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नेपाल की बाढ़ में भोपाल के 29 लोग लापता, आखिरी कॉल में कहा था—‘जान बचाने पहाड़ पर जा रहे हैं’

DigitalDesk by DigitalDesk
August 31, 2026
in भोपाल, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार
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29 people from Bhopal missing in Nepal floods
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एक परिवार के 29 सदस्यों का सुराग नहीं, आखिरी बातचीत ने बढ़ाई चिंता

भोपाल। नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड का असर अब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल तक पहुंच गया है। कोलार क्षेत्र में रहने वाले एक परिवार के 29 सदस्य नेपाल के रसुवा जिले में स्थित गोसाईकुंड की यात्रा के दौरान लापता बताए जा रहे हैं। परिवार के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह करीब साढ़े 9 बजे उनसे आखिरी बार फोन पर बातचीत हुई थी। उस बातचीत में परिवार के सदस्यों ने बताया था कि अचानक बाढ़ की सूचना मिली है और वे एक मकान की छत पर शरण लिए हुए हैं। इसके बाद उन्होंने कहा—“जान बचाने के लिए पहाड़ की तरफ जा रहे हैं।”

उस कॉल के बाद से सभी 29 लोगों के फोन बंद बताए जा रहे हैं। परिवार लगातार संपर्क की कोशिश कर रहा है, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिल सकी है।

यह घटना सिर्फ एक परिवार के लापता होने की खबर नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी मानवीय त्रासदी दिखाई दे रही है, जिसमें नेपाल की प्राकृतिक आपदा ने हजारों लोगों की जिंदगी और सैकड़ों परिवारों की उम्मीदों को अनिश्चितता में डाल दिया है।

आखिरी कॉल ने बढ़ाई परिवार की बेचैनी

भोपाल के कोलार इलाके की रहने वाली देवकी अधिकारी के मुताबिक, उनके परिवार के 29 सदस्य नेपाल के रसुवा जिले में गोसाईकुंड की यात्रा पर गए थे। यात्रा में परिवार के कई करीबी रिश्तेदार शामिल थे—जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, दीदी-जीजा और परिवार के अन्य सदस्य। 26 अगस्त की सुबह तक परिवार के लोगों से संपर्क बना हुआ था। करीब साढ़े 9 बजे फोन पर बातचीत हुई। लेकिन इस बातचीत में अचानक आई बाढ़ की भयावह तस्वीर सामने आई। परिजनों ने बताया कि बाढ़ की सूचना के बाद उन्होंने एक मकान की छत पर शरण ली है। लेकिन वहां भी खतरा बढ़ रहा था। इसके बाद परिवार को बताया गया कि वे पहाड़ की तरफ जा रहे हैं, ताकि बाढ़ के पानी से बच सकें। यही बातचीत अब परिवार के लिए आखिरी उम्मीद और सबसे बड़ी चिंता दोनों बन गई है। क्योंकि उसके बाद से फोन बंद हैं। न कोई संदेश आया। न कोई कॉल। न यह पता चला कि परिवार के सदस्य सुरक्षित स्थान तक पहुंच पाए या नहीं।

29 लोगों का एक साथ लापता होना बड़ा सवाल

इस मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि लापता लोगों की संख्या एक-दो या तीन नहीं, बल्कि एक ही परिवार के 29 सदस्य हैं। आमतौर पर किसी आपदा के बाद संपर्क टूटने की स्थिति में परिजन किसी एक व्यक्ति या छोटे समूह की तलाश करते हैं। लेकिन यहां पूरा पारिवारिक समूह एक साथ यात्रा पर था।

इसका मतलब है कि परिवार के पास एक-दूसरे की जानकारी हासिल करने का भी कोई दूसरा स्वतंत्र जरिया नहीं बचा है।

अगर मोबाइल नेटवर्क बंद है, बिजली की आपूर्ति बाधित है या सड़क और संचार व्यवस्था टूट चुकी है, तो बाहर बैठे परिजनों के लिए यह पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है कि लोग कहां पहुंचे।

यही वजह है कि परिवार अब नेपाल में राहत और बचाव एजेंसियों से अपने परिजनों की तलाश की उम्मीद कर रहा है।

यह मामला भारत और नेपाल के बीच आपदा के समय कांसुलर और राहत समन्वय की जरूरत को भी सामने लाता है।

गोसाईकुंड की यात्रा बनी जान का संकट

गोसाईकुंड नेपाल का प्रसिद्ध धार्मिक और प्राकृतिक स्थल है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम अचानक बदलने और तेज बारिश के बाद फ्लैश फ्लड आने का खतरा रहता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ ही समय के भीतर सामान्य रास्ते खतरनाक हो सकते हैं। नदी-नालों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और सड़क संपर्क टूट सकता है। नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई आपदा ने भी यही भयावह तस्वीर सामने रखी है। पर्यटन या धार्मिक यात्रा पर निकले लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह परिचित नहीं होते। ऐसे में जब अचानक बाढ़ आती है तो सुरक्षित स्थान तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। भोपाल के इस परिवार के मामले में आखिरी फोन कॉल में पहाड़ की ओर जाने की बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे कम से कम इतना संकेत मिलता है कि परिवार के सदस्य उस समय बाढ़ से बचने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन उसके बाद उनका कोई सुराग नहीं मिलना चिंता बढ़ाता है।

नेपाल की त्रासदी का भारत तक असर

इस आपदा का दायरा केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। नेपाल में मौजूद भारतीय नागरिकों और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए लोगों के प्रभावित होने की खबरों ने भारत में भी चिंता बढ़ा दी है। जब कोई प्राकृतिक आपदा अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब आती है तो बचाव अभियान और भी जटिल हो जाता है। दुर्गम पहाड़ी इलाके, टूटी सड़कें, खराब संचार व्यवस्था और लगातार बदलता मौसम राहत टीमों के सामने बड़ी चुनौती पैदा करते हैं। ऐसे समय में सबसे जरूरी होती है सटीक सूचना। कौन सुरक्षित है? कौन अस्पताल में है? कौन राहत शिविर में पहुंचा? कौन अभी भी लापता है? और कौन से इलाके में ब चाव दल पहुंच चुके हैं? भोपाल के 29 लोगों के मामले में भी परिवार के लिए सबसे बड़ी जरूरत यही है कि उन्हें आधिकारिक तौर पर पता चले कि उनके परिजन कहां हैं।

अब हर गुजरता घंटा उम्मीद और चिंता दोनों

देवकी अधिकारी और उनके परिवार के लिए 26 अगस्त की सुबह की वह फोन कॉल अब बार-बार याद आ रही होगी। फोन पर आखिरी शब्द थे कि— “हम जान बचाने के लिए पहाड़ की ओर जा रहे हैं।” इसके बाद फोन बंद हो गए। लेकिन फोन बंद होना अपने-आप में किसी व्यक्ति के साथ अनहोनी का प्रमाण नहीं है। आपदा की परिस्थितियों में मोबाइल टावर, बिजली, नेटवर्क और बैटरी की समस्या के कारण लंबे समय तक संपर्क टूट सकता है। इसलिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी भी अपुष्ट सूचना या सोशल मीडिया संदेश पर भरोसा करने के बजाय नेपाल की आधिकारिक राहत एजेंसियों और भारतीय अधिकारियों से सत्यापित जानकारी हासिल की जाए। परिवार की उम्मीद अब इसी बात पर टिकी है कि राहत एवं बचाव दल उन इलाकों तक पहुंचें जहां आखिरी बार परिवार के सदस्य मौजूद थे।

सबसे बड़ा सवाल

यह पूरी घटना एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है—क्या नेपाल जाने वाले भारतीय पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए आपदा के दौरान रियल-टाइम ट्रैकिंग और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था पर्याप्त है? क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में मोबाइल फोन और इंटरनेट यात्रा को आसान बनाते हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदा में यही संचार व्यवस्था सबसे पहले प्रभावित हो सकती है। भोपाल का यह परिवार अब सिर्फ अपने 29 सदस्यों के लौटने का इंतजार कर रहा है। 26 अगस्त की आखिरी कॉल से लेकर आज तक हर घंटा उनके लिए बेचैनी का है—लेकिन जब तक आधिकारिक रूप से कोई विपरीत सूचना नहीं मिलती, तलाश और उम्मीद दोनों जारी रहनी चाहिए।

Tags: #29 people from Bhopal missing in Nepal floods last call said We are heading to the hills to save our lives
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