अंतरिक्ष में धान की खेती: चीन के प्रयोग से जगीं नई उम्मीदें

अंतरिक्ष में इंसानों के लंबे समय तक ठहरने और भविष्य में दूसरे ग्रहों तक पहुंचने के रास्ते
में भोजन का इंतज़ाम सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आखिरकार धरती से लाखों
किलोमीटर दूर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री कब तक अपने साथ ले जाए गए राशन पर निर्भर
रहेंगे? क्या वे अंतरिक्ष में ही अनाज उगा सकेंगे? चीन का एक अनोखा रिसर्च प्रोजेक्ट इसी
अहम सवाल का जवाब तलाश रहा है।

इसी कड़ी में, चीन ने अंतरिक्ष में धान की कई पीढ़ियों तक खेती करने के अपने रिसर्च में एक
और बड़ा कदम बढ़ाया है। थ्येनकोंग स्पेस स्टेशन पर मौजूद शनचोउ-23 मिशन के तीन
अंतरिक्ष यात्रियों ने धान के सैंपल इकट्ठा करने, नए बीज बोने और उन्हें सुरक्षित रखने का
एक और चरण सफलता से पूरा कर लिया है।

इस रिसर्च का मुख्य मकसद यह समझना है कि पृथ्वी की तुलना में बेहद कम ग्रेविटी
(गुरुत्वाकर्षण) वाले माहौल में धान की जेनेटिक स्टेबिलिटी और पर्यावरण के अनुकूल ढलने
की क्षमता पर क्या असर पड़ता है। बीते एक हफ्ते के दौरान जुटाए गए इन सैंपल्स को अब
पृथ्वी पर लाया जाएगा, जहां वैज्ञानिक इनके बाहरी लक्षणों और मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर का
गहराई से अध्ययन करेंगे। इससे साफ हो सकेगा कि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से धान
के गुणों और उसकी आने वाली पीढ़ियों पर क्या असर पड़ता है।

गौरतलब है कि चीन ने इस दिशा में साल 2022 में पहला बड़ा कदम उठाया था। उस वक्त
शनचोउ-14 मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने थ्येनकोंग स्टेशन पर धान के पौधे उगाकर दुनिया
का पहला ऐसा प्रयोग पूरा किया, जिसमें अंतरिक्ष में धान के पूरे लाइफ साइकिल का
अध्ययन किया गया था। करीब 120 दिनों तक चले इस प्रयोग में छह बीजों से खेती की
शुरुआत हुई थी और उनसे 59 नई पीढ़ी के बीज हासिल हुए थे, जिन्हें अंतरिक्ष यात्री वापस
पृथ्वी पर लाए थे।
इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, इस साल 24 मई को शनचोउ-23 स्पेसक्राफ्ट धान के
बीजों की एक नई खेप लेकर अंतरिक्ष पहुंचा। इनमें दो तरह के बीज शामिल थे—पहला, वे
सामान्य बीज जो कभी अंतरिक्ष में नहीं गए थे; और दूसरा, 2022 में अंतरिक्ष में उगाए गए
धान से हासिल बीजों की तीसरी पीढ़ी, जिन्हें पृथ्वी पर उगाकर तैयार किया गया था। यह

दोनों ही चीन की 'जैपोनिका' किस्में हैं, जो अपने बेहतरीन अनुकूलन और तीन से चार महीने
के छोटे लाइफ साइकिल के लिए जानी जाती हैं।

अब अंतरिक्ष में चार महीने से ज्यादा का वक्त बिताने के बाद शनचोउ-23 की टीम ने अपनी
पहली फसल काट ली है, और इसके साथ ही दूसरी पीढ़ी के धान को उगाने का काम शुरू हो
चुका है। इसके लिए ब्रीडिंग की दो अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
दरअसल, वैज्ञानिक यह तुलना करना चाहते हैं कि अंतरिक्ष का अनुभव ले चुके बीज और
पृथ्वी के आम बीज अंतरिक्ष के माहौल में किस तरह बढ़ते हैं, और खेती के अलग-अलग
तरीकों का अगली पीढ़ी के पौधों पर क्या असर पड़ता है।

उम्मीद जताई जा रही है कि यह दूसरी पीढ़ी का धान इस साल के अंत में प्रस्तावित शनचोउ-
24 मिशन के दौरान पूरी तरह पककर तैयार हो जाएगा।
यह प्रयोग सिर्फ धान उगाने तक ही सीमित नहीं है। साल 2022 का रिसर्च जहां पृथ्वी के बीज
से अंतरिक्ष में बीज तैयार करने तक पहुंचा था, वहीं अब वैज्ञानिक उस कड़ी को आगे बढ़ा रहे
हैं, ताकि अंतरिक्ष में तैयार बीजों से ही अंतरिक्ष के अंदर अगली फसल उगाई जा सके।
अगर यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहता है, तो भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को खाने-पीने के
सामान के लिए बार-बार पृथ्वी से सप्लाई आने का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। चंद्रमा पर लंबे
समय तक रुकने या मंगल जैसे दूरदराज के ग्रहों की लंबी यात्राओं के लिए यह काबिलियत
बेहद क्रांतिकारी साबित हो सकती है।
आखिरकार, अंतरिक्ष में मानव सभ्यता का भविष्य सिर्फ वहां पहुंचने की टेक्नोलॉजी पर
निर्भर नहीं करेगा, बल्कि असली चुनौती वहां जीवन को टिकाए रखने की होगी। और इस
ऐतिहासिक दिशा में धान का एक छोटा-सा पौधा भी सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, बीजिंग)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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