उत्तराखंड की सियासत में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन दावेदारियां और राजनीतिक समीकरण तेजी से सामने आने लगे हैं। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के परिवार को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हरिद्वार ग्रामीण से उनकी बेटी अनुपमा रावत मौजूदा विधायक हैं। अब हरीश रावत ने अपने छोटे बेटे आनंद रावत को भी विधानसभा चुनाव लड़ाने की इच्छा जाहिर की है। हरीश रावत ने कहा है कि उनकी दिली इच्छा है कि आनंद उनकी उत्तराखंडियत की सोच और उत्तराखंड से उनके रिश्ते को आगे बढ़ाएं। यहीं से सवाल उठता है—क्या 2027 में उत्तराखंड की सियासत में रावत परिवार की अगली पीढ़ी एक साथ सक्रिय नजर आएगी?
1. अनुपमा ने बदली थी हरिद्वार ग्रामीण की कहानी
हरिद्वार ग्रामीण सीट हरीश रावत परिवार के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि 2017 में खुद हरीश रावत यहां से चुनाव हार गए थे। इसके बाद 2022 में उनकी बेटी अनुपमा रावत कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरीं और सीट पर कांग्रेस की वापसी हुई। यानी जिस सीट पर कांग्रेस लंबे समय से जीत नहीं पाई थी, वहां परिवार की अगली पीढ़ी ने चुनावी जीत दर्ज की। हरीश रावत ने हालिया बातचीत में भी अनुपमा के इसी चुनावी सफर का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने उस सीट को चुना, जिसे कांग्रेस लंबे समय से नहीं जीत पाई थी। इसलिए अनुपमा की कहानी सिर्फ परिवार की राजनीतिक विरासत नहीं, बल्कि एक कठिन सीट पर वापसी की कहानी के तौर पर भी देखी जाती है।
2. अब चर्चा आनंद रावत की क्यों?
अब हरीश रावत का फोकस उनके छोटे बेटे आनंद रावत पर दिखाई दे रहा है। हरीश रावत के मुताबिक उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को संकेत दिया है कि जिस सीट पर कांग्रेस लंबे समय से नहीं जीती, वहां अगर कोई मजबूत दावेदार नहीं हो तो आनंद को मौका दिया जा सकता है। आनंद ने भी ऐसी सीट चुनने की बात कही है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात है—आनंद को सीधे सुरक्षित सीट से उतारने की बात नहीं हो रही, बल्कि चुनौती वाली सीट से चुनाव लड़ाने का संकेत दिया जा रहा है। यही बात इस दावे को राजनीतिक रूप से दिलचस्प बनाती है।
3. हरदा की राजनीति अब अगली पीढ़ी के मोड़ पर
हरीश रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। लेकिन 2027 के चुनाव से पहले खुद हरीश रावत ने अलग-अलग मौकों पर चुनावी भूमिका और अपनी राजनीतिक सक्रियता को लेकर अलग-अलग बातें कही हैं। सितंबर में उन्होंने पार्टी के पदों से इस्तीफे की पेशकश भी की थी और कहा था कि उनकी वजह से पार्टी की चुनावी मुहिम पर कोई असर न पड़े। दूसरी तरफ हरिद्वार से दोबारा विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा भी उन्होंने जाहिर की है। यानी तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। एक तरफ हरदा खुद चुनावी मैदान की इच्छा जता रहे हैं, दूसरी तरफ बेटे आनंद को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं।
4. परिवार के कई चेहरों ने आजमाई चुनावी किस्मत
हरीश रावत परिवार का चुनावी राजनीति से जुड़ाव नया नहीं है। पत्नी रेणुका रावत चुनाव लड़ चुकी हैं। बड़े बेटे वीरेंद्र रावत ने 2024 में हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। अब छोटे बेटे आनंद के नाम की चर्चा विधानसभा चुनाव को लेकर हो रही है। बेटी अनुपमा पहले से विधायक हैं। इससे 2027 में सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि रावत परिवार से कितने चेहरे चुनाव मैदान में दिखाई देंगे? यह फैसला सिर्फ परिवार का नहीं होगा। अंतिम टिकट वितरण कांग्रेस संगठन और पार्टी नेतृत्व के निर्णय पर निर्भर करेगा।
5. कांग्रेस के लिए परिवारवाद बनाम राजनीतिक विरासत की बहस
रावत परिवार की सक्रियता के साथ एक राजनीतिक बहस भी स्वाभाविक है। एक नजरिया इसे राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाना मान सकता है। दूसरी तरफ पार्टी के भीतर दूसरे दावेदारों के लिए टिकट और अवसर का सवाल भी उठ सकता है। यही वजह है कि आनंद की दावेदारी सिर्फ एक सीट की चर्चा नहीं है। यह कांग्रेस में पुराने नेतृत्व, नई पीढ़ी और संगठन के भीतर टिकट वितरण के समीकरण से भी जुड़ती है।
6. 2027 के लिए हरीश रावत का बड़ा दांव?
हरीश रावत ने हाल में 2027 को लेकर संगठन और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रियता बढ़ाई है। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से चुनाव की तैयारी करने की अपील भी की है। ऐसे में आनंद रावत की चर्चा को सिर्फ पारिवारिक मामला मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह कांग्रेस की उस रणनीति से भी जुड़ सकता है जिसमें पुराने नेताओं के राजनीतिक अनुभव को नई पीढ़ी के चेहरों के साथ जोड़ा जाए। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस आनंद को किस सीट से उम्मीदवार बनाएगी या बनाएगी भी या नहीं।
7. अनुपमा और आनंद—दो अलग चुनावी परीक्षाएं
अनुपमा रावत के सामने 2027 में अपनी मौजूदा सीट पर राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी। वहीं आनंद के लिए अगर किसी नई और लंबे समय से कांग्रेस से दूर रही सीट को चुना जाता है तो उनकी पहली विधानसभा परीक्षा ही कठिन मुकाबले वाली हो सकती है। इसलिए दोनों की राजनीतिक यात्राएं अलग-अलग सवालों का सामना करेंगी। अनुपमा के सामने सीट बचाने की परीक्षा, आनंद के सामने नई सीट पर जगह बनाने की प रीक्षा।और इन दोनों के बीच हरीश रावत की अपनी राजनीतिक भूमिका सबसे बड़ा सवाल बनी रहेगी।
हरदा की विरासत अब किसके कंधे पर?
उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का प्रभाव लंबे समय से रहा है। अब 2027 के चुनाव से पहले उनके परिवार की अगली पीढ़ी चर्चा में है। अAनुपमा पहले ही विधानसभा पहुंच चुकी हैं। अब आनंद का नाम सामने आया है। खुद हरीश रावत भी हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। इसलिए 2027 में रावत परिवार के सामने सिर्फ टिकट का सवाल नहीं होगा। सवाल होगा—क्या हरीश रावत की राजनीतिक विरासत अगली पीढ़ी संभालेगी? और अगर आनंद मैदान में उतरते हैं, तो क्या वे पिता और बहन की तरह किसी कठिन राजनीतिक जमीन से अपनी पहचान बनाने की कोशिश करेंगे? फिलहाल अंतिम तस्वीर कांग्रेस के टिकट बंटवारे के बाद ही साफ होगी, लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड चुनाव की चर्चा में रावत परिवार का अगला अध्याय शुरू हो चुका है।