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Janmashtami: जन्माष्टमी पर एक असहज सवाल: कान्हा का बचपन पूजते हैं, अपने बच्चों का क्यों छीनते हैं?

DigitalDesk by DigitalDesk
September 3, 2026
in धर्म, मुख्य समाचार
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Janmashtami: जन्माष्टमी पर एक असहज सवाल: कान्हा का बचपन पूजते हैं, अपने बच्चों का क्यों छीनते हैं?
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घरों में बाल गोपाल के लिए झूले सज रहे हैं, नन्हे पैरों के निशान बनाए जा रहे हैं और बच्चों को कान्हा की पोशाक पहनाई जा रही है। लेकिन क्या हमारे अपने बच्चों के जीवन में खेलने, शरारत करने और बिना किसी लक्ष्य के कुछ समय बिताने की जगह बची है?

जन्माष्टमी आते ही घरों और मंदिरों में बाल गोपाल के स्वागत की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहीं फूलों से झूला सजता है, कहीं माखन-मिश्री का भोग लगता है और कहीं छोटे बच्चे मोरपंख लगाकर कान्हा बनते हैं। सोशल मीडिया भी राधा-कृष्ण बने बच्चों की तस्वीरों और वीडियो से भर जाता है।

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लेकिन इन सुंदर तस्वीरों के बीच एक सवाल शायद ही पूछा जाता है जिस बाल कृष्ण की चंचलता और शरारतों को हम इतनी श्रद्धा से याद करते हैं, क्या वैसा बचपन हम आज अपने बच्चों को जीने दे रहे हैं?

कैलेंडर में सब कुछ है, खाली समय नहीं

आज बहुत से बच्चों का दिन सुबह की स्कूल बस से शुरू होकर ट्यूशन, होमवर्क, प्रोजेक्ट, प्रतियोगिता और किसी न किसी गतिविधि के बीच समाप्त होता है। संगीत, नृत्य, खेल और चित्रकला भी कई बार आनंद का माध्यम न रहकर उपलब्धियों की सूची का हिस्सा बन जाते हैं।

बच्चे के पास प्रमाणपत्र तो बढ़ते जाते हैं, लेकिन वह समय घटता जाता है जिसमें वह अपनी इच्छा से कुछ कर सके। गलियों में खेलना, पेड़ पर चढ़ना, दोस्तों के साथ बेवजह हंसना या कुछ देर चुपचाप बैठकर कल्पना करना अब अक्सर “समय की बर्बादी” समझा जाने लगा है।

हम बाल गोपाल की शरारतों की कहानियां सुनकर मुस्कुराते हैं। मगर अपना बच्चा दूध गिरा दे, कपड़े गंदे कर ले या किसी काम में गलती कर दे तो हमारी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है?

अगर कृष्ण आज के समय में हमारे घर में जन्म लेते, तो क्या हम उन्हें पेड़ पर चढ़ने देते? क्या उन्हें दोस्तों के साथ मैदान में घंटों खेलने की अनुमति मिलती? क्या उनकी बांसुरी को संगीत समझा जाता या यह कहा जाता कि पहले होमवर्क पूरा करो?

शरारत भी बचपन की भाषा है

कृष्ण की बाललीलाओं में केवल चमत्कार नहीं हैं। उनमें जिज्ञासा, मित्रता, संगीत, प्रकृति और सामुदायिक जीवन भी है। कान्हा अकेले नहीं दिखाई देते। उनके साथ ग्वाल-बाल हैं, गायें हैं, यमुना का किनारा है और पूरा गोकुल है।

यह उस बचपन की तस्वीर है जिसमें बच्चा अपने आसपास की दुनिया को छूकर, देखकर और अनुभव करके सीखता है। हर शरारत अनुशासनहीनता नहीं होती। कई बार वह जिज्ञासा, आत्मविश्वास और रचनात्मकता की पहली अभिव्यक्ति होती है।

बच्चों को सीमाओं और अनुशासन की आवश्यकता अवश्य है, लेकिन अनुशासन और निरंतर नियंत्रण एक ही बात नहीं हैं। उन्हें अवसर देना और उनके ऊपर हर समय बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव डालना भी अलग-अलग बातें हैं।

कहीं बच्चा ‘कंटेंट’ तो नहीं बन रहा?

जन्माष्टमी के दिन बच्चों को राधा या कृष्ण बनाना परिवारों की प्यारी परंपरा है। समस्या तब शुरू होती है जब बच्चे की सहज खुशी से अधिक महत्वपूर्ण उसकी तस्वीर, वीडियो और उस पर मिलने वाले लाइक्स हो जाते हैं।

कई बार बच्चा थका हुआ या असहज होता है, लेकिन सही तस्वीर पाने के लिए उससे बार-बार पोज देने को कहा जाता है। उसका त्योहार धीरे-धीरे परिवार की डिजिटल प्रस्तुति बन जाता है।

इस जन्माष्टमी पर यह भी सोचा जा सकता है कि क्या हर पारिवारिक क्षण को सार्वजनिक करना जरूरी है। बच्चे की खुशी और उसकी निजता किसी भी वायरल तस्वीर से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

त्योहार को बच्चों के नाम कीजिए

जन्माष्टमी मनाने के लिए सजावट छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। बस उसमें बच्चे को प्रदर्शन की वस्तु बनाने के बजाय सक्रिय भागीदार बनाया जा सकता है।

उसे अपनी पसंद से झूला सजाने दें। रंगों के चुनाव पर उसकी राय लें। उसके साथ माखन-मिश्री तैयार करें। दादा-दादी या नाना-नानी से कृष्ण के बचपन की कहानियां सुनें। कुछ समय के लिए पूरे परिवार के फोन अलग रखकर साथ बैठें। उसे सवाल पूछने दें उन सवालों सहित जिनका उत्तर तुरंत हमारे पास न हो।

यह दिन किसी जरूरतमंद बच्चे को किताबें, खेल का सामान या पढ़ाई की सामग्री देने का अवसर भी बन सकता है। इससे उत्सव पूजा से आगे बढ़कर साझेदारी और संवेदनशीलता का रूप ले सकता है।

जन्म कारागार में, बचपन खुली हवा में

कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ, लेकिन उनका बचपन गोकुल की खुली हवा, मित्रों, संगीत और प्रकृति के बीच बीता। शायद इस कथा का एक आधुनिक अर्थ यह भी है कि प्रत्येक बच्चे को भय और बंदिश से निकालकर विश्वास और स्वतंत्रता तक पहुंचने का अवसर मिलना चाहिए।

इस जन्माष्टमी पर घर में कान्हा के छोटे-छोटे पैरों के निशान जरूर बनाइए, लेकिन साथ ही यह भी देखिए कि हमारे बच्चों के कदम किस दिशा में जा रहे हैं। कहीं अपेक्षाओं, तुलना और लगातार बेहतर बनने की दौड़ ने उनका रास्ता बहुत संकरा तो नहीं कर दिया?

बाल गोपाल की पूजा तभी पूरी दिखाई देगी जब हम अपने आसपास के प्रत्येक बच्चे के भीतर मौजूद जिज्ञासु, नटखट और रचनात्मक कान्हा को भी पहचानेंगे।

क्योंकि बचपन केवल भविष्य की तैयारी नहीं है। बचपन अपने आप में जीवन का एक अनमोल हिस्सा है और हर बच्चे को उसे जीने का अधिकार है।

 

 

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