ट्रेन में सफर करने वालों के लिए कन्फर्म टिकट मिलना किसी राहत से कम नहीं होता। खासकर त्योहार, छुट्टियों या वीकेंड पर टिकट बुकिंग शुरू होते ही सीटें तेजी से भरने लगती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रेलवे का टिकटिंग सिस्टम सीट आखिर किस क्रम में अलॉट करता है? क्या पहली बुकिंग करने वाले यात्री को हमेशा अपनी पसंद की सीट मिलती है? और ट्रेन में सबसे आखिर में कौन-सी सीट बुक होती है?
दरअसल, रेलवे का रिजर्वेशन सिस्टम सीटों को मनमाने तरीके से अलॉट नहीं करता। कोच की संरचना और उपलब्ध बर्थ के आधार पर सॉफ्टवेयर सीटों का आवंटन करता है। स्लीपर और थर्ड एसी जैसे कोच में अलग-अलग प्रकार की बर्थ होती हैं और सीट आवंटन इसी व्यवस्था के मुताबिक आगे बढ़ता है।
आम तौर पर शुरुआती बुकिंग में बीच के कोचों की सीटों को प्राथमिकता दी जाती है। शुरुआती चरण में लोअर, मिडिल और अपर बर्थ समेत उपलब्ध सीटों का एक निर्धारित हिस्सा सिस्टम द्वारा अलॉट किया जाता है। यानी पहली टिकट बुक करने वाले यात्री को जरूरी नहीं कि कोच की पहली या आखिरी सीट ही मिले।
यही वजह है कि कई बार ट्रेन में सीटें उपलब्ध दिखने के बावजूद यात्रियों को अपनी पसंद का कोच या बर्थ नहीं मिलती। वहीं जैसे-जैसे बुकिंग बढ़ती है, सिस्टम अन्य कोचों की सीटों को भी खोलता जाता है।
सबसे आखिरी में कौन-सी सीटें मिलती हैं?
आमतौर पर कोच के अंतिम हिस्से या दरवाजे के आसपास की बर्थ बाद के चरण में अलॉट हो सकती हैं। हालांकि सीट आवंटन पूरी तरह एक तय फॉर्मूले से हर ट्रेन में बिल्कुल समान हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कोच संरचना, उपलब्धता, यात्रा के स्रोत-गंतव्य और बुकिंग पैटर्न जैसे कई कारक असर डाल सकते हैं।
इसलिए अगली बार टिकट बुक करते समय सिर्फ यह न सोचें कि पहली बुकिंग यानी पसंद की सीट पक्की। रेलवे का रिजर्वेशन सिस्टम अपनी निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर सीट अलॉट करता है। यानी ट्रेन की सीटों का खेल सिर्फ ‘कौन पहले आया’ पर नहीं, बल्कि रेलवे के रिजर्वेशन सिस्टम की व्यवस्था पर भी निर्भर करता है।





