शी-मोदी मुलाकात से भारत-चीन रिश्तों में नई उम्मीद: जेएनयू प्रोफेसर
हाल ही में भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। इस समिट पर पूरी दुनिया की नजर थी। वैश्विक अर्थव्यवस्था, बहुपक्षीय सहयोग और बदलती विश्व व्यवस्था जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा हुई चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात की। लंबे समय बाद दोनों नेताओं की यह मुलाकात भारत-चीन रिश्तों के लिहाज से भी काफी अहम रही। तो आखिर मौजूदा वैश्विक हालात के बीच इस ब्रिक्स समिट को किस तरह देखा जाए? इस सवाल पर CGTN हिन्दी संवाददाता से बातचीत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चीनी अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष और प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार ने कहा कि इस बार का ब्रिक्स समिट ऐसे समय हुआ, जब पूरी दुनिया बदलाव के दौर से गुजर रही है। वैश्विक तनाव, अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष और टैरिफ से जुड़ी चुनौतियों का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
इसका असर सिर्फ देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर ही नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी पर भी दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में प्रो. राकेश कुमार के मुताबिक, भारत, चीन, रूस और ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों का एक मंच पर आना अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि ब्रिक्स में शामिल देश अब विकास और सहयोग के लिए अपने रास्ते तलाश रहे हैं और वे केवल पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रो. राकेश कुमार ने कहा कि ब्रिक्स समिट में शामिल देशों के नेताओं में एक नए वैश्विक बदलाव को लेकर उत्साह दिखाई दिया। उनके मुताबिक, यह बदलाव खास तौर पर एशिया और ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका को दिखाता है।
यानी सवाल सिर्फ ब्रिक्स की बैठक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दुनिया में हो रहे बड़े बदलाव को भी समझना जरूरी है। प्रो. राकेश कुमार का मानना है कि एशियन सेंचुरी की चर्चा के बीच ब्रिक्स जैसे मंच ग्लोबल साउथ के देशों को एक साथ आने का मौका दे रहे हैं। इससे ये देश अपने साझा मुद्दों पर मिलकर काम कर सकते हैं और विकास के लिए एक नया रास्ता तैयार कर सकते हैं।
शी-मोदी मुलाकात से भारत-चीन रिश्तों को नई उम्मीद ब्रिक्स की बात के बाद सबसे अहम मुद्दा आता है भारत और चीन के रिश्तों का। दरअसल, इस समिट में राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर थी। ऐसे में सवाल था कि इस मुलाकात को भारत-चीन रिश्तों के नजरिए से किस तरह देखा जाए?
इस पर प्रो. राकेश कुमार ने कहा कि करीब सात साल बाद चीनी राष्ट्रपति का भारत आना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी सकारात्मक मुलाकात काफी महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, इस मुलाकात से दोनों देशों के रिश्तों को लेकर नई उम्मीद पैदा हुई है।
प्रो. राकेश कुमार ने इस रिश्ते को सिर्फ आज की राजनीति के नजरिए से नहीं, बल्कि दोनों देशों के लंबे इतिहास के संदर्भ में भी देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत और चीन दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताएं हैं और दोनों के बीच हजारों साल पुराने संबंध रहे हैं। बौद्ध धर्म और सिल्क रूट के जरिए दोनों देशों के लोगों के बीच लंबे समय तक संपर्क और आदान-प्रदान होता रहा है।
इसी पुराने रिश्ते का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि शी चिनफिंग और नरेंद्र मोदी की मुलाकात से दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय में पैदा हुआ अविश्वास धीरे-धीरे कम हो सकता है। उनका मानना है कि दोनों देश बातचीत और सहयोग के जरिए अपने मतभेदों को
दूर करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ नेताओं की मुलाकात काफी नहीं है। दोनों देशों के
बीच लोगों का संपर्क भी बढ़ना जरूरी है। इस पर प्रो. राकेश कुमार ने वीजा, व्यापार घाटे और पीपल-टू-पीपल एक्सचेंज जैसे मुद्दों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा, पर्यटन, अकादमिक सहयोग और लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा, तो दोनों देश एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। इससे गलतफहमियां दूर करने में भी मदद मिल सकती है।
क्या ब्रिक्स में भारत और चीन के बीच सहयोग बढ़ेगा?
यहीं से एक और सवाल सामने आता है। भारत और चीन दोनों ही ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात करते हैं। ऐसे में क्या दोनों देश ब्रिक्स के भीतर मिलकर आगे बढ़ेंगे, या नेतृत्व को लेकर उनके बीच प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल सकती है? प्रो. राकेश कुमार इस सवाल को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि भारत और चीन के रिश्तों को सिर्फ प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। उनके मुताबिक, दोनों देशों के बीच हजारों साल पुराने सभ्यतागत संबंध हैं और इतिहास में दोनों के बीच लगातार संपर्क और आदान-प्रदान रहा है। उनका मानना है कि आज भी भारत और चीन ग्लोबल साउथ के सामने मौजूद साझा
समस्याओं पर मिलकर काम कर सकते हैं।
विकास, आर्थिक सहयोग और वैश्विक शासन
व्यवस्था जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं, जहां दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इसी वजह से प्रो. राकेश कुमार के मुताबिक, भारत और चीन के बीच सहयोग सिर्फ आर्थिक या राजनीतिक जरूरत तक सीमित नहीं है। दोनों देशों की साझा सभ्यतागत विरासत भी इस
सहयोग का एक आधार बन सकती है। दोनों देश मिलकर ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों की जरूरतों को समझने और उनके विकास में योगदान देने की दिशा में काम कर सकते हैं।
अब नजर 2027 में चीन की ब्रिक्स अध्यक्षता पर ब्रिक्स के मौजूदा दौर की बात करने के बाद नजर अब 2027 पर जाती है। अगले साल चीन ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा। ऐसे में सवाल है कि चीन की अध्यक्षता में ब्रिक्स का एजेंडा किस दिशा में आगे बढ़ सकता है?
इस पर प्रो. राकेश कुमार का कहना है कि चीन ब्रिक्स के फैसलों को ज्यादा से ज्यादा परिणाम आधारित बनाने पर जोर दे सकता है। यानी सिर्फ बैठकें हों, घोषणाएं हों और फिर बात वहीं खत्म हो जाए, ऐसा नहीं। कोशिश यह हो सकती है कि लिए गए फैसलों का असर जमीन पर भी दिखाई दे। उनके मुताबिक, चीन पहले हो चुकी ब्रिक्स बैठकों की घोषणाओं और समझौतों की समीक्षा कर
सकता है और यह देख सकता है कि उन पर कितना काम हुआ है। इसके साथ ही आगे के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने पर भी जोर दिया जा सकता है। प्रो. राकेश कुमार ने न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिक्स के
इस बैंक के जरिए विकासशील देशों की परियोजनाओं को सहयोग मिल रहा है। उनके मुताबिक, इसी तरह वित्तीय और विकास से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में भी ब्रिक्स के भीतर सहयोग को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रो. राकेश कुमार का मानना है कि 2027 में चीन की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स में पहले से लिए गए फैसलों को लागू करने और सहयोग को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है। उनके मुताबिक, आने वाले समय में ब्रिक्स सिर्फ चर्चा का मंच न रहकर साझा चुनौतियों पर मिलकर काम करने वाला एक मजबूत मंच बन सकता है।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, पेइचिंग)





