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1917 में दिए थे ₹35 हजार, अब 109 साल बाद ब्रिटिश सरकार से मांगे जा रहे ₹10 करोड़! सीहोर के रूठिया परिवार की क्या है कहानी?

DigitalDesk by DigitalDesk
August 12, 2026
in भोपाल, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार
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सीहोर के नगर सेठ जुम्मा लाल रूठिया परिवार का दावा है कि उनके पूर्वज ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का ‘वार लोन’ दिया था। 109 साल बाद इस पुराने कर्ज से जुड़े मूल दस्तावेज परिवार को मिले हैं। अब यूके सरकार के डेप्ट मैनेजमेंट ऑफिस ने दस्तावेज मांगे हैं। सवाल है—क्या 35 हजार रुपये का यह कर्ज आज करीब 10 करोड़ रुपये का हो सकता है?

1. सीहोर का रूठिया परिवार कौन है?

मध्य प्रदेश के सीहोर का रूठिया परिवार स्थानीय स्तर पर पुराने कारोबारी और प्रतिष्ठित परिवारों में गिना जाता है। परिवार के पूर्वज सेठ जुम्मा लाल रूठिया को उस दौर में नगर सेठ के तौर पर जाना जाता था। करीब 109 साल पहले उनके और ब्रिटिश हुकूमत के बीच हुआ एक वित्तीय लेनदेन अब फिर चर्चा में है।

परिवार के मुताबिक, वर्ष 1917 में प्रथम विश्व युद्ध अपने चरम पर था। ब्रिटिश साम्राज्य युद्ध में भारी खर्च कर रहा था। सेना के लिए हथियार, राशन, परिवहन और दूसरी सैन्य जरूरतों पर बड़ी रकम खर्च हो रही थी। ऐसे समय ब्रिटिश सरकार को अतिरिक्त धन की जरूरत थी।

इसी दौरान भारत में ब्रिटिश सरकार ने रईसों, व्यापारियों और बड़े जमींदारों से युद्ध के लिए धन जुटाया। इसी प्रक्रिया में सीहोर के सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का ‘वार लोन’ दिया था।

उस समय 35 हजार रुपये कोई छोटी रकम नहीं थी। यह आज की तुलना में बेहद बड़ी आर्थिक हैसियत को दर्शाती थी।

2. 109 साल बाद कहां से सामने आया मामला?

कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है कि यह पुराना लेनदेन परिवार की यादों में ही नहीं रहा, बल्कि इससे जुड़े दस्तावेज भी सुरक्षित रहे।

परिवार के मुताबिक, सेठ जुम्मा लाल रूठिया का निधन 1937 में हो गया था। उनके पुराने दस्तावेज और लिखा-पढ़ी से जुड़े कागजात परिवार की पैतृक संपत्ति में सुरक्षित रहे।

हाल के वर्षों में सेठ जुम्मा लाल के पोते विनय रूठिया और विवेक रूठिया ने पुराने दस्तावेजों और पारिवारिक रिकॉर्ड की छानबीन शुरू की। इसी दौरान उन्हें वर्ष 1917 से संबंधित मूल दस्तावेज मिले।

इन दस्तावेजों में ब्रिटिश सरकार को दिए गए कथित ‘वार लोन’ से जुड़ी जानकारी दर्ज थी।

इसके बाद परिवार ने इस मामले को केवल ऐतिहासिक दस्तावेज मानकर छोड़ने के बजाय कानूनी तरीके से ब्रिटिश सरकार के सामने रखने का फैसला किया।

परिवार ने अधिवक्ता श्रीयांश रानीवाल के माध्यम से ब्रिटेन सरकार के संबंधित विभाग को नोटिस भेजा।

3. ब्रिटिश सरकार ने मांगे दस्तावेज

परिवार की ओर से भेजे गए दावे के बाद मामला अब ब्रिटेन के Debt Management Office तक पहुंचा है। रूठिया परिवार के मुताबिक, यूके सरकार की ओर से मिले जवाब में दावे को सीधे खारिज नहीं किया गया, बल्कि मामले की जांच के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और जानकारी मांगी गई है। परिवार के अनुसार, ब्रिटिश सरकार ने पुराने लोन से संबंधित दस्तावेजों को Gilt Registrar के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है। यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

रूठिया परिवार ने अब पुराने दस्तावेज जुटाकर अपने वकील को दिल्ली भेज दिए हैं। परिवार के वकील का कहना है कि दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें ब्रिटिश सरकार के संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि दस्तावेज मांगे जाने का अर्थ यह नहीं है कि ब्रिटिश सरकार ने 10 करोड़ रुपये का भुगतान स्वीकार कर लिया है। फिलहाल यह दावा दस्तावेजों की जांच और कानूनी प्रक्रिया के चरण में है।

4. ₹35 हजार से ₹10 करोड़ कैसे पहुंचे?

अब सबसे बड़ा सवाल—1917 में दिए गए 35 हजार रुपये आज कितने होंगे?

इसका कोई एक निश्चित जवाब नहीं है, क्योंकि पुराने पैसे की वर्तमान कीमत निकालने के लिए अलग-अलग आर्थिक पैमाने इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

मसलन, अगर कथित वार लोन पर दर्ज ब्याज दर को आधार बनाया जाए और लंबे समय तक चक्रवृद्धि ब्याज की गणना की जाए, तो रकम कई करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

दूसरी तरफ, 1917 के रुपये की क्रय शक्ति को आज के रुपये से तुलना करने के लिए सोने की कीमत, महंगाई और आर्थिक मूल्य जैसे पैमाने इस्तेमाल किए जा सकते हैं। परिवार की ओर से किए गए आकलन में इसी तरह की तुलना के आधार पर राशि 10 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है।

लेकिन यह आंकड़ा अभी अनुमानित है। अंतिम देनदारी कितनी होगी, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि मूल दस्तावेज में लोन की शर्तें क्या थीं, ब्याज की दर क्या थी, भुगतान की अवधि क्या थी और ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड में इस लेनदेन की पुष्टि होती है या नहीं।

यानी 35 हजार रुपये का 10 करोड़ रुपये बनना एक संभावित आर्थिक आकलन है, ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित भुगतान राशि नहीं।

5. अब आगे क्या होगा?

109 साल पुराने इस दावे की असली परीक्षा अब दस्तावेजों की जांच में होगी।

रूठिया परिवार को यह साबित करना होगा कि 1917 में वास्तव में ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का वार लोन दिया गया था और उससे संबंधित प्रमाणिक रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि उस कर्ज की कानूनी शर्तें क्या थीं और उसका भुगतान पहले कभी हुआ था या नहीं।

दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार के संबंधित विभाग अपने रिकॉर्ड और परिवार की ओर से पेश किए जाने वाले दस्तावेजों का मिलान करेगा।

अगर दस्तावेजों की प्रमाणिकता और देनदारी की पुष्टि होती है, तो यह मामला सिर्फ एक परिवार की आर्थिक मांग नहीं रहेगा, बल्कि ब्रिटिश शासनकाल के एक पुराने वित्तीय लेनदेन की ऐतिहासिक और कानूनी विरासत से जुड़ा मामला बन जाएगा।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, उस समय युद्ध के लिए दिया गया 35 हजार रुपये का कर्ज आज 109 साल बाद फिर चर्चा में है।

अब निगाह इस बात पर है कि पुराने दस्तावेज ब्रिटिश रिकॉर्ड से कितना मेल खाते हैं और क्या सीहोर के रूठिया परिवार का 1917 का दावा वास्तव में कानूनी तौर पर साबित हो पाता है। अगर दावा प्रमाणित होता है, तो 35 हजार रुपये का यह ऐतिहासिक ‘वार लोन’ आज की तारीख में कितनी रकम का रूप लेता है, इसका फैसला दस्तावेजों और ब्रिटिश सरकार की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

Tags: #British government#Jumma Lal Rathiya family #Nagar Seth #leading merchant city magnet of Sehore#Paid ₹35000 in 1917 #Claim of ₹10 crore against the British government after 109 years #family of Sehore
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