्बे की कीमत कई गुना ज्यादा होती थी और उनकी
किस्में भी बहुत सीमित थीं। आज स्थिति बिल्कुल अलग है। एक स्थानीय मित्र ने बताया
कि ल्हासा के आसपास कई ग्रीनहाउस बनाए गए हैं, जिससे सब्जियों की स्थानीय आपूर्ति
और आत्मनिर्भरता में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, छिंगहाई-शीत्सांग रेलवे के
जरिए कोल्ड चेन परिवहन की सुविधा ने भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है। अब
ल्हासा फलों और सब्जियों के मामले में पहले जैसा "अछूता क्षेत्र" नहीं रह गया है।
लेकिन इन तमाम बदलावों के बीच एक चीज ऐसी है, जो आज भी पहले जैसी ही है। शाम
होते ही मैं एक बार फिर जोखांग मंदिर लौट आई। मंदिर के बाहर कई श्रद्धालु अब भी
पत्थर की शिलाओं पर लेटकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर रहे थे। बीस साल पहले जब मैंने
पहली बार ऐसा दृश्य देखा था, तो श्रद्धा और भक्ति से प्रभावित होकर काफी देर तक वहीं
खड़ी रही थी। बीस साल बाद भी वही दृश्य मेरी आंखों के सामने आया। ऐसा लगा, मानो
इस जगह पर समय कुछ पल के लिए ठहर गया हो।
हां, इन बीस वर्षों में ल्हासा काफी बदल गया है। यह पहले से ज्यादा हरा-भरा, समृद्ध और
सुविधाजनक हो गया है। शहर बदला है, लोगों का जीवन बदला है और आधुनिक तकनीक
रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है। लेकिन ल्हासा की एक पहचान आज भी वैसी ही
है। यहां ऑक्सीजन की कमी जरूर है, लेकिन आस्था की कभी कमी नहीं रही।
(चंद्रिमा – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)





