भागवत बोले—भारत के स्वभाव में झगड़ा नहीं, भाईचारा है…राष्ट्रवाद पर पश्चिम से अलग भारतीय अवधारणा पर जोर
नागपुर। “झगड़ा करना भारत का स्वभाव नहीं है, हमारा स्वभाव भाईचारे और सामूहिक सद्भाव में है।” ये बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में आयोजित एक समारोह में कहीं। भागवत ने कहा कि भारत की राष्ट्रवाद की अवधारणा पश्चिमी सोच से बिल्कुल अलग है। पश्चिम ने जिस राष्ट्रवाद को गर्व और अहंकार से जोड़ा, भारत की राष्ट्रीय चेतना उसकी बिल्कुल विपरीत है—यह आत्मचिंतन, सहअस्तित्व और प्रकृति व मानवता के साथ गहरे संबंधों से निकली है।
“भारत का राष्ट्रभाव गर्व से नहीं, आत्मचिंतन से निकला”
भागवत ने कहा कि दुनिया के कई देशों में राष्ट्रवाद का अर्थ आक्रामकता, विस्तार या शक्ति प्रदर्शन से जोड़ा गया। ऐसे राष्ट्रवादी गर्व की भावना दो विश्व युद्धों का कारण भी बनी। इसी अनुभव के चलते कई देश आज भी राष्ट्रवाद शब्द से डरते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का राष्ट्रभाव न तो गर्व, न अहंकार और न ही सत्ता विस्तार की सोच से उपजा है। उन्होंने कहा भारत की राष्ट्रीयता का बोध सदियों के चिंतन, विविध संस्कृतियों के मेल और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व में निहित है। हमारा राष्ट्रभाव किसी पर थोपने या किसी के विरोध में खड़ा करने का साधन नहीं है।”
हमारी किसी से बहस नहीं होती, झगड़ा हमारा स्वभाव नहीं
अपने संबोधन में भागवत ने भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना का हवाला देते हुए कहा कि हमारे देश ने हमेशा बहुलता को स्वीकार किया और अलग-अलग विचारों को स्थान दिया। उन्होंने कहा हमारी किसी से बहस नहीं होती। दुनिया देख रही है, भारत आज भी विवादों से दूर रहकर संवाद और समाधान के रास्ते पर चलता है। झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव ही नहीं है। मिल-जुलकर रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना ही हमारी परंपरा रही है।
भागवत ने पश्चिमी देशों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्से संघर्षों की पृष्ठभूमि पर बने हैं। वहां एक बार जब कोई विचार स्वीकार कर लिया जाए, तो बाकी सभी विचारों को अस्वीकार कर दिया जाता है। यह सोच संघर्ष को जन्म देती है, जबकि भारत ने हमेशा बहुलता और संवाद को जीवन पद्धति बनाया है।
पश्चिम राष्ट्रवाद नहीं समझता, इसलिए गलत शब्दों का उपयोग करता है
भागवत ने कहा कि पश्चिम भारत की राष्ट्रीय अवधारणा को समझ नहीं पाया, इसलिए उन्होंने उसे ‘नेशनलिज़्म’ यानी राष्ट्रवाद कहा, जबकि भारत की परंपरा में ‘राष्ट्रवाद’ शब्द सीमित और पश्चिमी अर्थों में उपयोग होता है। उन्होंने कहा “भारत का राष्ट्रबोध किसी एक घटना, युद्ध या राजनीतिक व्यवस्था से नहीं जुड़ा। यह एक प्राचीन, निरंतर और जीवित सांस्कृतिक धारा है। हम राष्ट्रीयता शब्द का इस्तेमाल करते हैं, राष्ट्रवाद का नहीं। हमारे लिए भारत प्राचीन काल से ही एक राष्ट्र रहा है और इस पर किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। भागवत के मुताबिक, भारत का राष्ट्रबोध केवल सीमाओं, भाषाओं, या राजनीतिक सत्ता से तय नहीं होता, बल्कि इसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा, आध्यात्मिक चिंतन, और जीवन पद्धति में हैं।
“भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं”
भागवत ने हाल ही में गुवाहाटी में दिए अपने बयान की भी याद दिलाई, जिसमें उन्होंने कहा था कि जो भारत पर गर्व करता है, वह हिंदू है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘हिंदू’ शब्द केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, सभ्यतागत और जीवन मूल्य की पहचान है। उन्होंने कहा “भारत और हिंदू एक ही हैं। भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसकी सभ्यता स्वयं इसे परिभाषित करती है। हिंदू शब्द केवल एक धर्म नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा और जीवन शैली का परिचायक है।
भारतीय विचारधारा में समावेश और सहअस्तित्व की प्रधानता
भागवत ने भारत की सभ्यता को दुनिया की सबसे समावेशी, संवादप्रधान और शांतिप्रिय सभ्यता बताया। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी किसी पर संस्कृति नहीं थोपी। यहां हर विचार, हर पंथ, हर मत और हर दर्शन को जगह मिली है। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रभाव एक ऐसा सूत्र है, जो विविधताओं को एक ही धागे में पिरोता है। यही वजह है कि भारत दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम—संपूर्ण विश्व एक परिवार है—का संदेश देता है।
भारत की भूमिका भविष्य में और भी बड़ी होगी
भागवत ने समारोह के अंत में कहा कि दुनिया आज संघर्ष और कट्टरता से परेशान है। ऐसे दौर में भारत की सांस्कृतिक सोच—जिसमें संवाद, सम्मान, और सह-अस्तित्व प्रमुख है—वैश्विक शांति का मार्ग दिखा सकती है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भारत न केवल आर्थिक या राजनीतिक रूप से, बल्कि मानवता के मार्गदर्शक के रूप में बड़ी भूमिका निभाएगा।





