डिजिटल करेंसी वाला ब्रिक्स प्लान – डॉलर को झटका या सिर्फ दिखावा?…दुनिया की नई आर्थिक जंग का ट्रेलर है। इसे ऐसे समझिए
डॉलर पर निर्भरता होगी कम, ब्रिक्स देश डिजिटल करेंसी से करेंगे कारोबार – भोपाल में भी होगा फायदा
अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए ब्रिक्स देशों ने बड़ा प्लान तैयार किया है। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत अपनी डिजिटल करेंसी (CBDC) को अन्य देशों की डिजिटल करेंसी से जोड़ने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी में है। इसमें चीन और रूस को-पायलट होंगे। यह सम्मेलन 11 से 13 सितंबर के बीच नई दिल्ली में होगा।
क्या है योजना?
इस योजना के तहत कोई नई साझा मुद्रा जारी नहीं होगी। बल्कि भारत के डिजिटल रुपए, चीन के डिजिटल युआन और रूस के डिजिटल रूबल जैसी राष्ट्रीय डिजिटल मुद्राओं को एक साझा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम से जोड़ा जाएगा। साथ ही भारत के UPI, चीन के CIPS और रूस के SPFS जैसी राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों को भी आपस में जोड़ा जाएगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि करेंसी कन्वर्जन का खर्च, बैंकिंग चार्ज और सेटलमेंट का समय घट जाएगा।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद अब इसमें इंडोनेशिया, ईरान और यूएई जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं। ये देश मिलकर ग्लोबल इकोनॉमी में 40% हिस्सेदारी रखते हैं, ऐसे में भारतीय आयातकों-निर्यातकों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। छोटे कारोबारियों को बड़ी राहत मिलेगी, वे बिना कुछ गिरवी रखे ब्रिक्स देशों में कारोबार कर पाएंगे।
इसमें हैं 6 बड़ी चुनौतियां
1. समय लगेगा: भारत, चीन और रूस CBDC पर तेजी से काम कर रहे हैं, जबकि ब्राजील, द. अफ्रीका और यूएई परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं। सभी 10 देशों को एक ही तकनीकी मानक पर लाना आसान नहीं होगा।
2. कानूनी बाधाएं: देशों के बैंकिंग नियम अलग हैं। अलग-अलग प्रणालियों को जोड़ने के लिए मजबूत डेटा-शेयरिंग और नियामक तालमेल जरूरी होगा।
3. डेटा सुरक्षा: वित्तीय डेटा कहां सुरक्षित रहेगा, ट्रांजेक्शन डेटा कौन देख सकेगा और साइबर हमलों पर किसकी जिम्मेदारी होगी, यह पेचीदा सवाल है।
4. व्यापार असंतुलन: यदि कोई देश लगातार ज्यादा सामान खरीदता है और कम बेचता है, तो भुगतान का असंतुलन संभव है।
5. अमेरिका के खिलाफ नहीं: इसे सीधे डॉलर को हटाने की योजना नहीं मान सकते, क्योंकि भारत अमेरिका का भी अहम साझेदार है। उद्देश्य स्वतंत्र पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना है।
6. ग्लोबल इकोनॉमी पर असर: अमेरिकी डॉलर पर आधारित वैश्विक व्यवस्था रातोंरात खत्म नहीं होगी। यह केवल ब्रिक्स देशों के भीतर आपसी व्यापार को अधिक स्वतंत्र बनाने का नया मॉडल है।
1. असली खेल क्या है?
अमेरिका जब चाहे किसी देश पर प्रतिबंध लगा देता है, जैसे रूस पर लगाया। रूस का SWIFT से कनेक्शन काट दिया गया तो उसका डॉलर में व्यापार रुक गया। इसी डर से ब्रिक्स देश अब सोच रहे हैं – *अपना खुद का UPI जैसा सिस्टम बनाते हैं, जिसमें डॉलर बीच में ही न हो।*
भारत के लिए ये बहुत फायदेमंद है। आज हम रूस से तेल खरीदते हैं तो डॉलर में पेमेंट करना पड़ता है, कन्वर्जन चार्ज लगता है। कल को अगर डिजिटल रुपया सीधे डिजिटल रूबल से जुड़ गया, तो UPI जितनी आसानी से पेमेंट हो जाएगा।
2. भारत का डबल गेम
ये सबसे स्मार्ट बात है। भारत ने साफ कहा है – *हम डॉलर के खिलाफ नहीं हैं।*
क्यों? भारत अमेरिका का भी बड़ा पार्टनर है। iPhone, Google, निवेश सब डॉलर में आता है। इसलिए भारत कह रहा है – हम कोई नई ‘ब्रिक्स मुद्रा’ नहीं बना रहे, हम सिर्फ अपना स्वतंत्र पेमेंट का विकल्प तैयार कर रहे हैं। ताकि अगर कल को अमेरिका ने कभी दबाव बनाया, तो हमारे पास Plan-B तैयार हो।
3. व्यापारी को क्या मिलेगा?
मध्यप्रदेश से सोया, दाल, इंजीनियरिंग गुड्स दुबई, ईरान, इंडोनेशिया जाते हैं। अभी दुबई को माल बेचने पर पहले रुपया -> डॉलर -> दिरहम बनता है, दो बार कन्वर्जन चार्ज। इस सिस्टम के बाद रुपया सीधे दिरहम से जुड़ेगा। मतलब छोटे एक्सपोर्टर का 2-3% पैसा बचेगा और पेमेंट 2 दिन की जगह 2 मिनट में आएगा।
4. फिर फेल क्यों हो सकता है
सबसे बड़ी है भरोसा।
क्या चीन अपना ट्रांजेक्शन डेटा भारत को दिखाएगा? क्या भारत अपना डेटा रूस को देगा? किसी भी देश की डिजिटल करेंसी में उसकी पूरी इकोनॉमी का डेटा होता है। इसे शेयर करना मतलब अपनी तिजोरी की चाबी देना।
और दूसरा – चीन की चालाकी चीन चाहता है उसका डिजिटल युआन ही इस पूरे सिस्टम का बाप बन जाए। भारत कभी नहीं चाहेगा कि डॉलर हटाकर हम युआन के गुलाम बन जाएं। ये प्रोजेक्ट 2026 में शुरू होगा, लेकिन पूरी तरह से चलने में 3-4 साल लगेंगे। डॉलर कल सुबह खत्म नहीं होगा, लेकिन दुनिया अब डॉलर के बिना जीने की प्रैक्टिस शुरू कर चुकी है। और इस प्रैक्टिस की लैब नई दिल्ली बनने जा रही है।