“द इकॉनॉमिस्ट”ने हाल ही में चीनी फिल्म“वन्स अपॉन ए टाइम इन
द मिडल ईस्ट”पर टिप्पणी करते समय चीनी कूटनीति को लूंग
रेस्ट्रांट बताया। उसने फिल्म में अच्छी तरह खाना खाने और बच्चों
को अच्छी तरह पालने की थीम के मुताबिक दावा किया कि चीनी
कूटनीति वाणिज्यिक लाभ से संचालित है और विचारधारा की दृष्टि
से गहराई का अभाव है। ऐसे व्याख्यान ने गलती से व्यावहारिकता
को छिछला ,विकास को व्यापारिकता और आम लोगों की बुनियादी
आकांक्षा को राजनीतिक आदर्श बताया। वास्तव में इस चीनी फिल्म
ने यह सवाल नहीं उठाया कि क्या फूड कूटनीति की जगह ले सकेगा
या नहीं, बल्कि ये प्रश्न खड़े किये हैं कि शांति और विकास क्या है,
अंतररराष्ट्रीय सहयोग किस के लिए है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ये
सवाल पूछे जाने चाहिए।
कई विकासशील देशों के लिए सब से नाजुक सवाल राजनीतिक
सिद्धांत नहीं है, बल्कि क्या घर में बिजली उपलब्ध है, क्या बच्चे
स्कूल जा सकते हैं, क्या कृषि उत्पाद बेचे जाएंगे या नहीं, क्या
अस्पताल का संचालन सामान्य है, क्या स्वच्छ पानी उपलब्ध है,
क्या आपदा के बाद मार्ग की बहाली होगी इत्यादि। अगर ऐसे सवाल
छिछले समझे जाते हैं, तो वह सच्चे मायने में एक छिछली
राजनीति है।
इस फिल्म में युद्ध ग्रस्त मध्यपूर्व क्षेत्र में एक चीनी कुक की
कहानी सुनायी गयी। उसने युद्ध स्थिति में जीने की भरपूर कोशिश
करने वाले आम लोगों पर फोकस रखा। ऐसी कहानी का गहरा
राजनीतिक महत्व है।
इस फिल्म में बार-बार दोहराया गया कि अच्छी तरह खाना खाना
चाहिए। उस ने लोगों को सचेत किया कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य
प्रभावी रणनीतिक शब्द रचना नहीं है, बल्कि एक तरह की सामाजिक
व्यवस्था रचनी है, जो लोगों को सामान्य जीवन दे सकती है।
केवल लड़ाई जीतने वाले ही वीर नहीं कहलाते बल्कि वो भी वीर
कहलाते हैं जो लोगों को बचाकर जीने का रास्ता दिखाते हैं।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)