मध्य प्रदेश की राजनीति में कैबिनेट की बैठकें अक्सर फैसलों की लंबी सूची के लिए जानी जाती हैं… लेकिन 1 सितंबर की मंत्रि-परिषद बैठक के फैसलों को सिर्फ घोषणाओं की सूची मानना शायद इस पूरी तस्वीर को छोटा कर देना होगा। करीब 41 हजार करोड़ रुपये से अधिक के वित्तीय प्रस्तावों को मंजूरी देकर मोहन सरकार ने एक साथ कई मोर्चों को साधने की कोशिश की है।
गांव में रोजगार…
शहरों में सड़क और कनेक्टिविटी…
दूध उत्पादकों की आय…
युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा…
अस्पतालों की मशीनों का रखरखाव…
और किसानों की उपज का ज्यादा सरकारी उपार्जन।
यानी सरकार का फोकस सिर्फ नई परियोजनाएं खड़ी करने पर नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से लेकर आधुनिक शिक्षा और बुनियादी ढांचे तक पूरी विकास श्रृंखला को मजबूत करने पर दिखाई देता है।
सबसे बड़ा दांव—गांव, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर
कैबिनेट ने ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका के लिये गारंटी मिशन ग्रामीण’ यानी वीबी जी राम जी योजना के लिए 29 हजार 619 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रस्ताव का अनुसमर्थन किया है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है रोजगार की गारंटी को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन करना। यानी ग्रामीण परिवार के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिए अब साल में 25 दिन अतिरिक्त श्रम आधारित रोजगार का प्रावधान होगा। लेकिन सरकार का लक्ष्य सिर्फ मजदूरी देना नहीं है। योजना को ग्रामीण बुनियादी ढांचे से जोड़ने की कोशिश की गई है। ग्राम पंचायतों में GIS आधारित तकनीक, पीएम गति शक्ति की लेयर्स और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल से ‘विकसित ग्राम पंचायत योजना’ तैयार करने का प्रावधान है। यही इस फैसले का बड़ा बदलाव है। रोजगार + गांव का इंफ्रास्ट्रक्चर = ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दोहरा फायदा। अगर योजनाओं का क्रियान्वयन पारदर्शी तरीके से हुआ, तो इसका असर सिर्फ मजदूर की आय पर नहीं बल्कि गांव की सड़क, जल संरचना और स्थानीय परिसंपत्तियों पर भी दिखाई दे सकता है।
सांची सिर्फ ब्रांड नहीं… किसानों की कमाई का मॉडल
दूसरा बड़ा फैसला डेयरी सेक्टर से जुड़ा है। करीब 2,973 करोड़ रुपये की डेयरी विकास योजना को मंजूरी दी गई है। लक्ष्य अगले पांच वर्षों में सहकारी दुग्ध समितियों को 7,331 गांवों से बढ़ाकर 26 हजार गांवों तक ले जाना है। दूध का दैनिक संग्रह 12 लाख किलो से बढ़ाकर 52 लाख किलो करने का लक्ष्य है। प्रसंस्करण क्षमता 17.8 लाख लीटर से बढ़ाकर 63.3 लाख लीटर प्रतिदिन करने की योजना है। और पैकेट दूध की बिक्री 7 लाख लीटर से बढ़ाकर 35 लाख लीटर प्रतिदिन करने का लक्ष्य रखा गया है। यहां कहानी सिर्फ ‘सांची’ ब्रांड के विस्तार की नहीं है। इसके पीछे ग्रामीण परिवारों की नियमित आय का मॉडल भी छिपा है। कृषि आय मौसम और फसल पर निर्भर होती है… लेकिन दूध ऐसी गतिविधि है जिससे परिवार को रोजाना नकद आय मिल सकती है। इसलिए डेयरी सेक्टर को मजबूत करना छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय के वैकल्पिक स्रोत को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
भोपाल बायपास—सिर्फ सड़क नहीं, लॉजिस्टिक्स का गेमचेंजर
पश्चिम भोपाल बायपास के लिए करीब 3,774 करोड़ रुपये की पुनरीक्षित प्रशासनिक स्वीकृति भी इस पैकेज का अहम हिस्सा है। 35.61 किलोमीटर लंबा चार लेन बायपास भोपाल शहर के ट्रैफिक पर दबाव कम करने के साथ क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बदल सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जबलपुर और नर्मदापुरम की ओर से इंदौर आने-जाने वाले वाहनों को भोपाल शहर से गुजरने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लगभग 21 किलोमीटर की दूरी कम होने का अनुमान है। इसका मतलब सिर्फ समय की बचत नहीं है। कम दूरी यानी कम ईंधन लागत… कम ट्रांजिट टाइम…और माल ढुलाई की बेहतर दक्षता। यानी पश्चिम भोपाल बायपास को अगर बड़े आर्थिक नक्शे पर देखें, तो यह भोपाल को बायपास करने वाली सड़क नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की लॉजिस्टिक क्षमता बढ़ाने वाला कॉरिडोर बन सकता है।
बीना-मालथौन रोड—औद्योगिक बेल्ट को मिलेगी रफ्तार
मेहलुआ-बीना-खिमलासा-मालथौन 4-लेन मार्ग के लिए 3,272 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति भी इसी कनेक्टिविटी रणनीति का हिस्सा है। बीना क्षेत्र में रिफाइनरी, थर्मल पावर प्लांट, रेलवे यार्ड और उद्योग मौजूद हैं। ऐसे में बेहतर सड़क कनेक्टिविटी का सीधा असर भारी वाहनों की आवाजाही, माल परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। यह परियोजना भविष्य में क्षेत्रीय सड़क को आर्थिक और लॉजिस्टिक कॉरिडोर में बदलने की क्षमता रखती है। यानी सरकार के फैसलों में सड़क को सिर्फ यातायात सुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक विकास के इंजन के रूप में देखने की कोशिश दिखाई देती है।
RGPV का बंटवारा या तकनीकी शिक्षा का विकेंद्रीकरण?
कैबिनेट का सबसे बड़ा संस्थागत फैसला शायद RGPV का पुनर्गठन है। भोपाल, उज्जैन और जबलपुर में तीन अलग-अलग प्रौद्योगिकी एवं कौशल विश्वविद्यालय स्थापित करने की स्वीकृति दी गई है। मौजूदा RGPV के अंतर्गत 585 संस्थान और 3.83 लाख से अधिक विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। अब तकनीकी संस्थानों को संभागवार तीन विश्वविद्यालयों के क्षेत्राधिकार में बांटा जाएगा। यह फैसला सिर्फ विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है। इसका उद्देश्य तकनीकी शिक्षा को क्षेत्रीय जरूरतों के ज्यादा करीब लाना है।
भोपाल का विश्वविद्यालय मध्य भारत…
उज्जैन का विश्वविद्यालय मालवा…
और जबलपुर का विश्वविद्यालय महाकौशल क्षेत्र की तकनीकी शिक्षा का केंद्र बन सकता है। अगर स्थानीय उद्योगों, कौशल विकास और विश्वविद्यालयों के बीच मजबूत तालमेल बनाया गया, तो इसका सबसे बड़ा लाभ युवाओं को मिल सकता है।
स्वास्थ्य में नई बिल्डिंग से ज्यादा जरूरी ‘मेंटेनेंस’
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सरकार ने एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित समस्या पर पैसा लगाने का फैसला किया है। मशीन और उपकरणों के रखरखाव के लिए 488 करोड़ रुपये और चिकित्सा संस्थानों की विभागीय परिसंपत्तियों के संधारण के लिए करीब 916 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई है। स्वास्थ्य व्यवस्था में अक्सर चर्चा नई मशीन खरीदने और नए अस्पताल बनाने की होती है।
लेकिन असली सवाल यह है—
जो मशीनें पहले से हैं, क्या वे चल रही हैं?
महंगे मेडिकल उपकरण रखरखाव के अभाव में बंद पड़े रहें तो पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित होती है। इसलिए मेंटेनेंस के लिए इतना बड़ा प्रावधान स्वास्थ्य सेवाओं की ‘ऑपरेशनल क्षमता’ को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
किसान—मूंग की खरीद सीमा 25 से 60 प्रतिशत
किसानों के लिए भी कैबिनेट ने राहत वाला फैसला किया है। ग्रीष्मकालीन मूंग की सरकारी खरीद के लिए पंजीकृत किसानों की उपज की सीमा को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक किए जाने के निर्णय का अनुसमर्थन किया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि ज्यादा उपज सरकारी खरीद के दायरे में आ सकती है। लेकिन यहां भी असली चुनौती सिर्फ सीमा बढ़ाने की नहीं होगी।
किसान को समय पर खरीद केंद्र…
समय पर भुगतान…
और पारदर्शी प्रक्रिया मिले—तभी फैसले का वास्तविक लाभ जमीन पर दिखाई देगा।
नए जिलों में प्रशासन का विस्तार
मैहर, मऊगंज, पांढुर्णा और निवाड़ी जैसे जिलों के लिए नए पदों की स्वीकृति भी सरकार के प्रशासनिक विस्तार का हिस्सा है। सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग और आयुष विभाग में नए पद सृजित किए जाने से इन जिलों में विभागीय कार्यालयों के संचालन को संस्थागत आधार मिलेगा। नया जिला सिर्फ नक्शे पर नाम बदलने से नहीं बनता। उसे चलाने के लिए चाहिए— अधिकारी, कर्मचारी, कार्यालय और नागरिकों तक पहुंचने वाली सेवाएं। इस लिहाज से पदों का सृजन प्रशासनिक ढांचे को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
41 हजार करोड़ का असली अर्थ क्या?
अगर कैबिनेट के सभी फैसलों को एक साथ देखें तो एक पैटर्न साफ दिखाई देता है।
गांव में रोजगार।
किसान के लिए बाजार।
दूध उत्पादक के लिए सहकारी मॉडल।
शहरों के लिए सड़क।
उद्योगों के लिए लॉजिस्टिक कनेक्टिविटी।
युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा।
मरीजों के लिए बेहतर स्वास्थ्य ढांचा।
और नए जिलों के लिए प्रशासनिक क्षमता।
यानी विकास की अलग-अलग कड़ियों को एक साथ मजबूत करने की कोशिश।
यही वजह है कि इन फैसलों को सिर्फ 41 हजार करोड़ रुपये की स्वीकृतियों के रूप में देखना अधूरा होगा।
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी
सरकारी फैसलों की असली ताकत उनके बजट में नहीं… उनके जमीन पर उतरने में होती है। 29 हजार करोड़ की ग्रामीण योजना हो या हजारों करोड़ की सड़क परियोजनाएं… डेयरी विस्तार हो या विश्वविद्यालयों का पुनर्गठन…
स्वास्थ्य उपकरणों का रखरखाव हो या मूंग की खरीद… हर फैसले की सफलता का पैमाना एक ही होगा— आम आदमी को इसका फायदा कब और कितना मि ला? अगर पैसा समय पर खर्च हुआ, परियोजनाएं समय पर पूरी हुईं, पारदर्शिता बनी रही और योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा, तो ये फैसले मध्य प्रदेश के विकास मॉडल को नई गति दे सकते हैं।
मोहन सरकार की इस कैबिनेट बैठक को अगर एक लाइन में समझना हो तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है— ‘रोजगार से रोड तक, दूध से डिजिटल शिक्षा तक और किसान से अस्पताल तक—एक साथ कई मोर्चों पर निवेश।’
यह बजट और स्वीकृतियों का गणित भर नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि मध्य प्रदेश अपने विकास को अब सिर्फ राजधानी भोपाल या बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय गांव, क्षेत्रीय शहर, औद्योगिक कॉरिडोर और नए प्रशासनिक जिलों तक फैलाने की कोशिश कर रहा है। अब नजर सिर्फ इस बात पर नहीं होगी कि सरकार ने कितने करोड़ रुपये मंजूर किए… नजर इस पर होगी कि इन करोड़ों से मध्य प्रदेश की तस्वीर कितनी बदली।
क्योंकि घोषणा से विकास की शुरुआत होती है… लेकिन जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव ही सरकार के फैसलों की असली सफलता तय करता है।





