मां वैष्णो देवी के करोड़ों भक्तों के लिए इस नवरात्र एक ऐसी धार्मिक यात्रा शुरू होने जा रही है, जो अपने आप में बेहद खास है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र के दौरान पहली बार त्रिकूट पर्वत की व्यवस्थित और निर्धारित परिक्रमा का आयोजन किया जा रहा है। करीब 108 किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा कटड़ा, रियासी और आसपास के धार्मिक स्थलों से होकर गुजरेगी। खास बात यह है कि यात्रा सिर्फ पहाड़ की परिक्रमा नहीं होगी, बल्कि रास्ते में आने वाले प्राचीन मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक स्थलों पर पूजा-अर्चना भी की जाएगी।
108 किलोमीटर का पूरा धार्मिक सफर
सनातन धर्म सभा कटड़ा और सनातन धर्म सभा रियासी के संयुक्त प्रयास से आयोजित इस यात्रा में साधु-संतों के साथ स्थानीय लोग और श्रद्धालु शामिल होंगे। आयोजकों के मुताबिक परिक्रमा मार्ग करीब 108 किलोमीटर लंबा है। इसमें लगभग 90 किलोमीटर हिस्सा पक्की सड़क से जुड़ा है, जबकि कुछ हिस्से अभी कच्चे रास्ते और पगडंडी के रूप में हैं। परिक्रमा मार्ग को भविष्य में पूरी तरह विकसित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। कुछ हिस्सों में काम शुरू हो चुका है और कुछ स्थानों पर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
पहले दिन मां के चरणों में हाजिरी
11 अक्टूबर यानी प्रथम नवरात्र को यात्रा मां वैष्णो देवी के चरणों में हाजिरी के साथ शुरू होगी। इसके बाद श्रद्धालु बाबा जित्तो मंदिर पहुंचेंगे। यहां पूजा-अर्चना और कीर्तन होगा। बाबा जित्तो को मां वैष्णो देवी के अनन्य भक्त और किसान परंपरा से जुड़े श्रद्धेय व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है। इसके बाद यात्रा नौ देवी मंदिर और बाबा धनसर होते हुए रियासी और भामाग क्षेत्र की ओर बढ़ेगी। रास्ते में अलग-अलग धार्मिक स्थलों पर हवन, यज्ञ, पूजा और कीर्तन का आयोजन किया जाएगा।
हर पड़ाव पर अलग आस्था
चोराकोट के मां दुर्गा मंदिर से लेकर डंगाकोट, टोट और सुखाल घाटी के प्राचीन देवस्थलों तक यात्रा के अलग-अलग पड़ाव तय किए गए हैं। आठवें नवरात्र को चड़ई-मुथल गांव स्थित रामायणी बाबा आश्रम परिसर के मां दुर्गा मंदिर में धार्मिक कार्यक्रम होगा। नवरात्र के अंतिम दिन यात्रा मां वैष्णो देवी के प्रथम पड़ाव माने जाने वाले प्रसिद्ध भूमिका मंदिर पहुंचेगी। यहां हाजिरी, हवन-यज्ञ, कीर्तन और विशाल भंडारे के साथ यात्रा का समापन होगा।
गोवर्धन परिक्रमा की तर्ज पर नया धार्मिक मार्ग
आयोजकों के मुताबिक देश में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की तरह त्रिकूट पर्वत की परिक्रमा को भी धार्मिक महत्व से जोड़कर देखा जा रहा है। स्थानीय लोग पहले भी अलग-अलग समय पर त्रिकूट क्षेत्र की परिक्रमा करते रहे हैं, लेकिन नवरात्र के दौरान इसे पहली बार एक व्यवस्थित धार्मिक आयोजन के रूप में आयोजित किया जा रहा है। यानी यह पहल आने वाले समय में त्रिकूट क्षेत्र में एक नए धार्मिक मार्ग की पहचान बनाने की कोशिश भी है।
आस्था के साथ पर्यटन और रोजगार
इस आयोजन का एक बड़ा पहलू धार्मिक पर्यटन है। परिक्रमा मार्ग श्रद्धालुओं को मंदिरों के साथ-साथ पहाड़ों, जंगलों, झरनों और प्राकृतिक वातावरण से भी रूबरू कराएगा। भामाग क्षेत्र के विकास को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है। श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने से स्थानीय स्तर पर परिवहन, ठहरने, भोजन और दूसरी सेवाओं से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
मां के भोग से भी जुड़ा है भामाग
भामाग क्षेत्र का संबंध मां वैष्णो देवी की धार्मिक व्यवस्था से भी बताया जाता है। आयोजकों के अनुसार मां के भोग में इस्तेमाल होने वाला दूध, दही और घी बड़ी मात्रा में इसी क्षेत्र से पहुंचता है। स्थानीय पूर्व बारीदार परिवार आज भी इन सामग्रियों को भवन तक पहुंचाने की परंपरा से जुड़े हैं। इस लिहाज से त्रिकूट परिक्रमा सिर्फ एक नई यात्रा नहीं, बल्कि वैष्णो देवी धाम से जुड़े आसपास के क्षेत्रों की धार्मिक विरासत को सामने लाने का माध्यम भी बन सकती है।
स्थानीय विरासत को मिलेगी नई पहचान
इस यात्रा में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। दिल्ली से संत विज्ञानानंद महाराज भी अपने शिष्यों के साथ यात्रा में शामिल होंगे। कुल मिलाकर 108 किलोमीटर की त्रिकूट परिक्रमा नवरात्र के दौरान आस्था, परंपरा और पर्यटन को एक साथ जोड़ने वाली पहल है। पहली बार इसे व्यवस्थित धार्मिक आयोजन के रूप में शुरू किया जा रहा है। अब इसकी सफलता सिर्फ श्रद्धालुओं की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि यह यात्रा त्रिकूट क्षेत्र की धार्मिक विरासत, स्थानीय पर्यटन और गांवों की अर्थव्यवस्था को कितनी नई पहचान देती है। मां वैष्णो देवी के भक्तों के लिए यह नवरात्र निश्चित तौर पर एक नए धार्मिक अनुभव की शुरुआत करने जा रहा है।